वर्णमाला से बाहर होने की पीड़ा

सरिता बरारा Updated Tue, 04 Dec 2012 10:45 PM IST
pain of being out of alphabet
हमारे देश में ज्यादातर विकलांग बच्चे शिक्षा से इसलिए वंचित रह जाते हैं, क्योंकि सामान्य स्कूल उन्हें दाखिला देने से इनकार करते रहे हैं और हर किसी के पास विशेष स्कूलों में ऐसे बच्चों को भेजने के लिए न तो पैसा है, न जरिया। लेकिन संसद ने इस वर्ष शिक्षा के अधिकार के कानून में संशोधन कर समावेशी शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है, जिसके तहत कोई भी सरकारी और सरकार से वित्तीय सहायता पाने वाला स्कूल छह से 14 वर्ष की उम्र के किसी बच्चे को उसकी विकलांगता के कारण प्रवेश से इनकार नहीं कर सकता। एक अन्य संशोधन के तहत गंभीर रूप से विकलांग बच्चों को घर पर ही पढ़ाने की व्यवस्था की बात की गई है।

विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर एक नए कानून के मसौदे में भी समावेशी शिक्षा को लाजिमी किए जाने का प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि हर विकलांग बच्चे को न केवल शिक्षा, बल्कि खेलकूद, मनोरंजन और दूसरी गतिविधियों में भी समान अवसर प्रदान किए जाएं। स्कूल के भवन, परिसर और वे सभी सुविधाएं उन्हें उपलब्ध कराई जाएं, जिनसे उनकी आवाजाही बिना किसी रुकावट के हो सके और उनका शैक्षिक और सामाजिक विकास सही ढंग से हो सके।

हमारे देश में अच्छे कानूनों की कमी नहीं है, पर समस्या उन्हें लागू करने की है। जहां तक शिक्षा के अधिकार की बात है, इसे इस वर्ष के अंत तक लागू कर दिया जाना चाहिए, पर इसके लिए अभी लंबा सफर तय किया जाना है। सचाई तो यह कि आज की तारीख में भी स्कूलों में 30 से 35 प्रतिशत सामान्य अध्यापकों के स्थान रिक्त पड़े हैं। विकलांग बच्चों के लिए विशेष तौर से प्रशिक्षत अध्यापकों की जरूरत जहां पहले ढाई लाख आंकी गई थी, समावेशी शिक्षा के तहत यह संख्या और ज्यादा हो जाएगी।

ऐसे अध्यापकों की संख्या अभी लगभग 50,000 के करीब है और हर वर्ष केवल 300 से 400 अध्यापक ही विशेष शिक्षा में प्रशिक्षत होकर निकलते हैं। ऑल इंडिया ब्लाइंड कंफेडरेशन के महासचिव जे एल कौल के अनुसार, सभी बी एड अध्यापकों के लिए ब्रेल में प्रशिक्षण अनिवार्य करने का एक प्रस्ताव लंबे समय से यूजीसी के पास लंबित है। यदि उसे अमली जामा पहना दिया जाए और इन सभी अध्यापकों को मूक और बधिर छात्रों को पढ़ाने के लिए साइन लैंग्वेज में प्रशिक्षण दिया जाए, तो विशेष अध्यापकों की कमी काफी हद तक पूरी की जा सकेगी।

जहां तक पढ़ाने के लिए उपकरणों की उपलब्धता का सवाल है, तो स्थिति दयनीय है। कौल के अनुसार, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, पंजाब, पूर्वोत्तर राज्यों सहित अन्य राज्यों में दृष्टिबाधित बच्चों के लिए बुनियादी जरूरत की पाठ्य पुस्तकें तक ब्रेल में उपलब्ध नहीं। बाधा रहित भवनों और परिसरों के निर्माण के लिए कानूनों के पालन के लिए कई राज्यों ने तो अभी तक कोई नियम बनाए ही नहीं हैं, और जहां ये नियम बन चुके, वहां भी अकसर खुले रूप से इनकी अवहेलना की जाती है।

स्कूलों की स्थिति भी कोई संतोषजनक नहीं है। पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों तथा गांवों में तो समस्या और विकट है। भारत में पैदा हुए लेखक फिरदौस कांगा ने अपनी किताब हैवन्ज ऑन व्हील्ज में लिखा था कि भारत के बाहर जाकर ही उन्हें एहसास हुआ कि विकलांग व्यक्ति भी आसानी से बिना किसी की मदद के घूम सकता है और अपनी विकलांगता को लेकर होने वाली असमर्थता के एहसास से मुक्ति पा सकता है।

आजादी के लगभग 50 वर्षों के बाद 1995 में पहली बार विकलांग व्यक्तियों को मुख्यधारा में लाने के लिए एक व्यापक कानून बनाया गया था और अब एक नए कानून का मसौदा तैयार किया गया है। यह बात और है कि वर्तमान कानून काफी हद तक कागजों में ही धूल चाट रहा है। शिक्षा और रोजगार में तीन प्रतिशत कोटे को लागू करने के लिए विकलांग व्यक्तियों को कभी प्रदर्शनों और कभी अदालतों तक का सहारा लेना पड़ता है। आशा है कि समावेशी शिक्षा से नई पीढ़ी की सोच बदलने में सहायता मिलेगी, क्योंकि विकलांग बच्चों के साथ जब सामान्य कहलाए जाने वाले बच्चे भी पढ़ेंगे, तो वे उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील हो सकेंगे और उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जा सकेगा।

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