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नीतीश के पास विकल्प क्या है
Updated Fri, 19 Apr 2013 09:11 PM IST
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पश्चिम बंगाल में आम आदमी पीड़ित है, लेकिन राज्य में जो घटनाएं घट रही हैं, उन सबके लिए ममता बनर्जी को ही दोषी ठहराने का बहुत औचित्य नहीं है। राज्य में वाम दलों का वर्चस्व रहा है, जिन्होंने राजनीतिक विरोधियों का दमन कर 34 वर्षों तक वहां शासन किया है।
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वाम दलों के शासन में वही बचे रहे, जो उनकी तरह पलटवार करने में सक्षम थे। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता एक दशक से अधिक समय तक सहते रहे, लेकिन आखिरकार उसी के एक करिश्माई नेता ने राज्य को ज्योति बसु विहीन वाम मोरचे का न सिर्फ विकल्प दिया, बल्कि भारी बहुमत से जीत भी हासिल की।
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तृणमूल कांग्रेस के शासन को दो साल होने वाले हैं, पर वहां के हालात नहीं बदले। वक्त बदल चुका है, इसलिए अब पुराने तरीके से काम नहीं चलने वाला। तृणमूल कार्यकर्ताओं से आम लोग आतंकित हैं। यह हमने प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय की हिंसक घटनाओं में देखा।
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दिल्ली में एसएफआई कार्यकर्ताओं की धकियाकर भगाने की रणनीति और परेशान करने वाले सवालों के बाद ऐसा होना लाजिमी ही था। पर ऐसी हिंसक घटनाओं में आम आदमी ही पिसेगा, क्योंकि अपने कार्यकर्ताओं को छोड़कर बाकी लोगों के लिए न तो तृणमूल के पास समय है, न माकपा के पास।
ममता बनर्जी को अपनी छवि बेहतर बनाने के लिए एक और मौका मिला है, जिसका उन्हें फायदा उठाना चाहिए। एक ही समय में कई मोर्चों पर लड़ाई खराब राजनीति है। उन्हें समझना होगा कि विपक्ष की राजनीति सत्ता में आने के बाद नहीं चल सकती।
जयललिता, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी, लालू यादव, मुलायम सिंह, मायावती और कुछ अन्य नेता अपने-अपने दलों के प्रमुख हैं और उनकी जीत-हार उनके अपने करिश्मे पर निर्भर है। उनके दलों का भविष्य उन पर निर्भर है। लेकिन इनमें नकारात्मक चीज यह है कि ये जिद्दी और महत्वाकांक्षी हैं। आम आदमी के बीच इनकी छवि सम्माननीय होने के बजाय डरावनी ज्यादा है।
लोकसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है, लेकिन न तो कांग्रेस और न ही भाजपा प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार का संकेत इतनी जल्दी दे सकती है। हममें से ज्यादातर लोग विभिन्न 'नामों' पर विचार कर सकते हैं, पर यह अटकलबाजी ही होगी।
आज की स्थिति में सर्वोच्च नेता जैसी कोई चीज नहीं है, जो पूरे देश के मतदाताओं को व्यापक रूप से प्रभावित कर सके। गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस या भाजपा द्वारा जीती गई सीटें ही तय करेंगी कि वे सरकार बनाने की स्थिति में हैं या नहीं।
मेरा आकलन है कि ये दोनों पार्टियां 130 से 135 सीटें जीतेंगी और करीब 20 क्षेत्रीय दल मिलकर 260 से 270 सीटों पर कब्जा जमाएंगे। सपा, बसपा, जद (यू), अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस ऐसी पार्टियां हैं, जो 20 से ज्यादा सीटें जीत सकती हैं।
वर्ष 2013 ऐसा वर्ष होगा, जब सभी दल अपनी राजनीतिक दीर्घजीविता के लिए दुर्लभ सूत्र की तलाश करेंगे। अब द्रमुक का ही उदाहरण लीजिए, जिसे 1996 से ही केंद्रीय सत्ता का लाभ लूटने का संयोग मिला।
जाहिर है, विचारधारा से चिपके होने पर ऐसा संभव नहीं था। नतीजतन इस दौरान द्रमुक परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध हुआ। ऐसी अचानक समृद्धि में गलत काम लाजिमी है, और अब उसका पतन भी देखने लायक है। अंतिम क्षण तक साथ रहने के बाद द्रमुक ने यूपीए का साथ छोड़ दिया, लेकिन दो पत्नियों, दो बेटों, बेटी और भतीजे के बीच छिड़ी पारिवारिक जंग ने करुणानिधि की पार्टी को कमजोर कर दिया।
आखिर में द्रमुक नया गठबंधन बनाने की कोशिश कर सकते हैं, पर आगामी लोकसभा चुनाव में अगर वह पांच सीटें भी जीत पाए, तो भाग्यशाली होंगे। जब तक द्रमुक संख्याबल के आधार पर खुद अपनी रक्षा करने सक्षम नहीं होगी, तब तक कानून से उसे राहत नहीं मिलने वाली। यही आज का राजनीतिक यथार्थ है।
हर छोटी या बड़ी पार्टी यही करती है। बिहार का उदाहरण लीजिए। अगर भाजपा नरेंद्र मोदी को अपना नेता चुनती है, तो नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के लिए गठबंधन से अलग होने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं है, क्योंकि बिहार में अल्पसंख्यक मत ही जीत या हार सुनिश्चित करते हैं।
लिहाजा नरेंद्र मोदी का नेतृत्व स्वीकार कर जद (यू) अपनी प्रासंगिकता ही खो देगा। बिहार के मतदाताओं के बीच नीतीश कुमार की अब भी जमीनी पकड़ है। नरेंद्र मोदी के प्रति उनके रुख को व्यक्तिगत बैर नहीं मानना चाहिए, वह किसी नए गठबंधन की तलाश में भी नहीं हैं, बल्कि यह अस्तित्व रक्षा का मसला है।
चूंकि जद (यू) सही रास्ते पर जा रहा है, इसलिए 20 लोकसभा सीटों पर जीत का अपना आंकड़ा वह दोहरा सकती है। खंडित जनादेश की स्थिति में इन 20 सीटों का यकीनन महत्व होगा।
जब मैं भविष्य के बारे में सोचता हूं, तो मुझे भारी मंथन की संभावना दिखती है। मुझे लगता है कि अगले दशक में भी गठबंधन की राजनीति ही चलेगी। हम एक ऐसे दौर में हैं, जब केंद्र में गठबंधन की दरारों को भरने के लिए स्वीकार्यता एवं सामंजस्य बहुत जरूरी है।
लेकिन ऐसा कोई सर्वोच्च नेता नहीं है, जो पूरी व्यवस्था को अपने साथ जोड़ सके। हो सकता है कि हमें इसी वर्ष सितंबर-अक्तूबर में लोकसभा चुनाव का सामना करना पड़े। ऐसे में बहुत ज्यादा तब्दीली नहीं आएगी। हर कोई एक-दूसरे पर आरोप मढ़ेगा, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं होगा, क्योंकि हर कोई आखिरी क्षण तक चुनाव का इंतजार करेगा।