पाकिस्तान अमन नहीं चाहता
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यह स्पष्ट करते हुए मैं इस लेख की शुरुआत करती हूं कि मैं कोई पागल किस्म की देशभक्त नहीं हूं, लेकिन जब भी किसी पाकिस्तानी राजनेता या जनरल से अमन शब्द सुनती हूं, तो मुझे बहुत गुस्सा आता है। पिछले सप्ताह जब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने लगा, तब इमरान खान ने टीवी पर आकर फिर से यह कहा कि उनकी तरफ से अमन-शांति लाने, बातचीत का सिलसिला शुरू करने की पूरी कोशिश रही है, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री ने उनका सुझाव ठुकरा दिया है। खान साहब खिलाड़ी रहे हैं आधी उमर तक, सो शायद इतिहास उन्होंने कम पढ़ा होगा, वर्ना वह बहुत पहले जान गए होते कि अमन-शांति की कोशिश भारत ने बहुत, बहुत बार की है। लेकिन जवाब में मिला युद्ध या आतंकवादी हमले। इतिहास में क्या जाना, जब सुबूत के लिए नरेंद्र मोदी का ही कार्यकाल काफी है।
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नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में पाक प्रधानमंत्री को बुलाया। लेकिन पाकिस्तान की सेना ने उन्हें बदनाम करके राजनीति से हटाने के प्रयास शुरू कर दिए। इस दौरान उरी और पठानकोट में जैश-ए-मोहम्मद के हमले हुए। पठानकोट हमले के बाद मोदी ने आईएसआई अधिकारियों को पठानकोट आकर अपनी आंखों से वह जगह देखने की इजाजत दी, जहां हमला हुआ था। लेकिन लौटकर उन अधिकारियों ने कहा कि पाकिस्तान का हाथ होने का कोई सुबूत उनको नहीं मिला।
इमरान खान की तरफ से करतारपुर गलियारा खोलने की पहल हुई, तो मोदी ने अपने वरिष्ठ सिख मंत्री समारोह में भेजे। बर्लिन की दीवार गिराने से इसकी तुलना की। कुछ दिन शांति रही, फिर पुलवामा का वह हमला हुआ, जिसमें सीआरपीएफ के चालीस जवान मारे गए। अगर भारत उसी तरह कुछ न करता, जिस तरह हमने 26/11 के बाद किया था, तो मुझे भारतीय होने पर शर्म आती। मेरा मतलब बिल्कुल साफ है : भारत और पाकिस्तान के बीच शांति नहीं है, तो इसके लिए पाकिस्तान के सैनिक शासक जिम्मेदार हैं। ऐसा इसलिए कि अगर कभी शांति का माहौल बन जाता है, तो पाकिस्तान के लोग सेना पर इतना खर्च क्यों बर्दाश्त करते रहेंगे, जितना आज हो रहा है? ऊपर से पाक सेना का शासन में इतना दखल है कि इमरान खान का दर्जा इस्लामाबाद के महापौर के बराबर है।
इमरान खान कहते तो हैं कि कश्मीर का मसला हल हो जाए, तो अमन-शांति अपने आप कायम हो जाएगी। लेकिन मैं विनम्रता से अर्ज करना चाहती हूं खान साहब कि यह बिल्कुल बकवास है। आपके सैन्य प्रमुख आपको धोखे में रख रहे हैं। अगर कश्मीर ही दो देशों के बीच समस्या होती, तो मुंबई पर हमला क्यों हुआ? बनारस के मंदिर में आतंकवादी हमले क्यों हुए? दिल्ली और मुंबई के झावेरी बाजार में हमले क्यों हुए? दाऊद इब्राहिम द्वारा 1993 में मुंबई में वह हमला क्यों करवाया गया था, जिसमें सैकड़ों बेगुनाह मारे गए थे?
सच तो यह है कि युद्ध और सीमा पर तनाव पाकिस्तान के सैनिक शासकों के हित में है। अमन-शांति में उनका हित बिल्कुल नहीं। जब तक इस यथार्थ में परिवर्तन नहीं आता, तब तक भारत और पाकिस्तान के बीच शांति भी नहीं आ सकती है। ज्यादातर हम उसी किस्म के माहौल की उम्मीद कर सकते हैं, जैसा हम दो देशों के बीच में बना हुआ है। पहले पाकिस्तान में आम लोग कहा करते थे कि इस अशांति का कारण यह है कि भारत ने कभी पाकिस्तान का अस्तित्व स्वीकार नहीं किया। सच तो यह है कि पाकिस्तान को भारत का अस्तित्व चुभता है। उसे भारत की सफलता स्वीकार नहीं है।