भारतीय लोकतंत्र में पटेल
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आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का अनावरण करेंगे। इसमें दोराय नहीं कि सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय आंदोलन, और भारतीय कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता रहे हैं। स्वतंत्रता के उपरांत वह भारत के उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री भी रह चुके हैं। अब विश्व में इस बात की चर्चा होना लाजिमी है कि सरदार वल्लभभाई पटेल कौन थे और भारतीय लोकतंत्र में उनका क्या योगदान रहा। इस मूर्ति के ठीक पीछे एक 'एकता की दीवार' भी बनाई जाएगी, जो इस बात का द्योतक है कि बहुभाषायी और अनेक संस्कृतियों वाला भारत समेकित राजनीतिक व्यवस्था की तरह इसलिए उभर पाया, क्योंकि पटेल ने रियासतों पर पुरजोर दबाव बनाया कि ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद वे भारतीय संघ में सम्मिलित हो जाएं। यह पटेल का ही कौशल था कि रियासतों से अलग-अलग संधि, समझौते, बातचीत, मशविरा और कहीं जरूरत पड़ी, तो बल प्रयोग भी करके भारत के संघ का सृजन हो पाया। साम, दाम, दंड, भेद के समुचित प्रदर्शन करने के कारण ही उन्हें लौह पुरुष का सम्मानजनक दर्जा भी दिया गया।
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कांग्रेस पार्टी की राजनीति में नेहरू से उनकी नोकझोंक होती थी। 1929 में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष बनने की दावेदारी को उन्हें गांधी जी के आग्रह पर वापस लेना पड़ा, लेकिन 1931 में कांग्रेस के कराची अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए। नेहरू और उनके विचारों में राजनीतिक मतभेद था और कई बार स्वयं गांधी को मध्यस्थता करनी पड़ती थी। सरदार एक जमीनी नेता थे और अनुशासनात्मक कार्रवाई पर उनकी पकड़ प्रखर थी, ऐसे में यह उचित है कि उन्हें इतिहास में सही सम्मान मिले। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा का यह मानना है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास और राजनीति पर नेहरू-गांधी परिवार के वर्चस्व के चलते पटेल को दरकिनार कर दिया गया। प्रतिमा अनावरण के जरिये पटेल के महत्व को सामने लाया जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि इसे 2019 के लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान की शुरुआत भी मानना चाहिए।
मगर इसके कुछ और राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। सबसे पहले तो यह कि मोदी सरकार ने संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहर पर विशेष बल दिया है, इनमें महत्वपूर्ण है लालकिला का पुनरुद्धार। नेताजी सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की स्मृति में वहां एक सभा की गई। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल, दोनों ही कांग्रेस की राजनीतिक चर्चाओं की मुख्यधारा में नहीं थे। अब नरेंद्र मोदी बखूबी इस बात को भुनाएंगे कि कांग्रेस पार्टी केवल एक परिवार की गिरफ्त में सिमटकर रह गई है, लेकिन भारत की विरासत गांधी-नेहरू परिवार से ज्यादा विस्तृत है।
आलोचकों का कहना है कि इस प्रतिमा पर लगभग दो हजार नौ सौ करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। उनका मानना है कि इतनी राशि खर्च करना अपव्यय है। वहीं अन्य आलोचक कहते हैं कि गुजरात के उत्तर क्षेत्र और सौराष्ट्र में कम वर्षा हुई है। किसान आंदोलित हैं, वैसे में एक प्रतिमा के अनावरण पर इतना खर्च करना जायज नहीं लगता। जहां पटेल ने 'एक भारत और एक नागरिकता' का अनुमोदन किया, वहीं एक दुखद यौन शोषण के अपराध के बाद हजारों की संख्या में बिहारी श्रमिक राज्य से भगाए गए। यह भी संभव है कि पटेल समुदाय के नेता हार्दिक पटेल भी विरोध की एक रैली करेंगे। बहरहाल शिल्पकार अनिल रामसुतर ने कहा है कि यह ठीक वैसा ही महत्वपूर्ण क्षण है, जैसा अमेरिका में अब्राहम लिंकन के स्मारक के अनावरण के समय का दृश्य था।