होली में तो रंग ही जीतते हैं
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फिर आ गई होली। हर साल आती ही है, ठीक उसी ऋतु में, जब बागों में कोयल बोल रही होती है और सेमल के सुर्ख लाल फूल अपनी छटा बिखेर रहे होते हैं। यह बात अलग है कि हर होली के आते-आते अब हर नगर-महानगर में बहुमंजिली इमारतों की संख्या और बढ़ जाती है। कई खेत-मैदान फ्लैटों से ढक जाते हैं या कहें कि पट जाते हैं। और कोयल की बोली हो या सेमल के सुर्ख लाल फूल, उनसे आंखों-कानों की हमारी दूरी और बढ़ जाती है। पर होली तो आखिर होली ही है, भले वह अनगिनत वर्षों में अनगिनत बार हो ली हो, लेकिन लगती हर बरस वह नई है। और बहुतों के लिए तो वह हर तरह से सचमुच नई होती भी है, खासकर उन नन्हे हाथों के लिए, जिन्होंने रंग भरी पिचकारी पहली बार पकड़ी होती है या जो उत्साह से हाथों में शुरू-शुरू में बैलून थामे होते हैं।
सो मैं आजकल यह देख रहा हूं कि होली आने के कई दिन पहले से वे नोएडा के हमारे इलाके में नन्हे सैनिकों की तरह रंग भरी बंदूकें लिए किसी कोने-नुक्कड़ में अपने को तैनात कर ले रहे थे-उन्हें देखकर अच्छा ही लग रहा था, क्योंकि अभी वे नन्हे-मुन्ने, आसन्न लोकसभा चुनाव से बेखबर अपने रंग में डूबे हुए हैं और औरों को भी इसी तरह रंगों से सराबोर करना चाह रहे हैं-बड़े बुजुर्ग तो इन दिनों एक-दूसरे पर रंग डालने की मानो सोच ही नहीं रहे हैं (और वे सचमुच सोच रहे भी नहीं)। वे तो इस समय बस चुनावी रंग और 'कौन बनेगा प्रधानमंत्री' के रंग में ही रंगे हुए हैं। टेलीविजन के खबरिया चैनलों का भी इन दिनों यही हाल है। उनकी बहसों में हुंकार-ललकार ज्यादा है, 'प्यार के बोल' वहां नहीं हैं। टेलीविजन चैनलों के सीरियल-कलाकार जरूर कई दिन पहले से होली मना रहे हैं, पर यह तो हम सभी जानते हैं कि 'बुद्धू बक्से' के रंग उसके भीतर ही रह जाते हैं-वे बाहर छलकने नहीं लगते। सो वे स्वयं भले ही रंगों से रंगे हों, लेकिन हमारे लिए तो वे दूर के दर्शन सरीखे ही हैं।
जो भी हो 'आम चुनाव' जिस बरस होते हैं, उस बरस होली की बात ही कुछ निराली होती है। और इस बार तो 'आप', 'वे', 'हम' और बस 'हम ही हम छाए हैं' के नारे लिए होली खुद चकराई हुई है। कौन कितने पानी में है, यह कहना सचमुच बहुत कठिन है। ऊपर से यह आसमानी पानी है, जो रह-रहकर ओलों सहित बरस रहा है, या बरस चुका है देश के कई इलाकों में। लेकिन होली तो आखिरकार होली है, वह तो मननी ही है, होनी ही है, क्योंकि वह तो एक 'भाव' है, भले ही बाजार-भाव चीजों के बहुत बढ़े हुए हों। सो रंग-गुलाल हैं, गुब्बारे हैं, पिचकारियां हैं और स्याही भी है, जिसे गाहे-बगाहे फेंकने या मलने के किस्से इस चुनावी दौर में बढ़ते ही जा रहे हैं।
और आम्र मंजरियां! उन्हें हम आखिर कैसे भूल सकते हैं। उनका होली से कोई सीधा-रिश्ता भले ही न हो, पर वे भी तो न जाने कब से अपनी-अपनी डालों से होली देख रही होती हैं। और लोग भी इस ऋतु में उन्हें देखा ही करते थे। पर अब किसे फुर्सत है उन्हें देखने और उनकी सुगंध महसूस करने की। लोगों को आम खाने से मतलब है, उनके बनने की प्रक्रिया से नहीं। यों भी अब तो हर चीज डिब्बाबंद है। कौन बनाता है अब फूल-पत्तियों से रंग। आज टेसू की किसे याद है। 'जो बीत गई सो बात गई'-उसका रोना क्या! पर कहां मानता है, न सही बहुतों का, पर कुछ का मन, उन चीजों को याद करने से, जिनमें ज्यादा 'रस' था, ज्यादा अपनापन था और जिनकी अपनी सुंदरता थी। सो, त्योहार के इस अवसर पर रस्मी तौर पर कुछ पकवान अब भी घरों में बन भले ही जाते हों, लेकिन ज्यादातर तो बाजारों के अनुरूप ढल चुके हैं, और मिलते भी बाजारों में ही हैं। दीपावली की मिठाइयों की तरह इन पकवानों में भी मिलावट का डर तो खैर रहता ही है-और उसका डर तो अब हर चीज में बैठ गया है-पर करें भी तो क्या करें। जो मिलावट करता है, उसे इसकी भी चिंता कहां है कि उसके घर के लोग, उसके पड़ोसी और मित्र, भी वही मिलावटी चीज कहीं खा ले सकते हैं! सच तो यह है कि पैसा ही आजकल दुनिया में प्रमुख हो उठा है। उसका रंग इतना गाढ़ा हो चुका है कि उसके ऊपर और कोई रंग चढ़ता ही नहीं है।
पर, नहीं, ऐसा भी क्यों मान लें। होली होली है, वह अपना रंग चढ़ाए बिना रहती नहीं है। और कितना अच्छा है कि वह ऐसा है, और बहुत-बहुत बरसों से ऐसा है। ऐसा है, तो इसलिए कि होली के तरकश में कोई तीन-चार रंगों वाले तीर भर तो हैं नहीं, उसमें तो न जाने कितने-कितने रंग भरे हुए हैं। और इसी का तो कमाल है कि जिन कपड़ों पर वे रंग पड़ते हैं, वहां रंगों का कुछ ऐसा कोलाज बनता है कि वह देखते ही बनता है। रंगों से पुते हुए चेहरे हों या हाथ-पांव, या कपड़े, और वाहन सब एक-सी कहानी कह रहे होते हैं, 'होली है, भाई होली है।'
जो इस अवसर पर रंगों की होली नहीं खेलते, वे भी रंगों के चमत्कारिक प्रभाव से अछूते तो नहीं रहते। यही है होली का महात्म्य और उसकी विजय! चुनावी सर्वेक्षणों की बात भले ही झूठी हो जाए, पर होली को लेकर चाहे जितने सर्वे करा लीजिए, नतीजा यही निकलेगा कि रंग ही जीतेंगे, कोई और नहीं। और यह नतीजा बिल्कुल ठोस होगा। तो आइए, होली को 'सेलिब्रेट' करें, और उसके 'कलर्स' को बेकार न जाने दें। हमारी आज की हिंदी (भी) यही कह रही है। और यही कह रहे हैं पाला और दलबदल नेता कि असल चीज तो चुनावी जंग में जीत का रंग ही है। 'डिफीट' को जैसे भी हो, अपने से दूर रखना है।