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बहुत खुश होने की जरूरत नहीं
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Thu, 06 Oct 2016 06:05 PM IST
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पत्रलेखा चटर्जी
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राजनीतिक रूप से हम जिस ध्रुवीकृत समय में रह रहे हैं, उसमें सरकार के बारे में कुछ भी सकारात्मक कहने पर उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छवि निर्माण के रूप में देखा जाता है। इसी तरह सरकार की जरा-सी भी आलोचना को प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत आलोचना के रूप में देखे जाने की आशंका है। इससे न केवल सार्वजनिक बहस से ईमानदार राय और आलोचना खत्म हो गई, बल्कि पिछले दो वर्षों में विकास के लिए हुई पहल को भी नजरंदाज कर दिया गया है।
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कोई कार्यक्रम भले कितने ही नेक इरादे से क्यों न शुरू किया गया हो, वह तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक हम अपने दोषों का निदान नहीं करते और सुधारात्मक कदम नहीं उठाते। और यदि कोई कार्यक्रम जनहित के इरादे से शुरू किया जाता है, तो लोगों को उस पर विचार-विमर्श का हिस्सा जरूर बनना चाहिए। एक सफल कार्यक्रम किसे कहा जा सकता है? किसी कार्यक्रम की सफलता या विफलता इस पर निर्भर करती है कि सफलता को मापने में किस तरह के संकेतकों का उपयोग किया जाता है।
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आप शिक्षा को ही लीजिए। हर कोई जानता है कि पूरे देश में प्राइमरी स्कूलों में दाखिले में काफी इजाफा हुआ है, लेकिन यह तस्वीर का मात्र एक पहलू है। बच्चों ने स्कूलों में दाखिला लिया है, पर इसका मतलब यह नहीं कि वे अनिवार्य रूप से सीख या पढ़ ही रहे हों। हमारे देश में ऐसे स्कूल भी हैं, जहां न तो प्रशिक्षित शिक्षक हैं, न शौचालय और न ही शिक्षण संबंधी सामग्रियां। जिस तरह स्कूल भवनों की गिनती से उसके नतीजे को नहीं जाना जा सकता, वैसे ही दाखिले के आंकड़े का मतलब यह नहीं है कि शिक्षा में बड़ी प्रगति हो रही है। बच्चे स्कूलों में दाखिला लेते हैं और कुछ वर्षों बाद वे पढ़ाई छोड़ देते हैं, जैसा कि हमने देश के कई हिस्सों में देखा है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि स्कूलों में दाखिला बढ़ना खुशी की बात नहीं है, और न ही यह कि हमें पक्की छत वाले आधुनिक क्लासरूमों की जरूरत नहीं है। हमें इन सबकी जरूरत है, लेकिन ये सब होने के साथ हमें अगला सवाल पूछने और उसका संतोषजनक जवाब तलाशना बंद नहीं कर देना चाहिए।
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अब स्वच्छ भारत अभियान की बात करें, जो दो वर्ष पहले शुरू किया गया मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। पिछले कुछ दिनों से स्वच्छ भारत अभियान के संबंध में मीडिया में काफी खबरें प्रकाशित हुई हैं। न तो कोई इस योजना के इरादे पर सवाल उठा सकता है, न ही प्रधानमंत्री मोदी की उस ऊर्जा पर, जो उन्होंने इस कार्यक्रम में लगाई है। लेकिन जैसा कि पूर्व सरकारों द्वारा शुरू किए इसी तरह के कार्यक्रमों की सफलता और विफलता का आकलन किया जाता था, उसी तरह मैंने इस कार्यक्रम के बारे में पाया है कि शौचालयों का निर्माण भले ही अनिवार्य है, लेकिन यही भारत के स्वच्छता संकट के निवारण के लिए पर्याप्त नहीं है।
दो वर्षों का समय बीत जाने के बाद स्वच्छ भारत अभियान कार्यक्रम का रिपोर्ट कार्ड मिला-जुला है। आंकड़े बताते हैं कि अब 4,041 नगरों में से मात्र 141 और 6.08 लाख गांवों के छठे हिस्से से भी कम गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा सका है। ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिए विशेषज्ञ होने की जरूरत नहीं है। लोग अपनी आदतों में बदलाव तभी करते हैं, जब वे आदत बदलने से होने वाले फायदों से सहमत होते हैं, अन्यथा नहीं। भले देश के कुछ हिस्सों में स्वच्छ भारत अभियान सफल रहा है और बहुत से शौचालयों का निर्माण हुआ है, लेकिन घरों में शौचालय होने के बावजूद लोग अब भी खुले में शौच कर रहे हैं। यह बताता है कि शौचालयों के उपयोग से होने वाले फायदे से हर कोई सहमत नहीं है। इसलिए यह सवाल उठाने की जरूरत है कि आदतों में बदलाव और समुदाय को शौचालयों का उपयोग करने को प्रेरित करने के लिए सूचना, शिक्षा और समर्थन के लिए क्या किया जा रहा है।
स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) वेबसाइट के होमपेज पर अगर आप जाते हैं, तो वहां बताया गया है कि कितने शौचालयों का निर्माण किया गया, कितने परिवारों के पास शौचालय है, कितनी तस्वीरें अपलोड की गई हैं और खुले में शौच से मुक्त गांवों की संख्या कितनी है। लेकिन सामूहिक स्वच्छता के ये आंकड़े न तो लोगों की आदतों के बारे में बहुत कुछ बताते हैं और न ही इसके पीछे के कारणों के बारे में। बेशक यह एक मुश्किल विषय है, लेकिन यह इस अभियान के अंतिम लक्ष्य में निहित है। हमें यह जरूर जानना चाहिए कि कौन शौचालयों का उपयोग करता है, कौन नहीं और क्यों। और क्या लोग शौचालयों के उपयोग, हाथों की सफाई और स्वास्थ्य के बीच कोई तालमेल देखते हैं?
हम स्वच्छ भारत के लिए उपकर चुकाते हैं, इसलिए हमारा यह पूछना लाजिमी है कि यह पैसा कहां जाता है? क्या ज्यादातर पैसे शौचालय निर्माण पर ही खर्च होते हैं? इसमें से कितना पैसा सूचना, शिक्षा, संचार (आईईसी)और आदतों में बदलाव लाने संबंधी गतिविधियों पर खर्च होता है? विश्लेषकों का कहना है कि जबसे स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ है, आईईसी पर खर्च घटा है। वर्ष 2014-15 में सूचना, शिक्षा, संचार (आईईसी) पर तीन फीसदी खर्च होता था, जो घटकर 2015-2016 में एक फीसदी रह गया। यही वजह है कि ग्रामीण भारत में खुले में शौच परेशानी का कारण बना हुआ है।
फिर अस्पृश्यता की कटु सच्चाई भी है, जिसकी खुले में शौच की कुप्रथा के जारी रहने में प्रमुख भूमिका है। कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि ग्रामीण भारत में हाथ से मैला ढोने की कुप्रथा जारी है। यह एक ऐसा काम है, जिसे पारंपरिक तौर पर दलितों को करने के लिए मजबूर किया जाता है। इस वजह से भी बहुत से ग्रामीण उस तरह के शौचालय को पसंद नहीं करते, जिन्हें समय-समय पर हाथ से साफ करना पड़ता है। ये कुछ असुविधाजनक सच्चाइयां हैं, जिन पर हमें विचार करना चाहिए, क्योंकि हमें स्वच्छ नगरों और गांवों का विकास करना है।