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पानी का प्रकोप और बेपानी तंत्र
विजय त्रिपाठी
Updated Tue, 18 Jun 2013 11:21 PM IST
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उत्तराखंड के टिहरी बांध के इंजीनियर एसोसिएशन के अध्यक्ष त्रिलोक सिंह नेगी फोन पर हैरानी जताते हैं कि जिस जलाशय को आम तौर पर भरने में डेढ़ महीने लगते हैं, वह रविवार रात 12 बजे से सोमवार दिन के दो बजे तक, यानी 14 घंटे में ही भर गया!
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टिहरी बांध के इतिहास में इतने तेज बहाव से पानी कभी नहीं आया। करीब आधे दिन में 25 मीटर पानी। नेगी के मुताबिक, अलकनंदा नदी के चार हजार क्यूसेक पानी ने तबाही मचा दी है, जबकि टिहरी बांध ने भागीरथी और भिलंगना में बारिश का करीब पांच हजार क्यूसेक पानी रोके रखा। अगर यह पानी भी अलकनंदा से मिल जाता, तो इस खतरनाक संगम से हरिद्वार और ऋषिकेश उफनाने लगते।
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गर्मी से उमसते उत्तराखंड को मानसून की इतनी जल्दी और जबर्दस्त दस्तक की उम्मीद नहीं थी। बारिश और कुदरती आपदा के सबसे पहले शिकार बनने वाले उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग ने इस बार भी सबसे ज्यादा वज्रपात सहा। मौसम विभाग मानसून की आमद के साथ ही अति सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के शैतानी गठजोड़ को इस सर्वनाश की वजह बता रहा है, लेकिन आपदा का अंदाज लगा पाने और आपदा से पार पाने या फिर आपदा के बाद राहत दे पाने का हमारा तंत्र दुरुस्त ही नहीं हो पा रहा है।
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उत्तरकाशी में तीन साल पहले आई कुदरती आपदा के जख्म और निशान अभी तक बाकी हैं, सरकारी तंत्र आज तक उन ठिकानों को दुरुस्त नहीं कर पाया है। प्रकृति का प्रकोप नए-नए रास्ते बना रहा है, लेकिन उससे निपटने का हमारा तंत्र दिन-प्रतिदिन सुन्न होता जा रहा है।
चार दिन की इस गुस्सैल बारिश ने कम से कम यह तो बता ही दिया है कि प्रकृति और पर्यावरण से छेड़छाड़ करोगे, तो कहीं के नहीं रहोगे। इन दिनों देहरादून में प्रकृति के बीच प्रवास कर रहे और बारिश में अपनी कुटिया डूबते देखते रहे विख्यात पर्यावरण आंदोलनकारी सुंदरलाल बहुगुणा कहते हैं कि उम्र के आठ दशक में वर्षा का ऐसा प्रलयंकारी रूप पहली बार देखा। जरूरत इससे सबक और सीख लेने की है।
वह नसीहत देते हैं कि सरकारें विकास के रास्ते विनाश ला रही हैं। प्रकृति से छेड़छाड़ बंद न हुई, तो ये खतरनाक दौर रुकने वाला नहीं। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल जोशी भी सरकारों के कथित विकासपरक सोच को विध्वंसक बताते हुए अविवेकी तरह से बिछाए जा रहे सड़कों के जाल को लेकर चिंता जताते हैं।
जिम्मेदार और जवाबदेह लोग हर बार की ही तरह इस बार भी लंबी तान सोए पड़े हैं। नदी-नाले और गदेरों की हद बांधने के लिए बस्तियों किनारे बनाई जा रही सुरक्षा दीवारें सहलाने भर से ही भसक जा रही हैं और कहीं-कहीं तो खनन माफिया ही सुरक्षा दीवारों के पत्थरों का खनन कर ले गया।
आपदा से निपटने के लिए किए जाने वाले निर्माण व बचाव कार्यों पर जनता का अविश्वास इससे समझा जा सकता है कि उत्तरकाशी में कई जगह नदी किनारे के गांवों ने फसलें नहीं बोईं कि क्या फायदा बाढ़ सब बहा ले जाए! राज्य की चिंता बस हाथ फैलाने भर की ही रहती है। दुर्भाग्य यह कि केंद्र से आए पैसे का भी उपयोग नहीं हो पा रहा है। राज्य में नकारा आपदा प्रबंधन तंत्र की पोल कोई पहली बार नहीं खुली है। हर साल मानसून में और कुदरती आपदा के हर मौके पर राज्य की जनता सत्ता की काहिली की सजा भुगतती है।
आपदा प्रबंधन की दिशा में सरकारी कोशिशें राहत और बचाव का भी काम नही कर पा रही हैं। सुस्ती की मिसाल इससे बड़ी क्या होगी कि साल 2010 में राज्य में आपदा के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील घोषित 233 गांवों में से एक भी गांव का सरकार विस्थापन नहीं कर सकी है। जानलेवा मुहानों पर बसे इन गांवों की तादाद अब करीब 450 हो गई है। निश्चित तौर पर चालू मानसून इस आंकड़े को और बढ़ा देगा।
साठ हजार से ऊपर चारधाम यात्री इन चार दिनों में जगह-जगह फंसकर सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोल चुके हैं, अब आगे 12 साल बाद होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा है, जो अगस्त में खतरनाक घाटियों और अलंघनीय पर्वतों के बीच शुरू होनी है। इस ऐतिहासिक धार्मिक-सांस्कृतिक यात्रा की तैयारियों की गत और गति से भी यह तय है कि इसके निर्विघ्न आयोजन के लिए देवभूमि को दुआओं के सहारे ही रहना होगा।