{"_id":"b6fa43e6-85b0-11e2-9052-d4ae52bc57c2","slug":"p-chidambaram-has-known-his-limitations","type":"story","status":"publish","title_hn":"अपनी सीमाएं जान गए हैं वित्त मंत्री","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
अपनी सीमाएं जान गए हैं वित्त मंत्री
Updated Tue, 05 Mar 2013 09:51 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वर्षों बाद हमारे किसी वित्त मंत्री ने इतना सच्चा बजट पेश किया है! यह बजट चीख-चीखकर कह रहा है कि आज देश उस चौरस्ते पर खड़ा है, जहां से आगे इसी दिशा में कोई और रास्ता खुलता नहीं है। आंकड़े कभी सच बोलते नहीं हैं, बल्कि उनका सबसे अधिक इस्तेमाल सच को छिपाने या झूठ पर परदा डालने के लिए किया जाता है।
विज्ञापन
बजट तो सारा का सारा आंकड़ों का ही खेल होता है और ऐसे खेल में देश को उलझाना या भरमाना ही बजट बनाना कहा जाता रहा है। चिदंबरम भी अब तक ऐसी ही करते आए हैं। इस बार वह ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि देश-दुनिया के आर्थिक हालात ऐसे हैं कि आप बहुत कुछ छिपा नहीं सकते।
विज्ञापन
और वह भी तब, जब सामने एक ऐसा चुनाव खड़ा हो, जो कांग्रेस को जीने या मरने में से कोई एक को चुनने की चुनौती दे रहा है। इस चुनाव की पराजय कांग्रेस और नेहरू परिवार को बहुत पीछे धकेल देगी। इस लिहाज से कांग्रेस ने अब सारे परदे गिराकर जनता के बीच असली कपड़ों में जाने का फैसला किया।
विज्ञापन
हमने देखा है कि हर वित्त मंत्री कभी इधर का पैसा उधर, तो कभी उधर का पैसा इधर करता है। वह हमारी छोटी व खाली जेब में सीधे हाथ डालता है और संतुलन का भ्रम बनाने के लिए, जिनकी बड़ी व भरी जेबें हैं, उन्हें भी कुछ निकालने को कहता है। ऐसा करते हुए वह हमेशा सावधान रहता है कि वह उनसे जो कुछ भी निकालने को कह रहा है, वह सारा वे किसी दूसरे रास्ते से वापस पा सकें, यह भी व्यवस्था कर दे। इसलिए हमने कभी नहीं देखा कि किसी बजट के बाद जीने के आवश्यक संसाधन पहले की तुलना में सस्ते हुए हों या सरकारी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा हो।
मसलन, किसी एक बजट में खेती के लिए तो ज्यादा पैसे रखे गए हों, मगर यह नहीं देखा गया कि किसी सरकार ने कोई ऐसी व्यवस्था भी साथ की हो, जिससे कोई बीज या खाद या फिर बिजली या सिंचाई के पानी के दाम न बढ़ा दे।
चिदंबरम भी ऐसा कर सकते थे, लेकिन वह डर गए। अर्थशास्त्रियों से भरी यह सरकार आर्थिक सवालों के संदर्भ में ही अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है और आलम यह है कि बहुत अविश्वसनीयता के बाद भी चुनाव में विश्वसनीयता नाम का यह तत्व आज भी मतलब रखता है, अन्यथा कोई कारण नहीं था कि 'इंडिया शाइनिंग' वाले चुनाव नहीं जीतते।
चिदंबरम ने इस बजट के माध्यम से यह स्वीकार किया है कि अर्थव्यवस्था को मंदी से बाहर निकालने का काम इस मॉडल द्वारा जहां तक संभव था, वहां तक हो गया। इससे अधिक यह कुछ नहीं कर सकता है। इसलिए उन्होंने पैसों का खेल कम किया और कर-तंत्र में बड़ा परिवर्तन भी नहीं किया है। मैं निर्भया कोष या महिला बैंक जैसी अर्थहीन घोषणाओं की चर्चा इसलिए ही कर रहा हूं, क्योंकि इनका मतलब मात्र चुनावी है।
महिला हिंसा और बलात्कार तो हम रोक नहीं सकते, सो इसकी शिकार महिलाओं की देखभाल के लिए कोष बना देते हैं। महिला बैंक का अर्थ है कि सरकार हर बैंक में (तथा दूसरी वित्तीय संस्थाओं में) महिलाओं के लिए आरक्षित रोजगार की बात संभव नहीं कर पा रही है।
सरकार ने देख लिया है कि महंगाई का पेट भरने के लिए वह इसमें जितनी धनराशि उड़ेलती है (बेलआउट), उसका अधिकांश हिस्सा महंगाई और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा जंगल सरकारी खाते में ही आसन जमाए बैठा है। सरकार इन सब चुनौतियों के सामने निरुपाय है। इसलिए आज की स्थिति बनी रहे, बस इतना जतन उसने किया है।
मनमोहन अर्थतंत्र की मुश्किल क्या है? सवाल को सीधे तरीके से पूछूं, तो कह सकता हूं कि जिस आधुनिक अर्थशास्त्र के मनमोहन सिंह पंडित हैं, उसकी मुश्किल क्या है? उसकी मुश्किल यह है कि वह छपे नोट को ही पूंजी मानती है और उसकी बढ़ोतरी को ही ग्रोथ या विकास वृद्धि कहती है। यह बजट मुझे इसलिए अच्छा लगा कि इसने अपनी सीमा कबूल कर ली है। भले ही उसने ऐसा कहा न हो और हमने ऐसा सुना न हो। जो कहा न गया हो उसे सुनने-समझने का इल्म हमें इस बजट से ही हासिल हो, तो क्या हमें मनमोहन-सरकार के इस कार्यकाल के आखिरी बजट का आभारी नहीं होना चाहिए?