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Pakistan: आतंकवाद को पोषित करने का खामियाजा

Fri, 03 Feb 2023 05:47 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 03 Feb 2023 05:47 AM IST
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सार
पेशावर में आतंकी हमले में सौ से ज्यादा लोग मारे गए। खैबर पख्तूनख्वा में लोगों ने इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया, पर उन्हीं में से कुछ को जेल में डाल दिया गया, जो आतंकवाद के प्रति इस्लामाबाद की नीति के बारे में बताता है।
 
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Pakistan: The brunt of nurturing terrorism
Blast inside a mosque in Quetta - फोटो : Twitter

विस्तार

पेशावर में हाल ही में हुए आतंकवादी हमले से पाकिस्तान के लोग नाराज हैं। उनका कहना है कि बहुत हो चुका। लेकिन आम लोगों को नागरिक और सैन्य नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित करने वाला ईमानदार या सक्षम नेतृत्व नहीं है। पाकिस्तान के नागरिक और सैन्य नेतृत्व ने संयुक्त रूप से मुल्क को आपदा के रास्ते पर ला खड़ा किया है, और इस बात की तत्काल कोई उम्मीद नहीं है कि यह जल्द ही सुधार के रास्ते पर होगा।



किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। पतन के कारण दीवार पर लिखे हुए हैं, जिसे हर कोई पढ़ सकता है और सैन्य नेतृत्व ने अपने भाषणों में इसे स्पष्ट किया है। सेना प्रमुख के रूप में विवादास्पद तीन साल के सेवा विस्तार के बाद जनरल कमर जावेद बाजवा ने अपनी वर्दी उतारने से पहले कबूल किया कि उच्च शक्तिशाली सैन्य प्रतिष्ठान द्वारा राष्ट्रीय राजनीति में दशकों के असांविधानिक दखल ने समय-समय पर इसे सार्वजनिक आलोचना का पात्र बनाया। उन्होंने कहा था, 'मेरा मानना है कि पिछले 70 वर्षों से सेना का राजनीति में दखल रहा है, जो असांविधानिक है। इसलिए पिछले साल फरवरी में सेना ने काफी विचार-विमर्श के बाद यह फैसला किया कि वह भविष्य में किसी भी राजनीतिक मामले में कभी दखल नहीं देगी। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि हम इसके लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।'


साधारण और समझदार पाकिस्तानी के लिए यह कोई बड़ा आश्चर्य नहीं था, लेकिन तब यह सवाल पूछा गया कि 70 साल के नुकसान की भरपाई आखिर कौन करेगा? हालांकि, यह स्वीकार करना होगा कि जब भी मुल्क में बड़ी उथल-पुथल होती है और लोग कुशासन और भ्रष्टाचार से तंग आ जाते हैं, तो वे स्वत: ही उससे उबरने के लिए सेना की ओर देखते हैं। ऐसी गलती बार-बार की गई है। और जब भी मुल्क में मार्शल लॉ घोषित किया गया है, हमने नेताओं और आम लोगों को गलियों में नाचते और मिठाई बांटते देखा है। पर इससे उम्मीद के मुताबिक लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होने लगती हैं और मुल्क पहले से ज्यादा कमजोर हो जाता है।

इस हफ्ते पेशावर में पुलिस लाइन की मस्जिद पर भीषण आत्मघाती हमले की भीषणता बताने के लिए ही मैंने पाकिस्तान की इस पृष्ठभूमि का विस्तार से जिक्र किया। हालांकि इस बदनसीब खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में कई बार आतंकी हमले हुए हैं, लेकिन इस बार विशेषज्ञ हमले की भीषणता और भारी नुकसान को देखकर हैरान हैं। दरअसल आतंकी हमले के बाद पूरी छत ही नमाजियों के ऊपर गिर गई, जिसमें सौ से ज्यादा लोग मारे गए और दर्जनों लोग घायल हो गए। सवाल पूछा जा रहा है कि इस हमले में किस तरह के गोला-बारूद का इस्तेमाल किया गया, जिससे एक बड़ी छत नीचे गिर गई, क्योंकि यह सामान्य पैटर्न नहीं है, जिसमें आम तौर पर पास की दीवारें, दरवाजे और खिड़कियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। जांच जारी है और अधिकारियों का कहना है कि इसमें लंबा समय लगेगा।

सवाल यह भी है कि इतने भारी वजन का बम लेकर कोई मस्जिद के भीतर आसानी से कैसे जा सकता है, जबकि एक आम इंसान को कई सुरक्षा जांचों से गुजरना पड़ता है। क्या इस हमले को मस्जिद के भीतर से अंजाम दिया गया था? क्या आतंकी पुलिस में से ही कोई था? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब मारे गए लोगों के परिजनों को मिलने ही चाहिए। यह पूरी तरह से खुफिया विभाग की विफलता थी, क्योंकि पुलिस लाइन अत्यधिक सुरक्षित क्षेत्र में स्थित है, जहां सेना के कोर कमांडर के कार्यालय सहित महत्वपूर्ण सरकारी भवन भी हैं। यह एक बड़ी सुरक्षा चूक होने के साथ-साथ दोषपूर्ण आतंकवाद-विरोधी नीति का भी सबूत थी, जो कि एक बार फिर विफल साबित हुई।

एक युवा पीएच.डी. स्कॉलर फहद हुमायूं का कहना है, 'अब यह साफ है कि पाकिस्तान को आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों की एक जटिल शृंखला से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए तत्काल कुछ राजनीतिक स्थिरता की आवश्यकता है।' लेकिन हम अतीत से कोई सबक सीखना नहीं चाहते हैं, क्योंकि वर्ष 2012 में एक अन्य सेना प्रमुख, जनरल अशफाक परवेज कयानी ने एबटाबाद में स्वतंत्रता दिवस पर सैनिकों से बात करते हुए पाकिस्तान के सामने मौजूद कई प्रमुख मुद्दों की ओर इशारा किया था। उनमें अर्थव्यवस्था की खतरनाक स्थिति, कुशासन, भ्रष्टाचार और नागरिक सुविधाओं का तेजी से बिगड़ना शामिल था। लेकिन तत्कालीन सैन्य प्रमुख ने उन मुद्दों का कोई हल नहीं बताया कि मुल्क इससे कैसे बाहर निकलेगा। वर्ष 2012 से लेकर साल 2023 तक मुल्क में कुछ नहीं बदला है।

यह कोई रहस्य नहीं है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान खैबर पख्तूनख्वा के कई हिस्सों में फिर से सिर उठा रहा है। इलाके के कुछ लोगों ने इसके संकेत दिए थे और 'आतंकवाद नहीं' की मांग को लेकर कई शांति मार्च भी हुए थे, लेकिन इलाके के लोगों को गंभीरता से लेने के बजाय कुछ लोगों को अलग-अलग आरोपों में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।  पुलिस लाइन मस्जिद पर हमले के बाद अंग्रेजी दैनिक द डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा, ‘चरमपंथी गुटों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैलियां आयोजित करने के लिए जगह तलाशना जारी रखा, यहां तक कि चुनाव में अपने उम्मीदवार भी उतारे। इसके विपरीत पश्तून तहफुज मूवमेंट (पीटीएम) के नेताओं-मंजूर पश्तीन और अली वजीर जैसे व्यक्तियों का उत्पीड़न किया गया, जो चेतावनी दे रहे थे कि आतंकवादी (उनमें से कुछ राज्य के संरक्षण में) एक बार फिर आदिवासी बहुल जिलों में पांव पसार रहे हैं।’ 

वजीरिस्तान के मौजूदा सांसद अली वजीर शांति की मांग के कारण कई वर्षों से कराची जेल में बंद हैं। दिलचस्प है कि जब भी उनके वोट की जरूरत होती है, उन्हें नेशनल असेंबली के स्पीकर के आदेश पर संसद में लाया जाता है और फिर वापस जेल ले जाया जाता है। पेशावर के ताजा आतंकवादी हमले पर टिप्पणी करते हुए राजनीतिक टिप्पणीकार जाहिद हुसैन आतंकी समूह टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के साथ बातचीत के पिछले प्रयासों का जिक्र करते हुए कहते हैं, 'इस तरह की गोपनीय सौदेबाजी ने न केवल मुल्क को आतंकवाद का केंद्र होने का अवसर प्रदान किया है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्र की सुरक्षा को भी कमजोर किया है।'    

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