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भारत में आईएस की जगह नहीं
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मारूफ रजा
पहले मध्य प्रदेश में रेल में धमाके, फिर उत्तर प्रदेश के लखनऊ में संदिग्ध आतंकी के साथ एटीएस की मुठभेड़ की खबर अभी सुर्खियों में है। पुलिस का दावा है कि उसने घटनास्थल से कुख्यात आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) के झंडे सहित कई हथियार बरामद किए हैं। अब आशंका जताई जा रही है कि इन घटनाओं के पीछे आईएस का हाथ हो सकता है। लेकिन जहां तक मुझे लगता है, भारत में अभी तक इस्लामिक स्टेट की पहुंच नहीं हो पाई है। ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे साबित हो कि आईएस ने यहां के लोगों को आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए पैसे दिए हैं या यहां पर उनकी भर्ती की है। इसके पीछे कुछ तार्किक कारण हैं, जिन्हें समझने की जरूरत है।
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पारंपरिक तौर पर आतंकी संगठनों में भर्ती करने का तरीका ऐसा था कि पहले आमने-सामने बिठाकर आतंकी संगठन के लोग पूछताछ करते थे कि भर्ती के इच्छुक व्यक्ति के मन में कैसी नफरत है, वह किसके खिलाफ लड़ना चाहता है, और वह जान दे सकता है या नहीं। इन सब कसौटियों पर परखने के बाद ही उसे पैसे देकर आतंकी मिशन में भर्ती किया जाता था।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देखा गया है कि इंटरनेट के जरिये युवाओं को आतंकी संगठनों में भर्ती की जाती है और उसे कट्टर बनाया जाता है। इस मामले में इस्लामिक स्टेट को काफी महारत हासिल है। अब कोई आतंकी सीरिया या काहिरा या बगदाद में बैठकर दुनिया के किसी भी हिस्से के युवाओं को इंटरनेट के जरिये कट्टरपंथी बनने के लिए प्रोत्साहित करता है और पूरी तरह से मानसिक रूपांतरण करने के बाद उसकी भर्ती की जाती है। यह बिल्कुल नया तरीका है और इसके ऊपर सरकार का नियंत्रण करना मुश्किल है।
इस ताजा घटना के संदर्भ में एकदम से यह कह देना कि भारत में इस्लामिक स्टेट ने अपनी पैठ बना ली है या रेल हादसे के पीछे आईएस हो सकता है, मुझे सही नहीं जान पड़ता। हां, यह हो सकता है कि ये लोग इंटरनेट के जरिये आईएस से प्रभावित हुए होंगे और आईएस के नाम पर कुछ गतिविधियों को अंजाम देने की कोशिश कर रहे होंगे, लेकिन मुझे नहीं लगता कि आईएस के लोगों ने इनके हाथ में पैसा थमाकर कहा होगा कि भारत में अमुक-अमुक जगहों पर आतंकी घटनाओं को अंजाम दो, जैसे लश्करे तैयबा अपने रंगरूटों को पैसा देकर आतंकी घटनाएं करवाता है।
अभी तक आईएस भारत में क्यों नहीं पहुंच पाया है? इसकी मुख्य वजह है कि भारत में नब्बे फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी का इस्लामिक स्टेट से कोई लेना-देना नहीं है, और न उन्हें इससे कोई लगाव है। उन्हें पता है कि हम भारत में हैं, हमें यहीं रोजी-रोटी कमानी है। हमारा परिवार यहां है, तो हमें ज्यादा पंगे लेने की जरूरत नहीं है। और दूसरी बात, यदि कोई मुसलमान भारत में आगे बढ़ना चाहता है, तो उसके रास्ते में कोई खास रुकावट नहीं है। आईएस से जुड़े अन्य देशों के लोग, जिन्होंने यूरोप में आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया, वे वैसे लोग हैं, जो जानते हैं कि उनके अपने देश में उनकी तरक्की नहीं हो सकती। वे सब बेरोजगार और नशा करने वाले लोग थे, जो इस्लाम के नाम पर आतंकी घटनाओं को अंजाम देकर सोचते थे कि इससे उनके सारे पाप धुल जाएंगे। लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं है, यहां सबको बराबरी से आगे बढ़ने का मौका है। इसलिए इस्लामिक स्टेट के पनपने का आधार यहां नहीं है। और इसका श्रेय यहां के लोगों और यहां की सरकारों को जाता है, जिन्होंने ऐसा माहौल बनने ही नहीं दिया। इसके अलावा जो थोड़े से लोग आईएस के प्रति झुकाव रखते हैं, उनका निकट पड़ोस में मुस्लिम आबादी से जुड़ाव नहीं है, इसलिए इसके फैलने की आशंका नहीं है।
पाकिस्तान में अगर आईएस ने पैठ बनाई है और हाल में एक सूफी दरगाह पर आईएस से जुड़े लोगों ने हमला किया है, तो उसकी वजह यह है कि वहां उसके आने और फैलने की काफी गुंजाइश है। 1980 के दशक से ही वहां सऊदी अरब ने वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए पैसा दिया और आतंकी संगठनों को पोषित किया।
दूसरी बात यह है कि हमारे देश के जिन थोड़े से हिस्सों में, जैसे केरल, हैदराबाद, मुंबई या अन्य जगहों पर कुछ लोग आईएस से प्रभावित दिखे, वे आर्थिक तौर पर संपन्न हैं। आईएस की प्रचार सामग्री उन्हीं लोगों तक सीधे पहुंच रही है, जिनके पास पर्सनल कंप्यूटर है। साइबर कैफे में बैठकर अगर कोई इस्लामिक स्टेट की प्रचार सामग्री पढ़ेगा या उससे जुड़े आतंकियों से संपर्क करेगा, तो उसके पकड़े जाने का डर रहेगा। इसके अलावा, ऐसे लोगों के दिमाग में इस तरह की भावना होती है कि वे कुछ ऐसा काम कर जाएं, कि दुनिया उनको याद रखे। बाद में उन्हें पता चलता है कि जोश-जोश में उन्होंने ऐसा कुछ कर डाला है, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। बाद में वे माफी मांगते हैं कि हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। जो बीस-बाईस लोग भारत से आईएस के साथ लड़ने गए हैं, वे वैसे लोग हैं, जिन्हें अगर मध्यपूर्व के देशों में कोई दूसरी नौकरी मिल जाती, तो वे वहां चले जाते। और ऐसा कोई सबूत नहीं है कि आईएस ने उन लोगों को लड़ने के लिए कहीं भेजा है, बल्कि किसी को ड्राइवर, तो किसी को मशालची, तो किसी को घरेलू कामों में लगा रखा है।
इसलिए यह कहना कि भारत में आईएस ने दस्तक दे दी है, गलत होगा। पुख्ता सबूत जुटाए बिना आईएस का हौआ खड़ा करने की जरूरत नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमें ढील देनी चाहिए। आतंकवाद का खतरा तो है ही और सबसे ज्यादा खतरा पाकिस्तान की तरफ से है। जहां तक आईएस से प्रभावित होने वाले युवाओं की बात है, तो उससे अभी जो खतरा दिख रहा है, वह यह कि ऐसे लोग लोन वुल्फ एटैक (अकेले आतंकी घटना को अंजाम देना) की कोशिश कर सकते हैं। सरकार को इससे निपटने के लिए अपनी साइबर सुरक्षा को मजबूत करना होगा। बलूचिस्तान और सिंध के लोगों की मदद करके पाकिस्तान पर भी दबाव बनाने की जरूरत है। अभी तक हम इसी नैतिकता में फंसे हैं कि दूसरे देश के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप क्यों करें।