फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Pakistan's stonewalling in SAARC

सार्क में पाकिस्तान ही है अड़ंगा

Thu, 29 Sep 2016 06:51 PM IST
महेंद्र वेद
महेंद्र वेद Updated Thu, 29 Sep 2016 06:51 PM IST
विज्ञापन
Pakistan's stonewalling in SAARC
महेंद्र वेद

भारत के साथ अफगानिस्तान, भूटान और बांग्लादेश ने 19वें सार्क शिखर सम्मेलन में भाग लेने से इन्कार करने के बाद यह बैठक रद्द हो गई है और निकट भविष्य में इसके आयोजित होने की कोई संभावना नहीं है। संभवतः यह माना जा रहा था कि अहंकारी गुस्से और हताशा में पाकिस्तान खुद ही इसकी औपचारिक घोषणा कर देगा। सार्क के आठ में से चार सदस्य देशों द्वारा नवंबर में पाकिस्तान के मुर्री में प्रस्तावित सम्मेलन से पीछे हटने के बावजूद पाकिस्तान ने कहा है कि वह तय कार्यक्रम के अनुसार सार्क शिखर सम्मेलन आयोजित करेगा। उसका यह साहस उस सार्क चार्टर के विपरीत है, जिसमें कहा गया है कि अगर सदस्य देशों में से एक भी सरकार का प्रमुख शिखर बैठक में हिस्सा नहीं लेता है, तो शिखर सम्मेलन स्वतः स्थगित या रद्द हो जाएगा।

विज्ञापन


ऐसी संभावना है कि पाकिस्तान को मालदीव का समर्थन मिल सकता है, जहां की सरकार असंतोष को कुचलने के कारण वैश्विक जांच के दायरे में है और जिसने कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों की नाराजगी मोल ली है। इससे परे, नेपाल, जो कि सार्क का मौजूदा अध्यक्ष है और जहां सार्क सचिवालय है, फिलहाल तटस्थ रहकर दूसरे देशों के कदम उठाने की प्रतीक्षा करेगा। इस मामले में पाकिस्तान के दोस्त चीन की तरफ से नेपाल के माओवादी प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड पर दबाव बनाने की कोशिशों से इन्कार नहीं किया जा सकता। अब नेपाली प्रधानमंत्री किस पक्ष में जाते हैं, यह देखने वाली बात होगी। रही बात श्रीलंका की, तो महिंदा राजपक्ष के शासनकाल में वह पाकिस्तान का मित्र था, लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना को मुद्दों और समय की बेहतर समझ है। अब यह देखने वाली बात है कि आने वाली सर्दियों में पाकिस्तान के प्रसिद्ध सैरगाह मुर्री को दक्षिण एशियाई देशों के नेताओं की गर्मागरम बहस का गवाह बनने का मौका मिलता है या नहीं।
विज्ञापन


वैसे पाकिस्तान चाहे जो कहे या करे, लेकिन मुर्री में होने वाले सार्क सम्मेलन को रद्द ही माना जाना चाहिए। यह दक्षिण एशियाई देशों के इस समूह के लिए एक बड़ा झटका है, जिसने कभी यूरोपीय संघ या आसियान या दक्षिणपूर्वी एशियाई निकाय की तरह सामंजस्य नहीं दिखा पाया।
विज्ञापन
विज्ञापन


याद किया जा सकता है कि सार्क का जन्म भी संदेहों के बादल तले हुआ था, जब बांग्लादेश के भारत विरोधी सैन्य शासक जनरल जियाउर रहमान ने अमेरिका के प्रोत्साहन पर इसका प्रस्ताव किया था, जो शीतयुद्ध के दौर में भारत को नियंत्रित करना चाहता था। पाकिस्तान के जियाउल हक के उभार के चलते भारत के गुस्से के कारण 1985 में ही सार्क आकार ले सका।

हालांकि अतीत में भी सार्क सम्मेलन स्थगित हुए हैं, लेकिन सार्क को यह झटका सामान्य नहीं है, क्योंकि भारत के साथ अफगानिस्तान और बांग्लादेश भी हैं, क्योंकि पाकिस्तान से उन्हें भी समस्याएं हैं। अफगानिस्तान में तालिबान को पाकिस्तान से समर्थन, पनाह, पैसे और हथियार मिलते हैं। लगभग दो वर्षों की कोशिश के बाद अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तान के खिलाफ यह कदम उठाया है।

उधर बांग्लादेश 1971 के मुक्ति संग्राम के युद्ध अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चला रहा है और दोषियों को दंडित कर रहा है, जिसका पाकिस्तान विरोध करता है। पाकिस्तान के इस विरोध को बांग्लादेश अपने आंतरिक मामलों में 'हस्तक्षेप' मानता है। चूंकि जिन युद्ध अपराधियों के खिलाफ बांग्लादेश में मुकदमा चलाया गया और उन्हें दोषी ठहराया गया, उन लोगों ने मुक्ति योद्धाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और बंगाली बुद्धिजीवियों की हत्याएं की थीं और पाकिस्तानी सेना की मदद की थी, इसलिए इस्लामाबाद का दोषी विवेक उसे चुप रहने की अनुमति नहीं देता। पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली ने ढाका की इस कार्रवाई के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव पारित किया। 45 वर्ष बाद भी पाकिस्तान अपने पूर्वी प्रांत के खोने को स्वीकार नहीं कर पाया है।

मुर्री शिखर सम्मेलन पहले से ही संकट में था। इस्लामाबाद द्वारा आयोजित मंत्री स्तरीय बैठक का बांग्लादेश और अफगानिस्तान ने बहिष्कार किया था। भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह इस्लामाबाद गृह मंत्रियों की बैठक में क्यों गए थे, यह एक रहस्य है। जब कश्मीर घाटी में अशांति थी, तब वहां जाना एक गलत फैसला था।

उड़ी में भारतीय सेना के कैंप पर आतंकवादी हमले के बाद नई दिल्ली ने पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन से दूर रहने का फैसला किया। उस हमले के बाद भारत ने न सिर्फ दृढ़ता से पाकिस्तान की निंदा की, बल्कि वैश्विक मंच पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश में जुट गया। उड़ी हमले के तुरंत बाद राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को एक आतंकी देश बताया।

जब तक पाकिस्तान अड़ंगा है, तब तक सार्क सम्मेलन की संभावना धूमिल है। वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की रणनीति के तहत भारत अन्य सार्क देशों से समर्थन जुटा रहा है। यह खेल लंबा चलेगा और भारत के जल्दी नरम पड़ने की संभावना नहीं है।

भारत सार्क का सबसे बड़ा देश है, न सिर्फ आकार और अर्थव्यवस्था में, बल्कि आबादी के मामले में तो बाकी सभी राष्ट्रों की कुल आबादी से भी ज्यादा है। लेकिन क्षेत्रीय व्यवस्था में भारत को पाकिस्तान से निपटना होगा, जो न केवल दूसरा बड़ा देश है, बल्कि अक्सर उसके कदम विघटनकारी होते हैं। नतीजतन, सार्क के 31 वर्षों से इतिहास में उसके कामकाज की प्रगति पर भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी की छाया रही है।


सार्क सम्मेलन की विफलता भले ही थोड़ी देर के लिए दक्षिण एशियाई देशों की एकता के लिए बड़ा झटका महसूस हो, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार की यह रणनीतिक जीत है, जो पाकिस्तान को अलग-थलग करने में जुटी है। पाकिस्तान भारत पर सार्क चार्टर के साथ 'विश्वासघात' करने का रोना रो सकता है। लेकिन भारत अकेला नहीं है, बल्कि अभी तो खेल शुरू हुआ है, जो इस क्षेत्र और दुनिया के सामने उजागर होना है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed