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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Not a saint of the past but a need of the future revolutionary of devotion transcending caste and class

अतीत का संत नहीं, भविष्य की जरूरत: जाति और वर्ग से परे भक्ति के क्रांतिकारी, समाज में समावेशिता का उद्घोषक

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सार
कल स्वामी रामानंदाचार्य की जयंती है। आज जब समाज जातीय तनाव, धार्मिक आडंबर व नैतिक पतन की ओर बढ़ रहा है, तो उनका संदेश अधिक प्रासंगिक है।
 
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Not a saint of the past but a need of the future revolutionary of devotion transcending caste and class
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जब-जब उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन की चर्चा होती है, तब-तब जो नाम स्वतः स्मरण में आता है, वह है स्वामी रामानंदाचार्य। वह केवल एक संत या आचार्य नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज को जाति, वर्ग और संकीर्णताओं से मुक्त करने वाले आध्यात्मिक क्रांतिकारी थे। सात शताब्दियों पूर्व उन्होंने जिस समावेशी भक्ति-दृष्टि का उद्घोष किया, वह आज भी भारतीय समाज के लिए उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी मध्यकालीन भारत के लिए थी। रामानंदाचार्य का जन्म विक्रम संवत् 1356 (1299 ईस्वी) में तीर्थराज प्रयाग में हुआ था।



वह वैदिक परंपरा के तपोनिष्ठ संन्यासी थे, पर उनकी साधना लोक से जुड़ी हुई थी। उन्होंने भक्ति को मठों से निकालकर महल से झोंपड़ी तक पहुंचाया। उनका स्पष्ट उद्घोष था-जात-पांत पूछे नहीं कोई। हरि को भजे सो हरि का होई॥ यह पंक्ति केवल आध्यात्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का घोषवाक्य थी। डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने अपनी पुस्तक रामानंद की हिंदी रचनाएं में इसे स्वामी रामानंद का कालजयी उद्घोष कहा है।


काशी में गंगा तट पर स्थित ‘श्रीमठ’ से स्वामी रामानंद ने निर्गुण और सगुण रामभक्ति परंपरा का शंखनाद किया। यही श्रीमठ मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बना। विद्वानों में श्रीमठ की स्थापना को लेकर मतभेद हो सकते हैं, कुछ इसे रामानंदाचार्य का, तो कुछ उनके गुरु राघवानंद का मानते हैं। पर इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं कि यह स्थल मध्यकालीन भारत की सबसे बड़ी आध्यात्मिक पहचान था। संत-साहित्य के विद्वान सुखदेव सिंह ने श्रीमठ को उस युग का सबसे प्रभावी आध्यात्मिक केंद्र कहा है।

रामानंदाचार्य की शिष्य परंपरा भारतीय समाज का लघु रूप थी। कबीर, रैदास, धन्ना जाट, सेन नाई, पीपा दर्जी, कूबा कुम्हार और ‘भक्तमाल’ के रचयिता नाभादास जैसे संत-भक्त उनके शिष्य थे। उल्लेखनीय है कि उनकी शिष्य परंपरा में पद्मावती और सुरसरी जैसी महिला संतों को भी स्थान मिला, जो उस काल में अभूतपूर्व था। उनकी शिष्य मंडली रामभक्ति के आधार पर आध्यात्मिक लोकतंत्र की निर्माता थी। महात्मा कबीर और स्वामी रामानंद का संबंध भारतीय भक्ति परंपरा का सबसे प्रेरक प्रसंग है। कबीर ने गुरु की खोज में पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट कर अपने जीवन की दिशा बदल ली। यह प्रसंग बताता है कि रामानंदाचार्य की दृष्टि में जाति नहीं, भक्ति महत्वपूर्ण है। कबीर का यह वाक्य प्रसिद्ध है-कहै कबीर दुविधा मिटी, गुरु मिल्या रामानंद। आज भी गुरु-शिष्य परंपरा में यह वाक्य अमर प्रमाण के रूप में स्थापित है।

रामानंदाचार्य ने अपने ग्रंथ वैष्णव-मताब्ज-भास्कर में स्पष्ट किया कि भगवान श्रीराम भक्ति में जीवों की जाति, बल या शुद्धता की अपेक्षा नहीं करते। समर्थ और असमर्थ सभी उन्हें प्राप्त करने के समान अधिकारी हैं।
यह विचार उस समय सामाजिक साहस का परिचायक था, जब समाज कठोर वर्ण-व्यवस्था और धार्मिक दमन से जकड़ा हुआ था। मुगल काल के अत्याचारों के बीच रामानंदाचार्य ने भक्ति को सामाजिक संबल बनाया और भारतीय समाज को टूटने नहीं दिया।

यह दुर्भाग्य का विषय अवश्य है कि जिस विशाल आनंद वन ‘श्रीमठ’ में कभी हजारों फकीर, जंगम-जोगड़े, नाथपंथी, वैरागी और संन्यासी निवास करते थे, वह आज काशी में बहुत सीमित क्षेत्र में सिमट गया है। जहां कभी भक्ति की अखंड साधना होती थी, वहां अब घर, दुकानें और अन्य निर्माण खड़े हैं। श्रीमठ के नाम से काशी में थोड़ी-सी पुण्यभूमि शेष है, जहां अभी स्वामी रामनरेशाचार्य उस महान परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
आज, जब समाज पुनः जातीय तनाव, धार्मिक आडंबर और नैतिक विचलन की ओर बढ़ रहा है, तब स्वामी रामानंदाचार्य का संदेश अधिक प्रासंगिक हो उठता है।

उन्होंने भक्ति को मानवता से जोड़ा, धर्म को करुणा से और समाज को समरसता से। वह सामाजिक आदर्शों के बीज-पुरुष थे, जिन्होंने समानता, गरिमा और समावेशन की नींव सदियों पहले रख दी थी। स्वामी रामानंदाचार्य केवल अतीत के संत नहीं हैं, बल्कि वह वर्तमान युग के मार्गदर्शक और भविष्य की आवश्यकता हैं। आज के समय को देखते हुए उनकी समावेशी भक्ति-दृष्टि को सामाजिक व्यवहार में उतारने की नितांत आवश्यकता है।

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