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दफ्तर का हाल: सभी को काम करने का स्वस्थ माहौल मिले... श्रमिकों के अधिकार शीर्ष प्राथमिकता होने चाहिए
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दफ्तरों और कार्यस्थलों पर स्वस्थ कामकाजी माहौल जरूरी (प्रतीकात्मक)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
कोई भी देश अपने युवाओं में तनाव के संकेतों पर ध्यान न देने का जोखिम नहीं उठा सकता। खासकर, विशाल आकांक्षाओं और युवा आबादी की बहुलता वाले देश के लिए युवाओं की चिंताओं के प्रति बेपरवाही बहुत ही घातक हो सकती है। अपने युवाओं के बिना देश का कोई भविष्य नहीं होता। हमें खुदकुशी, काम की अधिकता से होने वाली मौतों, कलहपूर्ण कार्य संस्कृति और शोषणकारी कार्य प्रथाओं जैसी देश के युवाओं को प्रभावित करने वाली डरावनी रिपोर्टों और इनके निहितार्थों पर खुलकर आवाज उठानी चाहिए।ज्यादातर लोग 26 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल की दुखद मौत के बारे में जानते हैं। कथित आरोप है कि उनकी मौत शीर्ष वैश्विक अकाउंटिंग फर्म ईवाई ग्लोबल की पुणे स्थित फर्म एसआर बाटलीबोई में काम की अधिकता के कारण हुई थी। खबरों के मुताबिक नौकरी जॉइन करने के चार महीने बाद पेरायिल की मौत जुलाई में हो गई थी। अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल की मां अनीता ऑगस्टाइन की ओर से भारत में कंपनी के चेयरमैन को लिखा गया पत्र हाल ही में सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से शेयर किया गया। इसमें उन्होंने कहा कि उनकी बेटी की मौत ज्यादा काम करवाने की वजह से हुई।
ऑगस्टाइन ने कहा कि उनकी बेटी ने नई नौकरी की मांगों को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की थी, लेकिन काम की अधिकता, नया माहौल और लंबे समय तक काम करने का असर उसके स्वास्थ्य पर पड़ा। देश का सोशल मीडिया इस होनहार युवा महिला की असमय मौत की वजह से गुस्से और आक्रोश से भरा हुआ है। श्रम मंत्रालय ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है। अर्न्स्ट एंड यंग कंपनी को भारी विरोध वाली प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ रहा है। कंपनी ने एक बयान जारी कर सेबेस्टियन की मौत पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए सभी कर्मचारियों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का वादा किया है। यह बहुत ही भयावह कहानी है, किंतु यह इस तरह की अकेली घटना नहीं है। न ही अधिक काम और तनाव केवल कंपनियों के उच्च अधिकारियों या शीर्ष कंपनियों में कार्यरत लोगों को प्रभावित कर रहा है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि ऐसे देश में जहां शिक्षित लोगों समेत बड़ी संख्या में युवा बेरोजगारी का शिकार हैं और जहां बहुत ज्यादा लोग बेहद सीमित नौकरियों के पीछे भाग रहे हैं, असुरक्षा और तनाव युवाओं को अत्यधिक निराशा के गर्त में धकेल रहा है, जो कभी-कभी उनकी मौत का कारण भी बन रहा है।
अन्ना की कहानी दिल दहला देने वाली है। ऐसी ही कहानी पार्टटाइम डिलीवरी का काम करने वाले 19 वर्षीय जे पवित्रन की है, जिसने इसी माह डिलीवरी में विलंब होने पर एक ग्राहक द्वारा डांटे जाने पर खुदकुशी कर ली। यह युवा बी. कॉम का विद्यार्थी था। पुलिस के अनुसार, चेन्नई के पश्चिमी हिस्से में स्थित कोरात्तुर में पवित्रन को एक महिला ग्राहक के यहां किराने का सामान पहुंचाने में थोड़ा विलंब हो गया था, इस पर महिला ने उसको डांटा था। दरअसल, पवित्रन को उसका घर ढूंढने में कठिनाई हुई थी, जिसकी वजह से उसे विलंब हो गया। महिला ने डिलीवरी कंपनी में शिकायत की और आगे से पवित्रन को दोबारा डिलीवरी के लिए नहीं भेजने के लिए भी कहा।
भारतीय एक सप्ताह में औसतन 46.7 घंटे काम करते हैं, जो जापान (36.6 घंटे), दक्षिण कोरिया (38.16) और चीन (46.1) समेत कई अन्य एशियाई देशों से ज्यादा है। भारत का 51 प्रतिशत कार्यबल साप्ताहिक रूप से 49 घंटे से अधिक काम करता है, जिससे भारत विस्तारित कार्य घंटों के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। इस रैंकिंग में भूटान अपने 61 प्रतिशत कार्यबल के साथ 49 घंटे की सीमा को पार करने के साथ सबसे आगे है। हालांकि, केवल लंबे समय तक काम करना ही नहीं, बल्कि काम का माहौल, शोषणकारी प्रथाओं और गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की कमी के साथ ही सामाजिक सुरक्षा की कमी भी है, जो सामूहिक रूप से हमारे युवाओं पर भारी पड़ रही है।
अन्य देशों की तुलना में भारत में ज्यादातर युवाओं की मौतें खुदकुशी की वजह से हो रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के डाटा के अनुसार, आत्महत्या के सभी मामलों में चालीस फीसदी से ज्यादा मामले तो 30 वर्ष से कम की उम्र वाले युवाओं के हैं। हाल में हुईं मौत और खुदकुशी के मामले चेतावनी दे रहे हैं। ये मामले समग्र माहौल और काम की दुनिया में कदम रखने वाले युवाओं के लिए सहायता तंत्र की कमी की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। इससे भारत में काम और जीवन संतुलन, मानसिक स्वास्थ्य और श्रम नीति के जटिल मुद्दे भी उजागर होते हैं, क्योंकि देश के आधे से अधिक कार्यबल को लंबे समय तक काम करना पड़ता है। इसलिए कुछ मिथकों को तत्काल खत्म करने की जरूरत है। काम की अधिकता और तनावपूर्ण कार्यस्थल उत्पादकता को बढ़ाते कतई नहीं हैं।
हतोत्साहित और तनावपूर्ण कार्यबल भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने और स्थिर समाज के निर्माण में सहायक नहीं होगा। उदाहरण के लिए भारत में कई श्रमिकों (गिग वर्कर्स) को अक्सर अत्यधिक तापमान में काम करना पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थितियां पैदा हो सकती हैं। श्रमिकों के अधिकार शीर्ष प्राथमिकता में होने चाहिए, भले ही वे उच्च स्तरीय कर्मचारी हों या असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक। वर्तमान में भारत में फिलहाल ऐसा कोई केंद्रीय कानून नहीं है, जो असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को लक्षित करते हुए विनियमित करता हो। सामाजिक सुरक्षा के नियम केवल यह परिभाषित करते हैं कि गिग वर्कर्स कौन हैं।
राजस्थान और कर्नाटक ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए कानून जरूर बनाए हैं, लेकिन उनमें भी कमियां हैं। हमें ऐसे स्थायी कार्य वातावरण की जरूरत है, जो स्वास्थ्य और उत्पादकता को बढ़ावा दे और निराश श्रमिकों के परामर्श की व्यवस्था भी कराए। आत्महत्या को रोकने संबंधी परामर्श अधिक व्यापक रूप से सुलभ होने चाहिए। हाल ही में देश में हुईं दुखद मौतों के पीछे बड़ा कारण बढ़ता मानसिक स्वास्थ्य संकट ही है।