अब किसी के एजेंडे में नहीं है अयोध्या
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अयोध्या में बाबरी मसजिद विध्वंस के आज बीस साल पूरे हो रहे हैं। लेकिन दो दशक पुराने उत्तेजक नारे अब कहीं सुनने को नहीं मिलते। न वह जोश और आवेश ही आज कहीं दिखता है, और न ही विद्वेष की वह पुरानी हवा वहां बहती दिखाई दे रही है। जामा मसजिद के निर्माण के लिए बना ट्रस्ट तथा उसकी गतिविधियां खोजे भी नहीं मिलतीं। अब तो बाबरी मसजिद आंदोलन से जुड़े नेता भी सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि हम विध्वंस स्थल पर मसजिद बनाने के पक्षधर नहीं हैं, यह भूमि खाली पड़ी रहे, यह तो हमें स्वीकार्य है, अन्य कार्य के लिए इसे सौंप भी नहीं सकते।
आम लोग के मन में भी अब वह विवादित स्थल उत्तेजना नहीं जगाते, और अयोध्या से बाहर भी इस स्थल को लेकर उत्सुकता में कमी हुई है। विध्वंस के बाद न्यायमूर्ति वैंकेट चेलैया वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ का निर्णय तो यह आया है कि किसी भी धार्मिक स्थल का अधिग्रहण किया जा सकता है।
अधिग्रहण आदेश में उन्हें एक दोष जरूर दिखा है, जिसमें कहा गया है कि अदालत में विचाराधीन सभी मामले समाप्त हो जाएंगे, लेकिन स्वामित्व के निर्धारण की किसी वैकल्पिक व्यवस्था का जिक्र ही नहीं किया था, इसलिए इस धारा को संविधानेतर बताकर उस पुराने मुकदमे को फिर उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ को सौंप दिया गया था, जिसका फैसला इसे तीन हिस्सों में विभाजित करने का आया।
राजनीति और न्यायिक फैसलों से इतर देखें, तो आम आदमी थोड़ी राहत महसूस कर रहा है कि अब अयोध्या के मेलों में वह बिना किसी प्रतिबंध के आ-जा सकता है और सरयू स्नान, मंदिर दर्शन की इच्छाएं भी पूरी कर सकता है। यदि उसे कुछ खलता है, तो यही कि अयोध्या के सारे प्रमुख धर्म स्थल, चाहे वह हनुमानगढ़ी हो, कनक भवन, दशरथ महल हों या जैनियों के मंदिर, ये सब ‘यलोजोन’ क्षेत्र में हैं, जहां कोई पैदल न चलने वाला अशक्त व्यक्ति सवारी या साधनों का प्रयोग नहीं कर सकता, जैसे यह प्रशासनिक नियंत्रण उसे राम कार्य में बाधक लगता है। यह कल्पना एवं स्वरूप दरअसल विध्वंस के बाद का है। इस मामले में सबसे अधिक घबराई दिल्ली की केंद्र सरकार है, जो इसमें किसी प्रकार की ढील देने की पक्षधर नहीं है। संवाद माध्यमों और मीडिया में भी अयोध्या का अब उतना महत्व नहीं रहा।
बाबरी विध्वंस के दो दशक बाद कुछ दूसरे जरूरी सवाल अयोध्यावासियों को मथ रहे हैं। इस क्षेत्र के लिए प्रमुख मुद्दा अब अयोध्या के पुनरुद्धार और विकास का हो गया है, क्योंकि यहां सभी जातियों के मंदिर हैं, विभिन्न रियासतों के भी अपने मंदिर हैं। यानी वैयक्तिक स्वामित्व वाले मंदिरों की बहुतायत है। लेकिन उनकी आय के साधन सीमित होने के कारण मंदिरों की रंगाई-पुताई तक नहीं हो पा रही। इन मंदिरों की संख्या करीब 5,000 बताई जाती है, लेकिन हकीकत में एक दर्जन से भी कम मंदिर विकसित हो पा रहे हैं। दूसरी ओर, मंदिरों के विवादित स्वामित्व का क्षेत्र बढ़ा है। लगभग 12 महंतों की मंदिर पर कब्जे के फलस्वरूप हत्याएं हुई हैं, जिनमें से कुछ मंदिरों के नए स्वामी भी आरोपों के दायरे में हैं।
अयोध्या के विकास की सरकारी योजनाएं भी अब तक पूरी नहीं हो पाई हैं। उदाहरण के लिए, राम की पैड़ी नहाने योग्य ही नहीं मानी जा रही। जो नए निर्माण कार्य आरंभ हुए थे, वे भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय अभी सीमित स्थल पर ही विद्यमान है। यह बात दूसरी है कि स्वर्गद्वार, जहां दूर-दूर से लोग मुक्ति कामना के लिए सरयू के किनारे आते हैं, अब नया श्मशान घाट माझा बरेहटा में पहुंच गया है। इस प्रकार लोगों को यही प्रतीक्षा है कि स्वर्ग जाने के पहले वर्तमान स्थिति में उनके उदर पोषण और उसकी व्यवस्था हो जाए, जिससे वे अपने जीवन का निर्वाह करने के लिए गरीबी से थोड़ा ऊपर उठ सकें। माई बाड़ा की वे माएं भी मुफलिसी से निकलना चाहती हैं, जो अपना घर-बार छोड़कर अयोध्या वास करने आई हैं। अयोध्या के भावी स्वरूप की कल्पना में स्थानीय लोग इस बात के लिए लालायित हैं कि उनके जीवन में भी थोड़ा सुख और संतोष आए।