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नए दौर में बदल गए हैं आजादी के मायने

Fri, 14 Aug 2015 11:55 PM IST
केतन मेहता
केतन मेहता Updated Fri, 14 Aug 2015 11:55 PM IST
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now the meaning of independence has been changed

पंद्रह अगस्त अगर आजादी के दिन का एक प्रतीक भर बनकर रह जाता है, तो मुझे लगता है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मूल्य नहीं समझ रहे हैं। बाल गंगाधर तिलक ने सौ साल पहले कहा था कि आजादी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। मैं वाकई यह बात मानता हूं कि पूरे विश्व इतिहास में इंसान की जो यात्रा है, वह निरंतर अपनी स्वतंत्रता को हासिल करने का संघर्ष है। व्यक्ति लगातार अधिक से अधिक स्वतंत्रता के लिए लड़ता रहा है। देश के रूप में हमने 1947 में अंग्रेजों से राजनीतिक आजादी हासिल की। 1990 के दशक के बारे कहा जाता है कि हमें आर्थिक आजादी मिली।

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मुझे लगता है कि हाल के वर्षों में दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। तकनीक और जीने के अंदाज बदल गए हैं। ऐसे में हमें पुराने खयालात से आजादी की सबसे ज्यादा जरूरत है। मानसिकता अब गुलाम नहीं रह सकती। इससे हमारे सपने बदलेंगे। बदलते दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर व्यक्तिगत आजादी की सीमाओं को लेकर बहस हो रही है। मैं जरूर मानता हूं कि आजादी की एक सीमा होनी चाहिए और वह है, हिंसा। किसी को भी किसी अन्य के विरुद्ध हिंसा करने का अधिकार नहीं है।
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हम जिस समय में हैं, उसकी युवा पीढ़ी ने गुलामी का दौर नहीं देखा और हमारे दिमाग से भी अब उपनिवेशवादी हैंगओवर खत्म हो रहा है। यह देश और समाज के लिए शुभ संकेत है। नई पीढ़ी में आत्मविश्वास है। वह जानती है कि उसका भाग्य उसके हाथों में है। अब हमें उन चुनौतियों को स्वीकार करना होगा, जो हमारे सामने हैं। वैसे, बगैर चुनौतियों के जीवन में कोई रंग भी नहीं रह जाएगा।
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एक और घटना हो रही है। दुनिया लगातार सिमट रही है। भौगोलिक सीमाएं सदा से कृत्रिम हैं। ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया जो आधुनिक समय में शुरू हुई थी, अब पुनः पलटी नहीं जा सकती, यानी याद रखें कि जो बीत गया, सो बीत गया। राष्ट्रों की सीमाएं भले ही भावनात्मक रूप से जरूरी लगें, लेकिन आर्थिक गतिविधियों में वे महत्व खो रही हैं। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने देश को विजन 2020 दिया था। उनके सपनों को पूरा करने और विकसित राष्ट्र के रूप में पैर जमाने के लिए हमें दो बातों को खत्म करना जरूरी है। एक है लालच और दूसरा डर। लालच से भ्रष्टाचार जन्म लेता है, जबकि विफलता का डर हमें आगे बढ़ने नहीं देता। हमें नई चीजों का स्वागत करना होगा।

इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि अब अपने भविष्य की बागडोर अपने हाथों में लेंगे। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में रह रहे हैं, लेकिन हमें ठोस आत्मविश्वास की जरूरत है। स्वतंत्रता के सच्चे अर्थों पर विचार करते हुए यह देखना जरूरी है कि क्या कमियां हमारे भीतर रह गई हैं, जिन पर जीत हासिल करनी है। एक फिल्मकार होने के नाते मुझे लगता है कि सिनेमा इस मामले में हमारी मदद सकता है।


इसकी वजह यह है कि सिनेमा बताता है कि समाज पर कब-कब किन बातों का असर रहा। कौन-सी बातें समाज को परेशान या उत्साहित करती हैं। आजादी की लड़ाई से लेकर स्वतंत्र राष्ट्र की उम्मीदों तक को हमारे सिनेमा ने पर्दे पर उतारा है। बड़ी संख्या में युवा आबादी की वजह से देश में आज नए उत्साह की उमंग दिख रही है। सोच के स्तर पर लगातार एक नई आजादी की जरूरत महसूस हो रही है। यह भी सिनेमा में देखा जा रहा है। अपने समय को दिखाना सिनेमा का काम भी है।

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