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वतन लौटने का सुख
दिलीप गुप्ते
Updated Tue, 14 Jan 2014 11:29 PM IST
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'देखो सड़कें एकदम चकाचक हैं!' साफ-सुथरी सड़कें देखकर वे अचरज में पड़ गए। अपने घर का फर्श भी इतना चिकना और साफ नहीं है। और सभी देश की सड़कों की दुर्दशा पर अफसोस करने लगे।
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'यहां तो सड़क पर बैठ भी जाओ, तो कपड़े गंदे न हों। कितनी साफ जैसे धुली चादर बिछा दी गई हो। गड्ढे भी नहीं। बस का सफर करते हुए कोई पेंटिंग भी कर सकता है। उफ, हमारे यहां की सड़कें, पैर की हड्डी सिर में पहुंच जाए।'
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'क्या बात कही है। अपने यहां तो ऐसी सड़कें बन ही नहीं सकतीं। अगर बनें भी, तो इतना कमीशन बना लें, ये नेता-अफसर कि सात पीढ़ियां तर जाएं।'
एक जगह कोच रुकी। बस में बैठे सभी लोग बेचैन हो उठे। ये हॉर्न क्यों नहीं बजाता? सामने वाले से हटने को क्यों नहीं कहता? ड्राइवर ने बताया कि यहां हॉर्न बजाना जंगलीपन समझा जाता है।
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'और अपने यहां विशेषाधिकार! इतनी देर में तो पें-पें पों-पों से कान फट जाते।' उनका यह कहते ही सब हंस पड़े। सबको अपना देश पिछड़ा लगने लगा।
'देखो न कितनी सफाई है! सड़क पर जरा भी कचरा नहीं है। हमारे यहां तो, सड़क पर चल रहे हैं या कचरे पर, पता ही नहीं चलता। कब सुधरेगा हमारा देश?' सब ग्लानि से भर उठे।
वे जितनी जगह देखने जा रहे थे, उनके देशप्रेम का ग्राफ गिरता जा रहा था। वे गमगीन हो उठे। काश, ऐसा सिस्टम हमारे यहां भी होता! अब हम वतन लौटकर सभी को बताएंगे कि वहां सड़क पर कचरा फैलाना मना है। गाइड ने पहले ही चेता दिया था कि च्यूइंगम चबाने पर भी जुर्माना किया जा सकता है। पान-तंबाकू-गुटखा तो एकदम नहीं चलेगा।
दर्शनीय स्थल देखते समय भारत से आए सभी सैलानी ऊंची-ऊंची इमारतें देखकर अपने देश के बौनेपन पर तरस खा रहे थे। सभी की एक ही राय थी- कुछ नहीं है अपने देश में। ये देखो, कांच और स्टील से बनी खूबसूरत इमारत। अगर अपने यहां ऐसी इमारत बनी, तो इतना स्टील खरीदने में कितना कमीशन बनेगा। सबने माना कि बहुत भ्रष्ट है हमारा देश।
वापसी का दिन आया, तो परदेस प्रेम की हवा धीरे धीरे दूर होने लगी थी। थूकने तक की आजादी नहीं। ‘इतनी कड़क तो सास भी नहीं होतीं।’ सबकी पत्नियों ने कहा।
कई बहसों के बाद तय यह हुआ कि यह देश भले ही अपने देश से अच्छा हो, पर अपने को तो रहना अपने ही देश में है।