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लोकतंत्र में दलों का अस्तबल

Sun, 20 May 2018 06:49 PM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Sun, 20 May 2018 06:49 PM IST
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Party Stables in Democracy
कर्नाटक चुनाव
सबसे बड़ी पार्टी के नेता होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और 44 सांसदों वाले एच डी देवगौड़ा कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए थे। अब 22 साल बाद कांग्रेस के समर्थन से देवगौड़ा के पुत्र कुमारस्वामी ने सिर्फ 37  विधायकों के दम पर मुख्यमंत्री बनकर इतिहास तो दोहराया, पर बीएस  येदियुरप्पा लाख कोशिशों के बावजूद वाजपेयी नहीं बन पाए। गोवा और मणिपुर मामलों में सांविधानिक परंपरा को छोड़ भी दिया जाए, तो भी किस नैतिकता के तहत भाजपा को कर्नाटक की बागडोर मिल सकती है, जब 10 फीसदी सीट न मिलने पर कांग्रेस को लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा नहीं मिला?

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कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन निश्चित तौर पर सत्तालोलुप और अनैतिक है, पर इसी पैमाने में जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन को कैसे नैतिक और जायज ठहराया जा सकता है? सत्ता की मलाई की बंदरबांट के लिए खुले युद्ध के दौर में अब सेवा और नैतिकता के जुमले बेमानी हो गए हैं। 

चुनाव के दौरान सैकड़ों करोड़ की नकदी और शराब की बरामदगी के साथ हजारों वोटर कार्ड बरामद होने के बाद चुने हुए विधायकों का मानक मूल्य अब 100 करोड़ तय हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार, कर्नाटक में विधायक उम्मीदवार द्वारा 28 लाख रुपये के खर्च की सीमा है, पर एक महीने के निवेश में 350 गुना रिटर्न की संभावना ही तो राजनीति को सेवा के बजाय मेवा का कारोबार बनाती है। कर्नाटक के निर्दलीय विधायक ने आयाराम-गयाराम के रिकॉर्ड की बराबरी कर उत्तर और दक्षिण के फासले को कम कर दिया। कांग्रेस की डूबती नैया को बचाने वाले नए उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और उनके परिवार पर अवैध खनन और जमीनों पर कब्जा करने के आरोप लगे हैं। भाजपा के रेड्डी ब्रदर्स की तर्ज पर क्या अब गठबंधन सरकार में भी खनन माफिया के राज से विधायकों का पोषण और समर्थन हासिल होगा? 

दलबदल कानून की बंदिशों की वजह से विधायक बाड़ों में कैद हो जाते हैं, पर इस कानून के बंधन से यदि उन्हें मुक्त कर गया, तो अस्तबल के घोड़ों की तरह नेताओं की खुली नीलामी पर कैसे रोक लगेगी? दलबदल के माध्यम से सत्ता के खेल को सुनिश्चित करने के लिए एटॉर्नी जनरल ने दलबदल-विरोधी कानून की अजब व्याख्या कर दी, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सत्ता हासिल करने के लिए सूटकेसों के आदान-प्रदान की अनुमति कैसे दी जा सकती है?

 

बलात्कार के आरोपियों के फांसी के कानून से लोकप्रियता हासिल करने वाले नेताओं द्वारा लोकतंत्र की हत्या के आरोपी विधायकों का नारको टेस्ट क्यों नहीं होना चाहिए? नई सरकार क्या अब विधायकों की खरीद-फरोख्त, धमकी, अपहरण और नजरबंदी के मामलों में आपराधिक कारवाई करेगी या फिर सभी आरोप राजनीतिक सामंजस्य के तहत अब दफन हो जाएंगे? 

न्यायमूर्ति केएम जोसेफ ने, जिन्हें अभी तक सर्वोच्च न्यायालय में प्रोन्नत नहीं क्या गया, उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को रद्द करते हुए कहा था कि राष्ट्रपति राजा नहीं होता। शक्ति परीक्षण में येदियुरप्पा के विफल होने के बाद अब शीर्ष अदालत के आने वाले फैसले से राज्यपाल की भूमिका और औचित्य पर अनेक सवाल खड़े हो सकते हैं। सरकारिया आयोग, संविधान समीक्षा आयोग, पंछी आयोग तथा सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों के अनुसार जब तक संसद द्वारा कानूनों में बदलाव नहीं किया जाएगा, तब तक कर्नाटक जैसे नाटक होते ही रहेंगे। उम्मीद है कि शीर्ष अदालत द्वारा राज्यपालों की विवेकाधीन शक्तियों की समुचित व्याख्या से भविष्य में त्रिशंकु विधानसभाओं में सरकार गठन पर विवाद कम हो सकेगा। 

कर्नाटक की तर्ज पर झारखंड मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 में शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने के राज्यपाल के निर्णय को संविधान के साथ फ्रॉड बताते हुए व्यापक बहुमत परीक्षण के आदेश देते हुए एंग्लो इंडियन सदस्य की नियुक्ति पर रोक भी लगा दी थी। झारखंड मामले में 13 साल पहले बहस कर रहे दो बड़े वकीलों ने कर्नाटक मामले में भी बहस की, पर अब उनके पाले भी बदल गए और दलील भी बदल गई! इस बार मुकुल रोहतगी कर्नाटक के राज्यपाल का बचाव कर रहे थे, पर 2005 में वह झारखंड के राज्यपाल सिब्ते रजी के निर्णय पर सवाल उठा रहे थे। ऐसे ही कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला पर सवाल उठाने वाले सिंघवी बीते दौर में झारखंड के राज्यपाल का बचाव कर रहे थे।

 

सर्वोच्च न्यायालय से रिटायर हो रहे न्यायाधीश जे चेलमेश्वर ने सीनियर वकीलों को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि एक करोड़ रुपये दिन की फीस लेने वाले वकील न्यायिक सुधारों के मुद्दे पर मुंह भी नहीं खोलते। याकूब मेनन के बाद कर्नाटक मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आधी रात की सुनवाई के औचित्य पर अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और मुकुल रोहतगी ने आपत्ति व्यक्त की थी। 

कर्नाटक मामले में जल्द फैसले से यह जाहिर हो गया कि आधी रात में जागने वाली अदालतें नियमों का मोहताज हुए बगैर त्वरित न्याय कर सकती हैं। आम जनता के मामलों में जटिल प्रक्रिया और लंबी सुनवाई के दौरान ही गरीबों की कमर टूट जाती है। नोटिस, गवाह, गवाही और बहस में कई पीढ़ियों के बाद फैसला आता भी है, तो न्याय नहीं मिलता। कनार्टक विधानसभा की कार्यवाही के सीधे प्रसारण के शीर्ष अदालत के आदेश का सही अनुपालन सुनिश्चित होने के साथ लोकतंत्र और अधिक शर्मसार होने से बच गया।

आईटी जगत में सिरमौर कर्नाटक ने तकनीकी सफलता से फिर नई दिशा दिखलाई है। तो क्या अब अदालतों की कार्यवाहियों के सीधे प्रसारण का समय नहीं आ गया है, जिससे देश में आम जनता को न्याय सुनिश्चित हो सके? कर्नाटक के अरबपति विधायकों द्वारा सत्ता हासिल करने के खेल में सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे आधी रात को खुल गए, पर आम जनता के लिए न्याय के दरवाजे कब खुलेंगे?

-लेखक सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट और सांविधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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