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भागीदारी से ही देश की उन्नति
उदित राज
Updated Mon, 10 Aug 2015 08:22 PM IST
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आईआईटी, रूड़की ने सत्तर से अधिक विद्यार्थियों को इसलिए निकाल दिया कि दोनों सेमेस्टरों में उनका सीजीपीए पांच से भी कम था। इन छात्रों में से 31 अनुसूचित जनजाति के हैं, 23 अनुसूचित जाति के, चार विकलांग, आठ पिछड़ा वर्ग और मात्र आठ सामान्य वर्ग के। बताया जा रहा है कि इन वर्गों के छात्र इसलिए फेल हुए, क्योंकि उनका प्रवेश कम प्राप्तांक पर हुआ था। प्रोफेसरों का कहना है कि सामान्य एवं आरक्षित वर्गों के छात्रों में फासला बहुत है।
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इसका समाज में संदेश जाता है कि आरक्षित वर्ग के छात्र कम बुद्धिमान होते हैं। सच्चाई यह है कि इन संस्थाओं में अच्छे नंबर पाने वाले छात्र ही प्रवेश कर पाते है। उनमें परिश्रम करने की आदत होती है। सामान्य वर्ग के छात्रों के अंक ज्यादा होते हैं। ऐसे ज्यादातर छात्र प्राइवेट स्कूलों से पढ़कर आते हैं, जहां तमाम सुविधाएं होती हैं। वहां अध्यापक भी अच्छे होते ही हैं। घर पर ट्यूशन लगाया जाता है तथा अभिभावक भी पढ़े-लिखे होते हैं। बीसों पीढ़ियों का ज्ञान और संस्कार अनुभव का लाभ भी होता है। अगर इन चारों लाभों के लिए पांच-पांच नंबर भी दिए जाएं, तो 20 प्रतिशत होता है। जबकि सामान्य एवं आरक्षित वर्ग के छात्रों में अब 20 फीसदी का फासला नहीं रह गया है।
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हकीकत यह है कि भारत का कोई भी विश्वविद्यालय शीर्ष 300 में नहीं है। गुणवत्ता के मापदंड हैं-शिक्षकों को मिले राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, कितनी खोज की गई तथा पेटेंट के लिए आवेदन और दाखिला। इसके अलावा दुनिया की बड़ी कंपनियों में नौकरी एवं पैकेज तथा शोध का देश-विदेश के जर्नलों में प्रकाशन। आईआईटी एवं आईआईएम के पास न जमीन की कमी है, न पैसे की। फिर ये दुनिया के शीर्ष संस्थानों में अपनी जगहें क्यों नहीं बना पाते? यहां पढ़ाने वालों को मोटा वेतन मिलता है, फिर भी वे देश छोड़कर क्यों चले जाते हैं? ये मेरिट वाले दुनिया की श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले संस्थानों से अपनी तुलना क्यों नहीं करते? खुद मेहनत कर उत्तम बनने और बनाने की बात छोड़ विदेश में हुए शोध और ज्ञान के बल पर कब तक काम चलता रहेगा? तमाम भ्रांतियां हैं कि आरक्षण से शिक्षा में गिरावट आई है। जबकि विश्वविद्यालयों में एक प्रतिशत प्रोफेसर भी आरक्षित वर्ग से नहीं हैं। नीचे स्तर पर कुछ अध्यापक पिछले एक-दो दशकों से आने लगे हैं। आजादी के बाद से अधिकतर शिक्षक सवर्ण वर्ग से ही थे। वे ज्ञान, विज्ञान और शोध को आगे क्यों नहीं बढ़ा सके?
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रूड़की के प्रोफेसरों की मानसिकता देश को पीछे ले जाने के लिए जिम्मेदार है। मेरिट केवल अंक प्राप्त करने से नहीं बनती। उसमें व्यावहारिक ज्ञान भी होना चाहिए। स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रो. अश्विनी देशपांडे और मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रो. थॉमस वेक्सकोफ ने अध्ययन किया कि अनुसूचित जाति/जनजाति के कर्मचारियों अधिकारियों की वजह से सरकारी कामकाज की गुणवत्ता पर असर नहीं पड़ा, बल्कि कुछ क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ा। यह ठीक है कि आरक्षित वर्ग के छात्रों को परीक्षा में कम नंबर मिलते हैं। लेकिन बाद में वे किसी से कम नहीं साबित होते। हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय में अफरमेटिव ऐक्शन लागू है, जो आरक्षण का ही पर्याय है। फिर भी वहां गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आई है।
-लेखक भाजपा सांसद हैं