मुश्किल कुछ नहीं है अगर ठान लीजिए
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नए चुने गए सांसदों पर इस देश के लिए सही कानून बनाने और गलती को ठीक करने की बड़ी जिम्मेदारी है। वे अपने संसदीय क्षेत्र के सीईओ भी हैं। यदि वे संसद में और संसद के बाहर समाज की छोटी-छोटी समस्याओं के प्रति सजग और सचेत रहेंगे, तो कोई वजह नहीं कि वे मतदाताओं की उम्मीद पर खरे न उतरें। यह सही है कि करीब सवा अरब लोगों की अपेक्षाएं बहुत हैं, जिन्हें जल्दी पूरा करना आसान नहीं। हर नेता और दल भ्रष्टाचार दूर करने, गरीबी हटाने और रोजगार व न्याय दिलवाने के नारे के साथ सत्ता में आता है, फिर भी कुछ खास नहीं कर पाता। जनता जल्दी निराश होकर उसके विरुद्ध हो जाती है। इसलिए विकास, जीडीपी, आधारभूत ढांचा तथा आम आदमी के सवालों पर लगातार ध्यान देने की जरूरत होगी।
पिछले कुछ वर्षों में हमने राजनीति में कुछ ऐसे लोगों का हंगामा झेला, जिनका दावा था कि वे भ्रष्टाचार दूर करना चाहते हैं। उनके आचरण में जो दोहरापन और जो नाटकीयता थी, उसने उन्हें रातोंरात सितारा तो बना दिया, पर जब जनता को असलियत समझ में आई, तो सितारे जमीन पर उतर आए। इस प्रक्रिया में वे जबरन लोकपाल बिल पारित करवा कर देश की प्रशासनिक व्यवस्था पर नाहक बोझ डालकर चले गए। जबकि बिना लोकपाल के इसी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो लड़ाई 20 वर्ष पहले हमने लड़ी थी, उसके ठोस परिणाम आए थे और आज भी सर्वोच्च न्यायालय में उनका महत्व बरकरार है।
जातिवाद और सांप्रदायिकता का खेल भी बहुत हो चुका। देश का नौजवान तरक्की चाहता है। जातिवाद से लड़ने के लिए हमें भगवद्गीता की मदद लेनी चाहिए। जन्म से न कोई ब्राह्मण है, न क्षत्रिय, न वैश्य और न शूद्र। अगर हम इस भावना से अपने धर्म, अपनी आस्था और अपने व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना शुरू कर दें, तो हम सांप्रदायिक या जातिवादी रह नहीं पाएंगे। इसी तरह रोज़गार का सवाल है। अमेरिका में मंदी के दौर में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने युवाओं से कहा था कि रोजगार के लिए किसी की तरफ मत ताको। अपने घर के गैरेज में छोटा-सा कारोबार शुरू कर लो। भारत के बेरोजगार नौजवानों के घरों में कार के गैराज नहीं होते। पर हर शहर और कस्बे में खोखे लगाकर ये नौजवान साइकिल से मोटर मरम्मत तक के छोटे-छोटे कारोबार खड़े कर लेते हैं। इन्हें पुलिस-प्रशासन हमेशा तंग करता है। अगर इन नौजवानों की थोड़ी-सी भी मदद सरकार कर सके, तो करोड़ों नौजवानों की बेरोजगारी खत्म हो सकती है। सरकार से नौकरी की उम्मीद में बैठने वाले नौजवानों की फौज को कोई सरकार संतुष्ट नहीं कर सकती।
देश की योजनाओं के निर्माण में ऐसे खोखले लोग अपने संपर्कों से घुसा दिए जाते हैं, जो जमीनी हकीकत को समझे बिना खानापूर्ति की योजनाएं बनवा देते हैं, जिनसे न तो जनता को लाभ होता है, न ही पैसे का सदुपयोग। कमाल अतातुर्क जब राष्ट्रपति बने, तब तुर्की एक मध्ययुगीन पिछड़ा समाज था। पर उन्होंने अपने कड़े इरादे से कुछ ही वर्षों में उसे यूरोप के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया। फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?