राम मंदिर ही है समाधान
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अयोध्या में इस बार छोटी दीपावली जिस जोश से मनाई गई, शायद ही पहले कभी मनाई गई होगी। सरयू नदी के घाटों पर दो लाख मिट्टी के दीये जलाए गए और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आरती करने स्वयं पहुंचे। उससे पहले हेलिकॉप्टर से राम-लक्ष्मण और सीता के भेस में अभिनेता उतर कर आए। इनका स्वागत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसे किया, जैसे वास्तव में श्रीराम लंका जीतने के बाद लौटकर आए हों। सो अयोध्या से सेक्यूलर किस्म के लोगों को संदेश यही गया है कि भाजपा की प्राथमिकताओं में राम मंदिर का मुद्दा फिर से प्रथम नंबर पर होने वाला है। विपक्ष के बड़े-बड़े राजनेताओं ने टीवी पर आकर सावधान किया कि नरेंद्र मोदी ने, क्योंकि बाकी पत्ते चले नहीं हैं, तो वापस लौटकर सांप्रदायिकता के मुद्दे पर आ गए हैं। लालू यादव के शब्दों में, ‘जब हर जगह फेल हो जाते हैं, तो कम्युनलिज्म फैलाने, देश को बांटने में लग जाते हैं।’
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समस्या यह है कि राम मंदिर हिंदुओं के लिए वास्तव में मुद्दा है। करोड़ों हिंदुओं के लिए आज की अयोध्या वही नगरी है, जहां श्रीराम का जन्म हुआ था। उनके लिए बाबरी मस्जिद सिर्फ एक लुटेरे का बनाया हुआ ढांचा था, जिसे केवल इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया था कि उसके निर्माण से हिंदुओं को हमेशा अपनी औकात याद रहेगी। योगी आदित्यनाथ राम जन्मभूमि आंदोलन के द्वारा राजनीति में आए थे, सो अब जब वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए हैं, तो स्वाभाविक है कि इस मुद्दे को प्राथमिकता देंगे। सवाल यह है कि इस मुद्दे की अहमियत बढ़ने से क्या फिर से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव फैल जाएगा। अगर राम मंदिर की समस्या का शांतिपूर्वक समाधान ढूंढा जाए, तो ऐसा नहीं होगा।
यह तभी हो सकता है, जब अयोध्या में वह ‘भव्य’ राम मंदिर बन जाए, जिसको लेकर सारा आंदोलन चला है। हिंदुत्ववादी कई बार कह चुके हैं कि मंदिर बनकर रहेगा और वहीं बनेगा, जहां श्रीराम का जन्म हुआ था। मुसलमानों का नेतृत्व करने वाले मौलाना और राजनेता अगर इस बार मंदिर का निर्माण रोकते नहीं हैं, तो सरयू नदी के उस पार मस्जिद भी बन सकेगी और सारी समस्या समाप्त हो जाएगी। ऐसा क्यों नहीं हुआ है अभी तक? विनम्रता से अर्ज करना चाहती हूं कि ऐसा होने नहीं दिया गया है।
जिन राजनेताओं और धर्मगुरुओं का अस्तित्व राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ा है, वे नहीं चाहते हैं कि इस समस्या का हल हो, सो जब भी समाधान ढूंढने की कोशिश होती है, ये लोग अड़चन बन जाते हैं। जिनकी रोज़ी-रोटी इस समस्या के जीवित रहने पर निर्भर हो, वे इसका हल ढूंढने के पक्ष में क्यों होंगे? सो राम मंदिर का मुद्दा दशकों से न्यायालयों में अटका रहा है। ऊपर से उन लोगों को बदनाम करने के लिए मुहिम चली है, जो कहते आए हैं कि अयोध्या की इस सबसे बड़ी राजनीतिक और धार्मिक समस्या का समाधान मंदिर का निर्माण ही है। यह मुहिम इतनी कामयाब रही है कि योगी आदित्यनाथ के अयोध्या में दीपावली मनाने के विरोध में सेक्यूलर सेना खड़ी हो गई है।
जिस दिन इस सेक्यूलर सेना को समझ में आएगा कि मंदिर का निर्माण ही समस्या का समाधान है, उस दिन हमेशा के लिए शांति बहाल हो जाएगी। लेकिन ऐसा क्यों होने देंगे वे लोग, जिनका सारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा समाधान मिल जाने से? कहने का मतलब है कि यह ऐसा मुद्दा है, जिस पर रोटियां सिकती हैं सेक्यूलरवादियों की भी और उनकी भी, जो सांप्रदायिक कहलाते हैं।