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एकाधिकार के खिलाफ है एनएमसी
अवधेश कुमार
Updated Tue, 09 Jan 2018 01:12 PM IST
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अवधेश कुमार
सरकार ने जब पिछले दिनों लोकसभा में नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) यानी राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग विधेयक पेश किया, तो लगा कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता से लेकर डॉक्टरी पेशा के लिए लाइसेंस देने के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। लेकिन देश के डॉक्टरों का एक वर्ग इससे सहमत नहीं है। सरकार ने विरोध को देखते हुए विधेयक को दोबारा स्थायी समिति में भेज दिया है।
अगर यह विधेयक पारित होता है, तो मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (आईएमसी) खत्म हो जाएगी और एनएमसी उसकी जगह ले लेगा। उसके बाद देश में मेडिकल शिक्षा और मेडिकल सेवाओं से संबंधित सभी नीतियां बनाने की कमान इस आयोग के हाथों होगी। आईएमए इस विधेयक के कई प्रावधानों के खि़लाफ है।
उनके अनुसार एमबीबीएस के बाद भी प्रैक्टिस के लिए एक और परीक्षा देने को अनिवार्य बनाना सही नहीं है। उनका यह भी कहना है कि यह कानून चिकित्सा पेशेवरों को नौकरशाही तथा गैर-चिकित्सकीय प्रशासनिक अधिकारियों के प्रति पूरी तरह जवाबदेह बनाकर उनके कामकाज को प्रभावित करेगा। आईएमए का कहना है कि इस विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं, जिससे आयुष डॉक्टरों यानी आयुर्वेद, यूनानी एवं होम्योपैथी को भी एलोपैथ दवा देने की अनुमति मिल जाएगी, जबकि इसके लिए कम-से-कम एमबीबीएस की डिग्री होनी चाहिए। इससे नीम-हकीमी करने वाले भी डॉक्टर बन जाएंगे।
विधेयक के तहत चार स्वायत्त बोर्ड बनाने का प्रावधान है। इनका काम स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा को देखने के अलावा चिकित्सा संस्थानों की मान्यता और डॉक्टरों के पंजीकरण की व्यवस्था देखना होगा। चिकित्सा आयोग में सरकार द्वारा नामित चेयरमैन एवं सदस्य होंगे, जबकि बोर्ड के सदस्यों का चुनाव चयन समिति द्वारा किए जाएंगे। चयन समिति कैबिनेट सचिव के तहत बनेगी। आयोग में पांच चुने हुए सदस्य भी होंगे, जबकि 12 सदस्य सरकारी पदाधिकारी होंगे। साफ है कि यह वर्तमान चिकित्सा परिषद से एक ज्यादा लोकतांत्रिक एवं विस्तृत निकाय होगा।
इस बिल में आयुष की प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों के लिए एक ब्रिज कोर्स का प्रावधान है। इसके बाद वे एलोपैथ दवाइयां रोगियों को दे सकते हैं। पूरे भारत के मेडिकल संस्थानों में दाखिले के लिए सिर्फ एक परीक्षा ली जाएगी। इस परीक्षा का नाम एनएएटी (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट) यानी राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा होगी। हालांकि नीट के रूप में यह अब भी हो रही है, पर इसका चरित्र थोड़ा भिन्न होगा। कहा जा रहा है कि डिग्री लेने के बाद एक परीक्षा पास करनी होगी, तभी डॉक्टर होने का लाइसेंस मिलेगा।
आईएमए चाहे कुछ भी कहे, सच यही है कि 1956 में लागू भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (एमसीआई) कानून समय के साथ सामंजस्य बैठाने में सफल नहीं रहा है। यह विचार लंबे समय से दिया जा रहा है कि जब एलोपैथ के डॉक्टर आयुर्वेद की दवाइयां लिख सकते हैं, तो दूसरी पद्धतियों के चिकित्सकों को भी ऐसी ही अनुमति मिलनी चाहिए। इस प्रावधान से एलोपैथ डॉक्टरों का एकाधिकार टूट रहा है।
आईएमए के मुताबिक 1.3 अरब लोगों की आबादी का इलाज करने के लिए भारत में केवल 10 लाख एलोपैथिक डॉक्टर हैं। इनमें से 1.1 लाख डॉक्टर ही सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करते हैं। इतने से डॉक्टर और मरीजों की संख्या के बीच की खाई को पाटना आसान हो जाएगा।
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अगर यह विधेयक पारित होता है, तो मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (आईएमसी) खत्म हो जाएगी और एनएमसी उसकी जगह ले लेगा। उसके बाद देश में मेडिकल शिक्षा और मेडिकल सेवाओं से संबंधित सभी नीतियां बनाने की कमान इस आयोग के हाथों होगी। आईएमए इस विधेयक के कई प्रावधानों के खि़लाफ है।
उनके अनुसार एमबीबीएस के बाद भी प्रैक्टिस के लिए एक और परीक्षा देने को अनिवार्य बनाना सही नहीं है। उनका यह भी कहना है कि यह कानून चिकित्सा पेशेवरों को नौकरशाही तथा गैर-चिकित्सकीय प्रशासनिक अधिकारियों के प्रति पूरी तरह जवाबदेह बनाकर उनके कामकाज को प्रभावित करेगा। आईएमए का कहना है कि इस विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं, जिससे आयुष डॉक्टरों यानी आयुर्वेद, यूनानी एवं होम्योपैथी को भी एलोपैथ दवा देने की अनुमति मिल जाएगी, जबकि इसके लिए कम-से-कम एमबीबीएस की डिग्री होनी चाहिए। इससे नीम-हकीमी करने वाले भी डॉक्टर बन जाएंगे।
विधेयक के तहत चार स्वायत्त बोर्ड बनाने का प्रावधान है। इनका काम स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा को देखने के अलावा चिकित्सा संस्थानों की मान्यता और डॉक्टरों के पंजीकरण की व्यवस्था देखना होगा। चिकित्सा आयोग में सरकार द्वारा नामित चेयरमैन एवं सदस्य होंगे, जबकि बोर्ड के सदस्यों का चुनाव चयन समिति द्वारा किए जाएंगे। चयन समिति कैबिनेट सचिव के तहत बनेगी। आयोग में पांच चुने हुए सदस्य भी होंगे, जबकि 12 सदस्य सरकारी पदाधिकारी होंगे। साफ है कि यह वर्तमान चिकित्सा परिषद से एक ज्यादा लोकतांत्रिक एवं विस्तृत निकाय होगा।
इस बिल में आयुष की प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों के लिए एक ब्रिज कोर्स का प्रावधान है। इसके बाद वे एलोपैथ दवाइयां रोगियों को दे सकते हैं। पूरे भारत के मेडिकल संस्थानों में दाखिले के लिए सिर्फ एक परीक्षा ली जाएगी। इस परीक्षा का नाम एनएएटी (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट) यानी राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा होगी। हालांकि नीट के रूप में यह अब भी हो रही है, पर इसका चरित्र थोड़ा भिन्न होगा। कहा जा रहा है कि डिग्री लेने के बाद एक परीक्षा पास करनी होगी, तभी डॉक्टर होने का लाइसेंस मिलेगा।
आईएमए चाहे कुछ भी कहे, सच यही है कि 1956 में लागू भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (एमसीआई) कानून समय के साथ सामंजस्य बैठाने में सफल नहीं रहा है। यह विचार लंबे समय से दिया जा रहा है कि जब एलोपैथ के डॉक्टर आयुर्वेद की दवाइयां लिख सकते हैं, तो दूसरी पद्धतियों के चिकित्सकों को भी ऐसी ही अनुमति मिलनी चाहिए। इस प्रावधान से एलोपैथ डॉक्टरों का एकाधिकार टूट रहा है।
आईएमए के मुताबिक 1.3 अरब लोगों की आबादी का इलाज करने के लिए भारत में केवल 10 लाख एलोपैथिक डॉक्टर हैं। इनमें से 1.1 लाख डॉक्टर ही सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करते हैं। इतने से डॉक्टर और मरीजों की संख्या के बीच की खाई को पाटना आसान हो जाएगा।