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अन्न उपजाने वाले हाथों को आय नहीं
योगेंद्र यादव
Updated Wed, 10 Jun 2015 08:00 PM IST
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किसान हमें ऐसे याद आता है, जैसे कोई दूर का गरीब रिश्तेदार। कभी हम यह नहीं पूछते कि आपदा और संकट के अलावा किसान कैसी जिंदगी बसर करता है? कुछ महीने पहले केंद्र सरकार के नेशनल सैंपल सर्वेक्षण के 70वें राउंड के आंकड़े सार्वजनिक किए गए थे। इन आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2012-13 में किसानों की हालत कितनी खराब थी।
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देश का औसत किसान परिवार खेती से एक दिन में सिर्फ 100 रुपये कमाता है। कहने को उसकी मासिक आय 6,426 रुपये है, पर आधी से ज्यादा कमाई पशुपालन और मजदूरी आदि से होती है। औसतन पांच-छह लोगों के किसान परिवार को खेती-बाड़ी से एक महीने में 3,081 रुपये की आमदनी है। इस औसत में से अगर दस एकड़ से बड़े किसानों को निकाल दें, तो साधारण किसान को महीने में दो-ढाई हजार की कमाई होती है।
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इस आमदनी की तुलना आप सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह से कीजिए। केंद्र सरकार का सबसे कम वेतन पाने वाला चतुर्थ वर्ग का कर्मचारी महीने में 16,500 रुपये कमाता है। अलग-अलग राज्य सरकारों ने अकुशल मजदूर का न्यूनतम मासिक वेतन भी सात से नौ हजार के बीच तय कर रखा है। यानी पूरा परिवार खेती करके एक आदमी की नौकरी की तनख्वाह का आधा या चौथाई भी नहीं कमा पाता है। यही वजह है कि अब कोई किसान बेटे को किसान बनाने की बात नहीं करता।
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गांव में बुजुर्ग आसानी से बता देंगे कि आज से चालीस साल पहले किसान डेढ़ क्विंटल गेहूं बेचकर एक तोला सोना खरीद सकता था, आज उसे उतने ही सोने के लिए बीस क्विंटल गेहूं बेचना पड़ेगा। इस अरसे में गेहूं का दाम सात गुना बढ़ा है, पर साबुन की टिकिया 90 गुना महंगी हो गई है और नमक की थैली 40 गुना। स्कूल और डॉक्टर की फीस तो इतनी बढ़ी है कि कोई हिसाब ही नहीं। यानी किसान की आमदनी कम है और खर्चा ज्यादा। एक साधारण किसान के लिए खेती घाटे का धंधा है। अगर फसल ठीक हो गई, तो आढ़ती से लिए पैसे वापस हो जाते हैं, और अगर कुदरत की मार पड़ी, तो कोई रास्ता नहीं है।
एक औसत किसान को आज भी लगता है कि उसकी बुरी हालत की वजह उसकी किस्मत है, कुदरत की मार है, बाजार का खेल है। वह आज भी नहीं देख पाता कि इसके पीछे सरकारी नीतियों की मार है, राजनीति का खेल है। फसलों के मूल्य तय करने की सरकारी व्यवस्था किसान के साथ धोखा है। फसल बीमा और आपदा आने पर मिलने वाला सरकारी मुआवजा एक मजाक है। और अब भूमि अधिग्रहण के जरिये किसान के पास बची एकमात्र संपत्ति भी छीनने की तैयारी चल रही है।
ऐसे में देश भर के किसानों को एक मांग रखनी चाहिए कि जैसे सरकार अपने कर्मचारियों का वेतन तय करने के लिए वेतन आयोग बनाती है, उसी तरह किसानों की आमदनी तय करने के लिए एक किसान आय आयोग बनाया जाए। जैसे सरकार कम से कम कागज पर रोजगार की गारंटी दे रही है, उसी तरह किसान को भी न्यूनतम आय की गारंटी देने वाला कानून बने। अगर किसान को इससे कम आय हो, तो सरकार भरपाई की गारंटी ले। यह व्यवस्था कैसी होगी, इस पर बहस जरूर हो सकती है।
-लेखक स्वराज अभियान के जय किसान आंदोलन से जुड़े हैं