सैनिकों के लिए इतने तो उदार बनें
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हाल में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा कि जो देश अपनी सेना का सम्मान नहीं कर सकता, वह फेल हो जाता है। सीमा पर तैनात जवानों की बहादुरी से हर कोई वाकिफ है। लेकिन देखने की बात है कि सैनिकों की बुनियादी जरूरतों को लेकर हमारी सरकारें कितनी गंभीर रही हैं? वन रैंक-वन पेंशन की मांग इसका एक उदाहरण है। वर्ष 1980 के आसपास पहली बार उठी इस मांग को आज करीब 35 साल हो चुके हैं, लेकिन अभी तक आश्वासनों के सिवा यह मांग पूरी नहीं हुई है। अदालतें भी इसके पक्ष में निर्देश दे चुकी हैं। वन रैंक-वन पेंशन का अर्थ है कि अलग-अलग समय पर सेवानिवृत्त हुए एक ही रैंक के दो फौजियों की पेंशन राशि में बड़ा अंतर न रहे। लेकिन अभी एक ही पद से अलग-अलग समय में सेवानिवृत्त हुए फौजियों की पेंशन में दोगुने तक का अंतर है। ऐसे में फौजियों की समान पेंशन की मांग जायज ही लगती है।
दशकों से इंतजार के बावजूद सैनिकों की यह मांग पूरी नहीं हुई है, तो इसकी एक वजह शायद यह है कि फौजी कोई बड़ा वोट बैंक नहीं हैं! वन रैंक-वन पेंशन वर्ष 2004 में यूपीए का चुनावी मुद्दा था, लेकिन 2008 आते-आते तत्कालीन यूपीए सरकार ने मानो इसे खारिज कर दिया। यही वजह रही कि वर्ष 2009 में देश के पूर्व सैनिकों ने राष्ट्रपति को न सिर्फ हजारों मैडल वापस किए, बल्कि अपने खून से हस्ताक्षर वाला ज्ञापन भी सौंपा। किसी मुल्क के लिए इससे दुर्भाग्यपूर्ण क्या होगा कि सैनिकों को अपने वीरता सम्मान लौटाने पड़े। हालांकि इस बीच कुछ कदम उठाए भी गए, लेकिन वे रस्मअदायगी ही ज्यादा थे। वर्ष 2013 आते-आते थोड़ा और दबाव बना। चुनावी वर्ष 2014 के बजट में इसके लिए 500 करोड़ रुपये की घोषणा हुई। लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा में पूर्व सैनिकों से वायदा किया कि उनकी पार्टी के सत्ता में आते ही वन रैंक-वन पेंशन योजना को फौरन लागू किया जाएगा। लेकिन मोदी सरकार को सत्ता में एक साल पूरा होने के बाद भी उनकी मांग पूरी नहीं हो सकी है।
हाल ही में प्रधानमंत्री ने रेडियो पर मन की बात में माना कि वह इसे जितना मानते थे, उतना सरल विषय नहीं है, बल्कि पेचीदा है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि उनकी सरकार इस मसले को हल करके रहेगी। भले इन पेचीदगियों पर खुलकर बात न होती हो, लेकिन पूर्व सैनिकों की मानें, तो दिल्ली में बैठे अफसर नहीं चाहते कि सेना के जवान उनके समकक्ष आएं। तो क्या पिछले साढ़े तीन दशक से मुल्क की नौकरशाही इतनी मजबूत रही है कि प्रधानमंत्रियों को कोई अहम फैसला तक न लेने दे! अगर ऐसा है, तो यह मुल्क के लिए वाकई चिंता की बात है। इस बीच रक्षा मंत्री ने भी पूर्व सैनिकों से धैर्य रखने को कहा है, लेकिन पूर्व सैनिकों की नाराजगी बनी हुई है और वे सरकार के खिलाफ प्रदर्शन के बाद अब भूख हड़ताल पर बैठ चुके हैं।
इस मांग को पूरा करने के लिए अब करीब 20 हजार करोड़ रुपये की जरूरत बताई जा रही है। तो क्या उद्योग जगत को हर साल लाखों करोड़ रुपये की रियायतें देने वाली सरकार सरहद की रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए इतना भी खर्च नहीं कर सकती? बेहतर होगा कि सरकार वन रैंक-वन पेंशन को लेकर ईमानदार पहल करे। समझना होगा कि कम उम्र में रिटायर होकर घर लौटने वाले पूर्व जवानों के लिए इस फैसले के काफी मायने हैं।