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सदन चलता है तो अध्यक्ष उड़ता है
प्रकाश पुरोहित
Updated Thu, 14 Nov 2013 08:07 PM IST
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पार्टी अध्यक्ष होने का मतलब यह तो नहीं कि आदमी परिवार के साथ घूमने-फिरने भी न जाए! माना कि पार्टी ने अध्यक्ष को जिम्मेदारी दी है, लेकिन अध्यक्ष का परिवार के प्रति भी कुछ कर्तव्य है या नहीं? पूरे देश की पार्टी का अध्यक्ष हैं, तो उन्होंने देश पूरा घूम लिया। बच्चे-पत्नी भी बोर होने लगे कि वही-वही मुंबई, चेन्नई और गोवा! इतनी बार देख लिया है कि याद करना पड़ता है कि हमारा अपना शहर कौन-सा है। नए-नए विधायक, सांसद जब चाहते हैं, फॉरेन उड़ लेते हैं, और हम हैं कि डोमेस्टिक फ्लाइट में ही अटके हुए हैं।
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अध्यक्ष के फॉरेन टूर में सबसे बड़ी मुश्किल सदन की वजह से पेश आती है। सदन इतने कम समय के लिए चलता है कि अध्यक्ष बाहर निकलने का तय कर भी ले, तो आने की जल्दी रहे। सदन के दिन कम होते जा रहे हैं, यह चिंता वह कई बार जता चुके हैं। जब सदन चल रहा होता है, तभी मौका होता है कि वह इंटरनेशनल फ्लाइट में परिवार सहित सवार हो लें। चूंकि अध्यक्ष न तो विपक्ष का नेता है और न ही उसका वहां कोई रोल रहता है, इसलिए वह सदन के चलते ही बाहर चल पड़ता है। पार्टी के लोग सामने वाले दल से हर दिन दो-दो हाथ करने में लगे रहते हैं, इसलिए अध्यक्ष पद को उस समय कोई खतरा नहीं रहता है। अपनी पार्टी वाले उस समय ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं, जब सदन में दन...दना...दन नहीं हो रही होती है।
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आपको याद ही होगा कि पिछले दिनों एक पार्टी अध्यक्ष ने नियमों की अनदेखी की और सदन के ठहरे रहने के बावजूद विदेश चले गए। गए तो वह दस दिन के लिए ही थे, पर पांच दिन में ही भागकर आना पड़ा, वरना उन्हें आने की बाद में जरूरत ही नहीं पड़ती। यों कि अध्यक्ष पद से हटाने की पूरी तैयारी पार्टी ने कर ली थी। इस तरह के हादसे जब सामने हो, तो अध्यक्ष को सदन के चालू होने का इंतजार तो करना ही चाहिए। पार्टी के लोगों को पूरे समय लड़ने-भिड़ने के लिए कोई तो चाहिए। यदि विपक्षी दल नहीं मिलेगा, तो वे अपने ही अध्यक्ष के पीछे पड़ जाएंगे। इसीलिए अध्यक्ष पहली फुरसत में पार्टी को सक्रिय करने में लग जाते है। वह यदि इसमें सफल नहीं हो पाते हैं, तो पार्टी के लोग ही उन्हें निष्क्रिय कर देते हैं।
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सदन चल रहा है, तो अध्यक्ष उड़ रहा है। यही वक्त है, जब उसका कोई रोल नहीं होता और वह अच्छा पिता, अच्छा पति बनने की कोशिश करने लगता है।