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केवल विरोध के लिए विरोध
सुधांशु रंजन
Updated Tue, 19 Mar 2013 01:09 PM IST
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अति विशिष्ट व्यक्तियों के लिए 12 हेलिकॉप्टर अगस्ता-वेस्टलैंड से खरीदे जाने के बारे में उजागर हुए घोटाले की जांच के लिए सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति के गठन का प्रस्ताव राज्यसभा में पारित करवा दिया।
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लेकिन मुख्य विपक्षी दल भाजपा सहित जद(यू), बीजद, वामपंथी दलों, तेलगुदेशम पार्टी, अन्नाद्रमुक तथा तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया है कि इस तरह के घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति सही एजेंसी नहीं है, क्योंकि उसके पास जांच का अपना कोई तंत्र नहीं है। विपक्ष की मांग थी कि केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा इसकी जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हो।
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सरकार का यह तर्क सही है कि जिस विपक्ष ने 2जी घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग को लेकर 2010 में संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बाधित कर दिया, उसे इस बार उसी के गठन पर आपत्ति है। हेलीकॉप्टर खरीद का मामला 4,040 करोड़ रुपये का है, जिसमें कथित तौर पर 370 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई।
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घूस किसने दी, यह साफ हो चुका है और विगत फरवरी में इटली में फिनमेकानिका के रक्षा ग्रुप के मुखिया की गिरफ्तारी भी हो गई। इसी गिरफ्तारी के बाद भारत में मामले ने तूल पकड़ा। विपक्ष जानना चाहता है कि रिश्वत किसे दी गई। सरकार भी तकनीकी रूप से यही जानना चाहती है। लेकिन जांच के तरीके पर उसमें और विपक्ष में मतैक्य नहीं है।
यह तथ्य है कि जांच की कोई एजेंसी न तो सर्वोच्च न्यायालय के पास है, न संयुक्त संसदीय समिति के पास। लेकिन सीबीआई जांच की निगरानी जब-जब अदालत ने की है, तो अधिकतर में सकारात्मक परिणाम आए हैं, चाहे वह चारा घोटाला हो या 2जी।
हवाला मामले में सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी के बावजूद कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। निगरानी का अर्थ जांच करना नहीं, बल्कि जांच की कमियों को पकड़ना होता है। अगर यह काम अदालत कर सकती है, तो संयुक्त संसदीय समिति क्यों नहीं। केवल विरोध के लिए विरोध नहीं होना चाहिए।
वैसे संयुक्त संसदीय समितियों के अब तक के काम का लेखा-जोखा बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं है। वह केवल अनुशंसा कर सकती है, जिसे मानना या ठुकराना सरकार पर निर्भर है। ऐसी पहली समिति की स्थापना 1987 में बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए हुई थी। बी. शंकरानंद की अध्यक्षता में गठित समिति की 50 बैठकें हुईं, जिसने अप्रैल, 1988 में रिपोर्ट दी।
विरोधी दलों ने इसका बहिष्कार इस आधार पर किया था कि इसमें कांग्रेसी सदस्यों की भरमार थी। दूसरी संयुक्त संसदीय समिति 1992 में राम निवास मिर्धा की अध्यक्षता में प्रतिभूति घोटाले की जांच के लिए गठित की गई थी, जिसका खलनायक हर्षद मेहता था। इसकी रिपोर्ट न तो पूरी तरह स्वीकार की गई, न ही लागू की गई।
तीसरी संयुक्त संसदीय समिति का गठन 2001 में स्टॉक मार्केट घोटाले की जांच के लिए हुआ। चूंकि उस समय राजग की सरकार थी, इसलिए भाजपा के नेता इसके अध्यक्ष बनाए गए। इसने दिसंबर, 2002 में रिपोर्ट दे दी, किंतु इसकी कई अनुशंसाओं को नहीं माना गया।
ऐसी चौथी समिति अगस्त, 2003 में शीतलपेयों में कीटनाशकों की जांच के लिए बनाई गई। समिति ने फरवरी 2004 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें इसकी पुष्टि की गई कि शीतलपेयों में कीटनाशक होते हैं। अंतिम संयुक्त संसदीय समिति का गठन 2 जी घोटाले की जांच के लिए फरवरी 2011 में किया गया, जिसकी रिपोर्ट आनी बाकी है।
लिहाजा यह तो सही है कि संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई है। पर सांसदों को तय करना होगा कि विधायिका कार्यपालिका को किस तरह जिम्मेदार बना सकती है। विधायिका का अर्थ ही है कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना। उसमें शासकीय दलों को भी दलगत भावना से ऊपर उठकर ईमानदारी से प्रयास करना होगा।
संसद की समितियां कार्यपालिका पर नकेल कस सकती हैं, बशर्ते सांसद अपनी भूमिका का सही निर्वहन करें। यदि विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति का बहिष्कार करेगा, तो यह बेमानी हो जाएगा। संसद की गरिमा एवं विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि संसदीय समितियों की सार्थकता प्रमाणित हो।