फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   opposition unity forum way to victory in 2024 lok sabha elections

विपक्षी एकता मंच: जीत का रास्ता निकलेगा...लेकिन खुद से 'हारना' होगा

Sun, 30 Apr 2023 06:40 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 30 Apr 2023 06:40 AM IST
विज्ञापन
सार
भाजपा अपराजेय नहीं है। लक्ष्य यह नहीं है कि प्रत्येक राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी कितनी सीटें जीत सकती है, बल्कि अधिकतम सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों को हराना है। सभी विपक्षी दलों को जीतने के लिए झुकना होगा। ऐसे में कई जगह ऐसा भी हो कि प्रमुख पार्टी के अपने उम्मीदवार को ही सीट देने से इनकार किया जाए।
loader
opposition unity forum way to victory in 2024 lok sabha elections
Nitish Kumar and Tejashvi Yadav - फोटो : Social Media

विस्तार

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। भारतीय जनता पार्टी देश की सबसे बड़ी पार्टी है, अमीरी में भी। पिछले लोकसभा चुनाव (2019) में भाजपा के सारे उम्मीदवारों ने कुल पड़े मतों में से 37.4 फीसदी मत हासिल किए थे। कांग्रेस के उम्मीदवारों ने 19.5 फीसदी मत हासिल किए थे। कई क्षेत्रीय और राज्य विशेष की पार्टियां भी हैं, जिनका खासा प्रभाव है और वे कई राज्यों में शासन में भी हैं।



दरअसल भारत का चुनावी नक्शा एक बहुरंगीय राजनीतिक पच्चीकारी जैसा है। भाजपा का लक्ष्य, जो कि छिपा नहीं है, इसे एक वर्णी पच्चीकारी बनाना है। विपक्षी दलों (जो भाजपा का विरोध करते हैं) का लक्ष्य केंद्र से भाजपा को बेदखल कर एक उदार, प्रगतिशील और समावेशी सरकार बनाना है।


चुनौती
2014 के बाद के हर चुनाव में भाजपा पार्टी या उसके घोषणापत्र के नाम पर नहीं, बल्कि श्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगती है। वह इस हद तक चली गई है कि वह कर्नाटक के मतदाताओं से, यह राज्य 10 मई को नई सरकार चुनेगा, अपील कर रही है कि 'कर्नाटक मोदी को सौंप दें'। भाजपा के लिए हर क्षेत्र से श्री मोदी ही उम्मीदवार हैं। भाजपा सोचती है कि उसे अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए 'हर जगह मोदी' का होना पर्याप्त होगा।
 
आज की स्थिति में ऐसा लगता है कि विपक्षी दलों के पास ऐसा कोई एक आम नेता/उम्मीदवार नहीं है, जिसके पीछे वे चलने को तैयार हों। यह स्थिति बदल भी सकती है, लेकिन हम आज की स्थिति पर गौर करेंगे। इस प्रतीत होने वाले नुकसान को घटाकर, विपक्षी दलों के पास कई लाभ और ताकतें हैं, और इस आलेख का उद्देश्य यह पता लगाना है कि विपक्षी दल अपनी ताकत का लाभ कैसे उठा सकते हैं।

कुछ चरम विकल्पों की जगह नहीं हो सकती। विपक्षी दल 1977 की जनता पार्टी की तरह आज एकजुट होकर किसी एक नई पार्टी का गठन नहीं करेंगे और वे ऐसा नहीं कर सकते। कोई भी विपक्षी दल किसी राज्य की पूरी जगह किसी अन्य दल को नहीं सौंपेंगा। मना करने की अपील के बावजूद, आप ने उत्तराखंड (2022) और कर्नाटक (2023) और तृणमूल कांग्रेस ने गोवा (2022) में चुनाव लड़ा। इसलिए, जबकि कुल विपक्षी एकता वांछनीय है, यह संभव नहीं लगता।

विपक्षी एकता का मंच
विकल्प है, एक अपोजिशिन यूनिटी प्लेटफॉर्म (ओयूपी) यानी विपक्षी एकता मंच। एक ओयूपी के लिए जरूरी होगा कि प्रत्येक पार्टी अन्य दलों को रियायत दे और अन्य दलों से मिली रियायत से लाभ अर्जित करे। इस योजना की रूपरेखा मोटे तौर पर इस तरह है:
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चार कॉलम बनाएं और प्रत्येक राज्य/केंद्र शासित प्रदेश को उपयुक्त कॉलम में रखें (संख्या लोकसभा सीटों की संख्या को दर्शाती है)
बेशक, यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि अनेक राज्यों में भाजपा 'प्रमुख' विपक्षी दल से अधिक प्रभावशाली है ( उसके पास लोकसभा में 302 सीटें हैं)

मेरे दृष्टिकोण में यदि विपक्षी एकता मंच बनता है, तब कांग्रेस वैध तरीके से करीब 209 सीटों पर भाजपा के खिलाफ लड़ाई में नेतृत्व करने की उम्मीद कर सकती है। इसी तरह सपा, तृणमूल कांग्रेस, राजद, जनता दल (यू), द्रमुक, बीआरएस और आप में से कोई अन्य विपक्षी दल करीब 225 सीटों में नेतृत्व कर सकता है। तीन राज्यों में दो या तीन दल भाजपा को चुनौती देने के लिए नेतृत्व करने की स्थिति में हैं। 53 सीटों वाले सात राज्यों में, विजेता पार्टी भाजपा की गुप्त सहयोगी हो सकती है।

एक अनिवार्य नियम
अगला कदम:
 विपक्षी एकता मंच के दलों को स्वेच्छा से इस नियम का पालन करना चाहिए कि संबंधित राज्य की प्रमुख पार्टी उस राज्य में अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ेगी, वहीं प्रमुख पार्टी सीटें ऐसे उम्मीदवारों को देने को बाध्य होगी, जिसके जीतने की सर्वाधिक उम्मीद हो, चाहे वह किसी अन्य विपक्षी पार्टी से क्यों न हो। इसका मतलब यह भी है कि कई जगह ऐसा भी हो कि प्रमुख पार्टी के अपने उम्मीदवार को ही सीट देने से इनकार किया जाए। लक्ष्य यह नहीं है कि प्रत्येक प्रमुख पार्टी कितनी सीटें जीत सकती है, बल्कि अधिकतम सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों को हराना है। सभी विपक्षी दलों को जीतने के लिए झुकना होगा।



अंकगणित सरल है। भाजपा 150 से अधिक सीटें जीतने की स्थिति में है। विपक्षी दलों में अकेले कांग्रेस सौ से ज्यादा सीटें जीतने की स्थिति में है। हर अन्य विपक्षी पार्टी, भले ही उसके पक्ष में लहर हो, अधिकतम 40 सीटें जीत सकती है, लेकिन साथ में, वे एकजुट होकर 150 सीटों तक जीत सकती हैं। भाजपा अपराजेय नहीं है। यदि विपक्षी दल स्वेच्छा से उस योजना का समर्थन करते हैं, जिसे मैंने रेखांकित किया है, तो जीत का एक विश्वसनीय रास्ता निकल सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed