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मानवाधिकार और नई तरह की चुनौतियां: जस्टिस रामासुब्रमण्यन एनएचआरसी अध्यक्ष, नागरिकों को रचनात्मक सुअवसर की आशा

Kanhaiya Tripathi कन्हैया त्रिपाठी
Updated Fri, 17 Jan 2025 05:28 AM IST
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सार
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जिम्मेदारी एक बेहद अनुभवी शख्स को सौंपी गई है, जिनके अनुभवों का लाभ समाज के हर तबके को मिलेगा।
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NHRC Chief from Tamil Nadu Justice V Ramasubramanian citizens hope optimum representation
न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यन बने एनएचआरसी प्रमुख - फोटो : nhrc.nic.in

विस्तार

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नए अध्यक्ष के रूप में न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन सुशोभित हुए हैं। 30 जून, 1958 को तमिलनाडु के मन्नारगुडी में जन्मे न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित पूर्व न्यायाधीश हैं। जब सन 1993 में आयोग के पहले अध्यक्ष न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा बने थे, उन दिनों भारत की स्थितियां कुछ और थीं। भारत अपने उदारवादी नीति को अपनाकर आर्थिक तंगी से उबरा था। आज की परिस्थितियां बहुत अलग हैं।


आज भारत के लिए यदि उसकी बड़ी जनसंख्या ताकत के रूप में देखी जा रही है, तो वह चुनौती के रूप में भी परिभाषित की जा रही है। जीने के यत्न में मनुष्य की गरिमा, सुरक्षा, स्वतंत्रता, बंधुता और बुनियादी जरूरतें पूर्ण करने की चुनौती सरकार के पास भी है। मानवाधिकारों की सुरक्षा तो मनुष्य की समग्र उन्नति व आनंद के विषय हैं। 21वीं सदी के 25वें वर्ष के सफर में हम सभी सम्मिलित हैं। ऐसे समय में न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जिम्मेदारी दी गई है। पूरा भारत जानता है कि उनके पास 40 वर्षों से अधिक न्याय प्रणाली  के विविध अनुभव हैं।


उनके पूर्ववर्ती कार्य, जिनमें सेवा कानून, मद्रास उच्च न्यायालय, प्रशासनिक न्यायाधिकरण, उपभोक्ता मंच और दीवानी अदालतों में दिए गए योगदान अपनी एक नई लंबी लकीर खींचते हैं। वह 102 मामलों में निर्णय लिखने के बाद 29 जून, 2023 को सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए, जिसमें 2016 की नोटबंदी नीति जैसे ऐतिहासिक मामले और रिश्वत के मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य की वैधता से जुड़े मामले शामिल थे। ऐसे अनुभवी व्यक्तित्व को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जिम्मेदारी राष्ट्रपति ने सौंपी है, तो निश्चय ही इसके साथ भारत के एक सौ चालीस करोड़ जनमानस की अपनी उम्मीदें भी हैं। आज भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के लिए सूचना तकनीकी और सूचना संजाल की उपस्थिति में सबकी गरिमा सुनिश्चित करना आसान हो गया है। जल्द ही देश के एक कोने से दूसरे कोने तक संपर्क साधकर मानव अधिकारों के संवर्धन व संरक्षण के लिए कार्य सुनिश्चित किया जा सकता है। इतनी व्यवस्थाओं के बीच अब मानव अधिकारों के संरक्षण से वंचित समाज भारत में रहे, यह एक शर्मनाक स्थिति मानी जाएगी।

भारत के लिए आज चुनौतियां नए तरीके की हैं। दलित, पिछड़े, आदिवासी, एलजीबीटीआईक्यू समाज और उसमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और दिव्यांग, सबकी गरिमा के सवाल हैं, तो इस देश को जलवायु परिवर्तन व एसडीजी-2030 के लक्ष्य की भी चुनौती को स्वीकार करने की आवश्यकता है। जेलों में बंद कैदी, ठेले-रिक्शे से जीवन-यापन कर रहे श्रमिक, कामकाजी लोग और जरूरतमंद सबको उम्मीदें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और उसके नेतृत्व से हैं। न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन के नेतृत्व को ध्यान रखना होगा कि हम भारत के सभी जन तक पहुंचें और उनके संपूर्ण विकास, उन्नति व आनंद के लिए अवसर प्रदान करें। सशक्त मानवाधिकार संपन्न लोग ही विकसित भारत का पैमाना होंगे। यदि कोई पीछे छूट जाएगा, तो देश पीछे रह जाएगा। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सबसे अच्छी बात यह रही है कि उसने स्वतः संज्ञान के मामले में सक्रियता दिखाई है। जैसा कि न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन के बारे में ऐसा माना जाता है कि वह खुद व्यक्तियों के बीच अधिकारों के पालन और आनंद को सुरक्षित करने के लिए राज्य पर एक सकारात्मक दायित्व के हिमायती रहे हैं। उनसे भारत की जनता की उम्मीदें इसलिए ज्यादा बढ़ गई हैं और जनता को यह विश्वास भी है कि न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन उनके लिए सदैव तत्पर रहेंगे।

पूर्व के अनुभव निश्चय ही एक सच्चे व सजग व्यक्तित्व को अपना नया रोडमैप तैयार करने में सहयोगी साबित होते हैं। न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने वैयक्तिक जीवन में अपनी छवि सरल, विनम्र, दयालु की बनाई है। उनकी चिंता व चिंतन ही अब भारत के लोगों के लिए नए प्रतिमान बनेंगे। संविधान लागू होने के 75 वर्ष बीत जाने के बाद देश के सभी नागरिकों को नए तरीके से तैयार करना है, ताकि वे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों के सार्वभौम घोषणा पत्र के साथ जिएं और भारत की वैश्विक उपस्थिति को ताकतवर बनाएं।

नए अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने अपने पहले संबोधन में मानवाधिकारों को महत्व देने और उनका पालन करने की भारत की प्राचीन परंपरा पर प्रकाश डाला है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि मानवाधिकार भारत के सांस्कृतिक ताने-बाने में गहराई से अंतर्निहित हैं। मानवाधिकारों के संवर्धन एवं संरक्षण हेतु विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोगात्मक प्रयास की आवश्यकता है। यह बताता है कि आयोग के साथ सभी नागरिकों को नए रचनात्मक सुअवसर मिलेंगे।
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