नोटा को प्रभावी बनाना होगा

नृपेंद्र मिश्र/लेखक Updated Mon, 25 Nov 2013 08:26 PM IST
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NOTA should effective in election result

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पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने विगत 23 सितंबर को जो ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, उससे उपजा उत्साह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया।
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अपने इस फैसले में न्यायालय ने केंद्रीय निर्वाचन आयोग को यह निर्देश दिया था कि वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर ‘नोटा’ (नन ऑफ दि एबव) अर्थात ‘इनमें से कोई नहीं’ के बटन का प्रावधान करे। इसमें मतपत्रों पर भी ऐसी ही व्यवस्था की बात की गई थी, ताकि किसी भी प्रत्याशी को वोट न देने की स्थिति में मतदाता की गोपनीयता को कायम रखा जा सके।
वोट नहीं देने का अधिकार कोई नई बात नहीं है। भारत की चुनाव आचार संहिता, 1961 के नियम ‘49-ओ’ के अधीन यह काफी समय से अस्तित्व में है। इस नियम में उस प्रक्रिया का उल्लेख है, जिसके तहत कोई वैध मतदाता आधिकारिक तौर पर मत न देने का निर्णय कर सकता है। इस नियम के तहत मतदाता सूची में शामिल सभी मतदाताओं और उनके वोटों का पूरा ब्योरा रखा जाता है।
लेकिन इस नियम के साथ दिक्कत यह है कि इसमें मतदाता की गोपनीयता का ख्याल नहीं रखा जाता। जबकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में वोट की गोपनीयता कायम रखी जा सकती है। यही वजह है कि सर्वोच्च अदालत ने फैसला सुनाते समय यह राय रखी कि अगर वोट का प्रयोग नहीं करने के फैसले से बूथ अधिकारी को अवगत कराना अनिवार्य किया जाता है, तो यह गोपनीयता कायम रखने के मतदाता के वैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।

सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ईवीएम पर नोटा के प्रावधानों से खासकर शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं के रुझान पर असर पड़ेगा। अदालत ने यह भी कहा कि एक प्रभावी लोकतंत्र में मतदाताओं को ‘नोटा’ का विकल्प मिलना ही चाहिए। इससे राजनीतिक दलों पर भी योग्य प्रत्याशियों को टिकट देने का दबाव पड़ेगा।

केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने ईवीएम और मतपत्रों पर नोटा के संदर्भ में दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। हालांकि इन निर्देशों में प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के अंतिम नतीजों में नोटा के विकल्प पर पड़ने वाले वोटों की संख्या के स्पष्ट उल्लेख की बात की गई है, लेकिन फिर भी इनमें कुछ ऐसी बाते भी शामिल हैं, जो सर्वोच्च अदालत के फैसले में अंतर्निहित सोच के विपरीत जाती हैं।

निर्वाचन आयोग के निर्देशों से साफ है कि किसी प्रत्याशी को वोट नहीं देने के संदर्भ में, नोटा का वही प्रभाव होगा, जो कि नियम ‘49-ओ’ के पूर्ववर्ती प्रावधानों का होता है। ऐसे में अगर नोटा के पक्ष में किसी अन्य प्रत्याशी की तुलना में ज्यादा वोट पड़ते हैं, तो सबसे ज्यादा वोट पाने वाले प्रत्याशी को ही विजेता माना जाएगा। यहां सवाल उठता है कि अगर नोटा की व्यवस्था का हमारे लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रियाओं के अंतिम नतीजों पर कोई फर्क ही न पड़े, तो इसका औचित्य ही क्या रह जाएगा।

सच तो यह है कि निर्वाचन आयोग के निर्देशों ने ‘नोटा’ की प्रभावशीलता को कम करने का ही काम किया है। दरअसल नोटा गोपनीयता के साथ मतदाताओं की इच्छा को प्रकट करने का एक जरिया है। और इसीलिए चुनाव के अंतिम नतीजों पर इसका असर दिखना ही चाहिए, खासकर तब तो और भी जरूरी हो जाता है, जब नोटा के पक्ष में सर्वाधिक वोट पड़े हों।

‘नन ऑफ दि एबव’ का अर्थ ही है कि मतदाताओं ने सभी प्रत्याशियों को अयोग्य मानते हुए, उन्हें खारिज करने का फैसला किया है। हालांकि यह भी समझना होगा कि चुनाव में नोटा के सचेत इस्तेमाल का प्रभाव सीमित ही है। विभिन्न राजनीतिक दलों की तरह नोटा का उसके बाद होने वाले चुनावों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता।

सर्वोच्च अदालत के फैसले पर टिप्पणी करते हुए एन. गोपालस्वामी और डॉ. एस. वाई. कुरैशी जैसे पूर्व केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी मतदाताओं की गोपनीयता के अधिकार के पक्ष में समर्थन जताया है। हालांकि डॉ. कुरैशी के मुताबिक, अंतिम चुनावी नतीजों पर नोटा के प्रभाव को सीमित करने की वजह प्रशासनिक और आर्थिक दिक्कतों के अलावा राजनीतिक स्थायित्व संबंधी जरूरतें भी हैं।

हालांकि मेरा मानना है कि नोटा को लेकर जो शंकाएं जताई जा रहीं हैं, वे निराधार हैं। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में तकरीबन 71.69 करोड़ मतदाता थे और औसत मतदान 58.19 प्रतिशत रहा। किसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र की सभी पोलिंग बूथों में नोटा के पक्ष में योजनाबद्ध अभियान की संभावना तो नगण्य है। इसके अलावा मतदाताओं के मनोविज्ञान के संदर्भ में किसी प्रकार की सार्वभौमिक समझ को बनाना भी एक बेहद जटिल काम है।

संसदीय क्षेत्र के आकार और मतदाताओं की संख्या को देखते हुए फिर से चुनाव कराना घाटे का ही सौदा है। लेकिन यह भी ध्यान देना होगा कि अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र के ज्यादातर मतदाता सभी प्रत्याशियों को खारिज कर नए सिरे से चुनाव के पक्ष में हैं, तो उनकी राय का सम्मान होना चाहिए।

अगर नए सिरे से चुनाव की घोषणा होती है, तो मौजूदा कानून के मुताबिक प्रत्याशियों को अयोग्य ठहराने का भी सवाल नहीं है। इसके बावजूद चुने गए प्रत्याशियों पर पुनः विचार करने का दबाव तो राजनीतिक दलों पर बनेगा। इसलिए चुनाव के अंतिम नतीजों में नोटा के प्रभाव को सीमित करने से एक गलत संदेश जाएगा और मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी की सर्वोच्च अदालत की इच्छा भी अधूरी रह जाएगी।

(लेखक ट्राई के पूर्व चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन के निदेशक हैं)
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