राजनीति के पुराने इश्कजादे
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नए नए नैना रे ढूंढे हैं दर-ब-दर क्यूं तुझे
नए-नए मंजर ये तकते हैं इस कदर क्यूं मुझे
इश्क और जिंदगी को लेकर यह एक आशिक के समक्ष पैदा हुई पहेली है। इसमें प्यार के रूपक को वोट के साथ बदल दें और मोहब्बत के प्रति जुनून को सत्ता के प्रति दीवानगी से बदल दें, तो यह बिल्कुल सही तरीके से सत्ता के क्षत्रपों की मुश्किलों को प्रकट कर सकता है। 'आतिशे वो कहां' की चिंता अब 'रंजिशें हैं धुआं' में तब्दील हो गई हैं। कुछ विफल राजनेताओं का एक दल के लिए एकजुट होना वास्तव में अपनी खोई जमीन को पाने का ही संघर्ष है।
पच्चीस वर्ष पहले, जब देश की पचास करोड़ से अधिक आबादी बस जन्मी या जन्म लेने वाली थी, राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बड़ा वोट बैंक तैयार करने और सत्ता पर कब्जा करने के लिए पहचान की राजनीति शुरू की थी। उनके द्वारा संरक्षित पहचान की राजनीति के योद्धा आज वैकल्पिक राजनीतिक संगठन के विचार को जन्म देने की कोशिश कर रहे हैं।
जमीनी वास्तविकता उन्हें उदात्त आदर्श के लिए प्रेरित कर रही है। मोदी सरकार को सत्ता में अभी छह महीने ही हुए हैं, मगर क्षेत्रीय दलों के प्रमुख नेता-लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, देवगौड़ा, ओमप्रकाश चौटाला आदि उन्हें अपने अस्तित्व के लिए संकट के रूप में देख रहे हैं। ध्यान रहे, मोदी लहर में भी बचे हुए राजनीतिक दल-तृणमूल कांग्रेस, अन्नाद्रमुक और बीजद अभी इस गाड़ी में सवार नहीं हुए हैं।
'अबकी बार मोदी सरकार' के विजयोल्लास के बीच भारतीय राजनीति का विशाल भू-दृश्य ध्वस्त अहं और वैचारिकता के शवों से अटा पड़ा है। लोकसभा चुनाव में देश भर में राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों के कुल 960 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और कर्नाटक जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों के गढ़ में भाजपा ने 117 सीटें जीतीं। सिर्फ उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा ने 93 सीटें जीतीं। जद (एस), जद (यू), इनेलो, राजद और सपा ने मिलकर मात्र 15 सीटें जीतीं।
वायदा किया जा रहा है कि ये सभी दल जल्द ही एक नए नाम के साथ एकजुट होंगे। हालांकि अब तक नाम तय नहीं हो पाया है, पर वे जानते हैं कि उनके खिलाफ कौन है-एक ऐसा विशाल रथ, जिसे नरेंद्र मोदी कहा जाता है। गरीब समर्थक होने के अलावा उनके पास ऐसा कुछ नहीं है, जिसके बूते ये मोदी का मुकाबला कर पाएं।
राजनीति, खास तौर पर चुनावी राजनीति, अक्सर इतिहास को दोहराते हुए नष्ट हो जाती है। साठ के दशक ने लोहिया की प्रेरणा से गंगा के मैदानी इलाकों में पहले गैर-कांग्रेसी आंदोलन को सरकार में परिवर्तित होते देखा। सत्तर के दशक ने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में क्षत्रपों को एकजुट होकर जनता पार्टी का गठन करते देखा, और अस्सी के दशक में वीपी सिंह ने कमंडल के खिलाफ मंडल की राजनीति खड़ी की।
लेकिन इसके लिए सबको बांधने वाला विचार और नेतृत्व का स्पष्ट आकर्षण होना जरूरी है। वीपी सिंह ने एक ऐसे राजनेता की छवि पेश की, जिसने पहचान की राजनीति के लिए एक भावनात्मक मुद्दे की योजना तैयार की और दमित-वंचित वर्गों को एकजुट कर ऐसा वोट बैंक बनाया, जिसने चतुर चुनावी गणित के साथ जनता दल को 143 सीटें जीतने में मदद की। राम मंदिर आंदोलन के माहौल में लड़ी गई वह लड़ाई मंडल बनाम कमंडल में तब्दील हो गई। आज के संदर्भ में कमंडल की राजनीति करने वाला मंडल समूह के हितों के रक्षक के रूप में सामने है। मोदी की जीत सिर्फ इसलिए नहीं हुई कि वह हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते थे, बल्कि उनकी पहचान पिछड़े वर्ग के एक ऐसे नेता के रूप में भी थी, जो एक सामान्य चाय वाले का बेटा है।
इन क्षेत्रीय दलों के पास आज न तो राष्ट्रीय स्तर का नेतृत्व है, न स्वच्छ राजनीति का आकर्षण, न वीपी सिंह जैसी राजनीतिक प्रतिभा, बल्कि अशक्त कर देने वाली हार के सिवा इनका कुछ भी साझा नहीं। इस समूह में पांच में से चार पार्टियों ने वंशवादी राजनीति को आगे बढ़ाया है, इनमें से कइयों पर भ्रष्टाचार के धब्बे हैं और सुशासन के मामले में लगभग सबका रिकॉर्ड खराब रहा है। हताश लोगों के इस समूह का एक ही उद्देश्य है- इतिहास रचने का एक मौका पाना। जद (एस), जद (यू), इनेलो, राजद और सपा ने क्रमशः कर्नाटक, बिहार, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में कम से कम विभिन्न कार्यकाल में दस वर्षों तक शासन किया, फिर भी वे अपने वायदे पूरे नहीं कर पाए। इनमें से देवगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री रहे। मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्रीय रक्षा मंत्री रहे। लालू यादव दो बार बिहार के मुख्यमंत्री और केंद्र में रेल मंत्री रहे। नीतीश कुमार दो बार बिहार के मुख्यमंत्री और केंद्र में रेल मंत्री रहे। जबकि ओमप्रकाश चौटाला चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे। इनमें से कोई भी, यहां तक कि वैकल्पिक राजनीति का संकेत देने वाले नीतीश कुमार भी, बदलाव की आकांक्षा रखने वाले मानस को आकर्षित नहीं कर पाए।
कन्फ्यूशियस ने कहा है कि सबसे बड़ी महानता यह नहीं है कि कभी नहीं गिरे, बल्कि यह है कि जब भी गिरे, तो उठकर खड़े हुए। इसलिए लगभग एक दशक तक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए एक दूसरे से अलग रहे नेताओं का अपने अहं को भुलाकर एकजुट होना दिलचस्प तो है ही, पर सच यह है कि इनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। इसके बावजूद यह बेमतलब का प्रयास नहीं होना चाहिए। देश को एक सक्रिय विपक्षी दल की जरूरत है। अगर पहचान की राजनीति के ये योद्धा एक नया विचार दे पाते हैं, यदि जातिगत राजनीति से परे लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सके, तो वे इतिहास को दोबारा लिखने का मौका पा सकते हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो खुद इतिहास बन जाएंगे-चाहे वे एकजुट हों या आपस में लड़ते रहें।
(अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक)