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सोने का विकल्प भी तो लाइए
जयंतीलाल भंडारी
Updated Wed, 06 Feb 2013 09:35 PM IST
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बढ़ते बजट घाटे से परेशान सरकार ने पिछले दिनों सोने के आयात पर अंकुश लगाने के लिए इसका आयात शुल्क चार फीसदी से बढ़ाकर छह प्रतिशत कर दिया है। इससे घरेलू बाजार में सोने के दाम में इजाफा होगा, और इसकी मांग कम होगी। इससे सरकारी रिकॉर्ड में सोने का आयात भले कम हो जाए, लेकिन तस्करी से आने वाला सोना बढ़ जाएगा।
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इस सिलसिले में रिजर्व बैंक के वर्किंग ग्रुप ने सोने का आयात घटाने के जो सुझाव दिए हैं, वे भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उसने कहा है कि सोने से जुड़े मुद्दे पर टिकाऊ नीति बनाई जानी चाहिए। यदि निवेशकों के पास सोने जैसे ही वास्तविक रिटर्न और तरलता वाले फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स उपलब्ध कराए जाएं, तो आयातित सोने की मांग कम हो सकती है। जब महंगाई ऊंचे स्तर पर हो, तब सोने में निवेश के अतिरिक्त लाभ होते हैं। इस संदर्भ में महंगाई सूचकांक से जुड़े बांड उतारे जाने चाहिए। निश्चय ही सोने से जुड़े वित्तीय उत्पाद लाने पर आयातित सोने के तौर पर वास्तविक रूप से सोने की मांग घट सकती है।
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चूंकि इस समय लोग बाजार में उपलब्ध कम रिटर्न वाले निवेश विकल्पों की तुलना में सोने को रिटर्न के हिसाब से सबसे उपयुक्त मान रहे हैं, इसीलिए बाजार में अब तक के सबसे ऊंचे मूल्य स्तर पर पहुंचने के बाद भी सोने की मांग बढ़ती गई है। इतना ही नहीं, यदि सोने के विकल्प नहीं खोजे गए, तो दीर्घकाल में भी सोने की मांग में कमी मुश्किल है।
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असल में इस समय सोने की खरीद ऐसा सुरक्षित और लाभप्रद निवेश है, जिससे अन्य किसी भी बचत योजना की तुलना में अच्छा रिटर्न मिल रहा है। फिक्स्ड इनकम इनवेस्टमेंट, बैंक डिपोजिट, फिक्सड डिपोजिट और ऐसे ही निवेश विकल्पों में रिटर्न आठ से नौ फीसदी है। लेकिन महंगाई दर के लगभग इसी स्तर पर रहने से रिटर्न शून्य या ऋणात्मक हो जाता है।
इसके अलावा पीपीएफ जैसे निवेश विकल्पों में तरलता नहीं है, क्योंकि इसमें जमा कराई गई धनराशि में से कोई भी तुरंत अपना पैसा प्राप्त नहीं कर सकता। जबकि कोई भी किसी भी समय बाजार में सोना बेचकर तुरंत नकद धनराशि प्राप्त कर सकता है। इसी कारण महंगा होने के बावजूद लोगों का रुझान सोने की खरीदारी की ओर तेजी से बढ़ता गया है।
वस्तुतः पिछले पांच वर्षों में सोने के आयात में जितना धन खर्च किया गया, यदि उसकी तुलना इस दौरान विभिन्न तरह की बचतों में किए गए निवेश से करें, तो कई सवाल खड़े होते हैं। पिछले पांच साल में सोने के आयात पर खर्च किया गया धन इस दौरान विभिन्न प्रकार के बीमा कराने वालों द्वारा सभी बीमा कंपनियों को दिए गए कुल प्रीमियम से भी अधिक था।
यही नहीं, सोने के आयात की राशि देश भर में शेयरों, म्यूचुअल फंड में लगी राशि या आवास क्षेत्र, छोटी बचत, भविष्य निधि, डाकघर बचत आदि की तुलना में कई गुना अधिक थी। तथ्य यह भी है कि अपने यहां पिछले दस वर्षों में रिटर्न के मामले में सोने ने शेयरों को बहुत पीछे कर दिया है। वर्ष 2002 से 2012 के बीच सोने ने करीब 16 फीसदी की दर से रिटर्न दिया, जबकि शेयर बाजार ने 11 फीसदी की दर से।
चीन के बाद भारत सोने का दूसरा बड़ा आयातक देश है। यहां गरीब भी अपनी बचतों से छोटी-छोटी स्वर्ण वस्तुएं खरीदता है। इस तरह सोने की बढ़ती मांग के परिणामस्वरूप देश को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। हर साल देश के सकल घरेलू उत्पाद का तीन फीसदी सोने के रूप में कम उत्पादक पूंजी में बदल रहा है और इस वजह से अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में गिरावट आ रही है।
ऐसे में सोने की मांग और आयात घटाने की बात तो ठीक है, लेकिन रिजर्व बैंक और सरकार को निवेशकों व उपभोक्ताओं के परिप्रेक्ष्य में भी सोचना होगा। सोने के ऐसे विकल्प लाने होंगे, जिनमें तरलता भी हो और रिटर्न दरों पर बढ़ती महंगाई दर का असर कम हो।
सरकार द्वारा छोटी बचतों को आकर्षक बनाने की भी जरूरत है। सच यह है कि कम ब्याज दर ने बचत और निवेश को प्रभावित किया है। बचत पर आकर्षक ब्याज होने से लोग कम जरूरी खर्चों को छोड़कर बचत बढ़ाते हैं। इसी तरह सोने में निवेश करने वालों के कदम शेयर बाजार की ओर मोड़ने के लिए शेयर बाजार में लोगों का विश्वास बढ़ाना होगा।