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परिदृश्य: इस्लामी पड़ोसियों से परेशान पाकिस्तान, अचानक मित्र बन गए शत्रु

Wed, 27 Mar 2024 07:43 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Wed, 27 Mar 2024 07:43 AM IST
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सार
पाकिस्तान के कुछ पड़ोसी, जो दशकों से मित्र थे, अचानक शत्रु बन गए। ईरान और अफगानिस्तान से हाल ही में पाकिस्तान की झड़प हो चुकी है, जबकि पिछले कुछ वर्षों से भारत-पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम लागू करने का निर्णय लिया, जिसके कारण कई वर्षों से सीमा पर माहौल शांतिपूर्ण है। 
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Pakistan Conflict with neighbours Iran and Afghanistan long time friends and ceasefire on LoC with India
Iran President Syed Ebrahim Raisi- Pakistan PM Shehbaz Sharif - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

लोक ज्ञान कहता है कि कोई भी देश अपने पड़ोसियों को नहीं चुन सकता, उसे अपने पड़ोसियों के साथ सह-अस्तित्व में रहना होता है। वर्ष 2023 में पाकिस्तान के कुछ पड़ोसी, जो दशकों से मित्र थे, अचानक शत्रु बन गए, जबकि जिसे उसने हमेशा अपना दुश्मन माना, वह अच्छा मित्र बन सकता है। पाकिस्तान चार देशों से घिरा है, जिनमें से दो-ईरान और अफगानिस्तान इस्लामी मुल्क हैं। बाकी दो देश हैं-उसका सबसे करीबी सहयोगी चीन और उसके पूर्व में भारत, जिसके साथ नियंत्रण रेखा पर लगातार झड़पें होती रहती हैं। भारत की सीमा पर दोनों ओर से हमले होते रहे हैं, जिससे दोनों तरफ के कश्मीरियों और उनकी संपत्ति को भारी नुकसान हो रहा था। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों से दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम लागू करने का निर्णय लिया। युद्धविराम संधि के कारण कई वर्षों से माहौल शांतिपूर्ण है।



पाकिस्तान तब हैरान रह गया, जब कुछ हफ्ते पहले ईरान ने बलूचिस्तान के अंदरूनी इलाकों पर बमबारी की। जिन इलाकों पर बमबारी की गई, वे शहरों एवं कस्बों से बहुत दूर रेतीले रेगिस्तान और पहाड़ों में स्थित थे। ईरान ने कहा कि यह हमला पाकिस्तान के खिलाफ नहीं, बल्कि कुछ ईरान-विरोधी गुटों के खिलाफ था, जो पाकिस्तान से ईरान के खिलाफ आतंकवादी हमले करते थे। अगले ही दिन, पाकिस्तानी वायु सेना ने पाकिस्तान-ईरान सीमा पर हमला किया, जिसमें कई लोग हताहत हुए। पाकिस्तान ने कहा कि उसने ईरान के अंदर उन आतंकवादी शिविरों पर हमला किया, जिनका इस्तेमाल ये आतंकवादी पाकिस्तान के खिलाफ हमले करने के लिए करते थे।


वैसे इस वाकये से हैरान ईरान ने अपनी ही सरकार के भीतर कुछ मजबूत तत्वों को दोषी ठहराया, जिन्होंने ईरान की घरेलू समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए इस अवसर का उपयोग करने की कोशिश की थी। पाकिस्तान को ईरान की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट हो गया कि वह सीमा के दोनों ओर पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों को सुधारना चाहता है और स्थिति नियंत्रण में प्रतीत होती है। जैसा कि एक विश्लेषक ने कहा, यह न केवल दोनों पड़ोसियों के लिए अच्छा है, बल्कि इस क्षेत्र के लिए भी अच्छा है। स्थिति को और अधिक बिगड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि इसका प्रभाव पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए विनाशकारी होगा।

उसके बाद अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान का विवाद बढ़ गया, क्योंकि पाकिस्तान के उत्तरी इलाके वजीरिस्तान में तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने आतंकवादी हमला किया, जिसमें सेना के दो अधिकारी मारे गए और कई घायल हो गए। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने धमकी देते हुए कहा कि पाकिस्तान पर हुए इस हमले को गंभीरता से लिया जाएगा और पाकिस्तान इसका जवाब देगा। अगली सुबह पाकिस्तानी वायु सेना के बमवर्षकों ने अफगानिस्तान के भीतर हमला किया और टीटीपी के कुछ शिविरों को नष्ट कर दिया। हालांकि फिलहाल वहां शांति और सन्नाटा है।

जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया था, तो पाकिस्तान ने अंतरिम सरकार का स्वागत किया था। उसे उम्मीद थी कि एक बार नई सरकार काम करने लगेगी और कानून-व्यवस्था में थोड़ा सुधार होगा, तो वह यह सुनिश्चित करेगा कि टीटीपी अफगानिस्तान से पाकिस्तान की धरती पर आतंकी हमले न करे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान ने यह संदेश देने के लिए हर कूटनीतिक उपायों का इस्तेमाल किया। कई उच्च स्तरीय सैन्य और असैन्य प्रतिनिधिमंडल काबुल गए। उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया था कि पाकिस्तान को किन बातों पर आपत्ति है और वह अफगानिस्तान की जमीन से आतंकवादी हमलों को बर्दाश्त नहीं करेगा। पर अफगानिस्तान ने इन चेतावनियों को नजरंदाज कर दिया है।

अंततः पाकिस्तान ने हजारों अवैध अफगान शरणार्थियों एवं प्रवासियों को वापस भेज दिया, जिससे काबुल नाराज हो गया। फिर पाकिस्तान ने खैबर पख्तूनख्वा में लैंडीकोटल सीमा और बलूचिस्तान में चमन सीमा पर ट्रकों को गुजरने की अनुमति नहीं देते हुए व्यापार बंद कर दिया। तालिबान सरकार ने इसकी शिकायत की और आश्वासन दिया कि वह टीटीपी को नियंत्रित करेगी। फिलहाल टीटीपी के लगभग 6,000 आतंकवादी अपने परिवारों के साथ अफगानिस्तान में शरण लिए हुए हैं, जिनमें से अधिकांश को तब सैन्य अभियान चलाकर पाकिस्तान से बाहर कर दिया गया था, जब वे सख्त शरिया नियमों और पाकिस्तान के और भी इस्लामीकरण की मांग करने लगे।

जैसा कि एक विश्लेषक का कहना है, 'टीटीपी वस्तुतः अपने अफगान समकक्ष अफगान तालिबान का विस्तार बन गया है और हैरानी की बात नहीं कि अमेरिकी युद्ध की समाप्ति और अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों में भारी वृद्धि हुई है।' टीटीपी के ताजा हमलों के बाद पाकिस्तान ने आतंकी हमलों के लिए सीधे तौर पर तालिबान शासन को जिम्मेदार ठहराया है। उत्तरी वजीरिस्तान में ताजा आतंकवादी हमले के बाद आईएसपीआर ने एक बयान में कहा, 'अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार न केवल आतंकवादियों को हथियार दे रही है, बल्कि अन्य आतंकवादी संगठनों के लिए सुरक्षित पनाहगाह भी प्रदान कर रही है और साथ ही पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं में भी शामिल है।'

ईरान और अफगानिस्तान, दोनों ने पाकिस्तानी वायु सेना की ताकत देखी है। पाकिस्तान की तुलना में ईरान की वायु सेना छोटी और कम प्रभावी है और वह इस बात को जानती है। अफगानिस्तान के पास वायु सेना है ही नहीं, लेकिन जवाबी कार्रवाई के तौर पर वह सीमा पार भारी जमीनी हथियारों का इस्तेमाल करेगा।

पाकिस्तान में ऐसी आवाजें जोर-शोर से उठ रही हैं कि अफगान तालिबान के साथ और अधिक राजनयिक जुड़ाव की जरूरत है, क्योंकि दोनों पक्षों के ऐसे सैन्य अभियानों से क्षेत्रीय शांति पर भी गंभीर असर पड़ेगा। टीटीपी पर लगाम लगाने या उसे बाहर निकालने के लिए काबुल पर दबाव बनाना होगा, जो द्विपक्षीय संबंधों में गिरावट का कारण है। साथ ही, पाकिस्तान चीन जैसे दोस्तों और मजबूत सहयोगियों से उम्मीद करता है कि वे उसकी शिकायतों को अफगानिस्तान तक पहुंचाएं, जो वहां भारी निवेश कर रहे हैं।

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