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विकास का नया मानक चाहिए

Tue, 20 Nov 2012 01:08 AM IST
अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी Updated Tue, 20 Nov 2012 01:08 AM IST
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new standards for development

पर्यावरण सम्मेलन दुनिया में चाहे जहां भी आयोजित हों, मात्र दो बातों पर सिमट कर ही रह जाते हैं- बढ़ते औद्योगिकीकरण पर खींचतान या कुछ नए नारों के साथ सम्मेलनों की इतिश्री। हम इस पहलू को नकार देते हैं कि बिगड़ते पर्यावरण के तारणहार गांव ही हो सकते हैं। जैसे बढ़ते उद्योग शहरों की पहचान हैं, उसी तरह गांव ही मिट्टी-पानी के बड़े स्रोत हैं। वहीं जंगल-खेत पलते हैं और नदियां, कुएं, तालाब पनपते हैं। बिगड़ते पर्यावरण का उद्धार गांवों की समृद्धि ही कर सकती है।

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हमने यूरोप जैसे देशों की तर्ज पर विकास का सूचक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को मान लिया, जो शुरुआती दौर से ही गलत था। हमने हवा, मिट्टी, पानी, जंगल की स्थिति मापने की कभी आवश्यकता महसूस नहीं की। जीडीपी से हम अपने विकास के प्रति आश्वस्त तो हो सकते हैं, पर टिकाऊ और स्थायी विकास से दूर हो जाते हें।
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वन, पानी, हवा, मिट्टी हमारी मूल संपदा है। मूल इसलिए कि उनके बिना जीवन ही संभव नहीं। प्राकृतिक संसाधनों का अभाव हमारी चूलें हिला सकता है। दुर्भाग्य से इसके संकेत मिलने भी लगे हैं। अगर पानी की ही बात करें, तो हम एक बड़े संकट से रूबरू हैं। सभी बड़ी नदियों के अस्तित्व पर संकट है। दिल्ली की जीवनरेखा यमुना के हाल से सभी वाकिफ हैं।
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देश की राजधानी में मरती एक नदी सरकार की नदियों के प्रति गंभीरता दर्शाती है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि एक नदी की मौत वर्तमान और भविष्य की भी मौत होती है। देश की बड़ी-बड़ी नदियां नालों में तबदील हो गई हैं। पार्वती, गोदावरी, गोमती और गंगा-यमुना की सहायक नदियां मरने को हैं, पर इसकी चिंता किसी को नहीं है।

वनों का अस्तित्व भी इसी तरह संकट में है। सरकार कितने ही दावे कर ले, लेकिन बीते सौ वर्षों में हमने काफी जंगलों को खोया है। हमारे पास प्राकृतिक रूप से मात्र लगभग 31 लाख हेक्टेयर वन ही बचे हैं। केवल उनके क्षेत्रफल में ही कमी नहीं आई है, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। खरपतवार व निम्न स्तर की प्रजातियों ने वनों के घनत्व पर संकट डाला है। देश की वन नीति के अनुसार, हर मैदानी राज्य के पास 33 प्रतिशत वन होने चाहिए, मगर यह आंकड़ा किसी भी राज्य के पास नहीं है।

जहां तक मिट्टी की बात है, तो करीब 18 करोड़ हेक्टेयर भूमि संकटग्रस्त है। देश में 68 प्रतिशत मिट्टी पानी के साथ बह जाती है। यहां करीब 2.5 करोड़ हेक्टेयर भूमि घातक रसायनों के अतिक्रमण का शिकार है और 1.3 करोड़ हेक्टेयर भूमि की मिट्टी हवा बहाकर ले जाती है। मिट्टी का सवाल पेट से भी जुड़ा है और इसके संकटग्रस्त होने से खाद्य सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी। प्राण वायु के हालात भी अच्छे नही हैं। एक नए विश्लेषण के मुताबिक, भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ईरान, पाकिस्तान व भारत को सर्वाधिक प्रदूषित राष्ट्र बताया गया है। संगठन ने माना है कि अत्यधिक औद्योगिकीकरण व सस्ते ईंधन का अधिक उपयोग ही वायु प्रदूषण कारण है।

खेती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है, पानी। सिंचाई के अभाव में खेती का सर्वाधिक नुकसान होता है। वनों के अभाव के कारण भी खेती एवं पशुपालन प्रभावित हुआ है। शहरीकरण की अंधी दौड़ ने खेती पर प्रतिकूल असर डाला है। शहर यदि उत्पादों के प्रबंधन के लिए जाने जाते हैं, तो गांव उत्पादन के केंद्र हैं। पर हमने पिछले सौ वर्षों में विकास की दिशा बदल दी।

हमने विलासिता, सुविधा और भोगवादी कारकों को विकास का मापदंड मान लिया। सड़क, उद्योग, बहुमंजिली इमारतों से हमने विकास का सूचकांक तैयार किया, पर पर्यावरण का कोई मापदंड नहीं बनाया। भारत जैसे देश में, जहां आज भी करीब 70 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है, ऐसे सूचकांक कैसे मान्य हो सकते हैं, जिनमें गांवों के विकास को नकारा गया हो। आज जीडीपी में कृषि की भागीदारी घटकर 14 फीसदी पर पहुंच गई है। साफ है कि कृषि की उपेक्षा की गई है।

वर्तमान जीडीपी वाला विकास  सूचकांक मात्र शहरों की समृद्धि का सूचक है। इसका गांवों की खुशहाली या बदहाली से कुछ लेना देना नही। दूसरी तरफ गांव जो पैदा करते हैं, उसका लाभ सारा देश उठाता है। हम में से ऐसा कोई नहीं, जो बिना पानी, हवा, भोजन के जीवित रह सकता है। इन सबके बावजूद पिछले कुछ दशकों में घटते संसाधनों पर चितिंत विश्व अपने निर्णयों में भटका हुआ है। विकसित देशों की आर्थिक मार-काट भ्रम की स्थिति बनाए हुए है, जबकि बिगड़ते पर्यावरण का जवाब गांव ही हैं। शहरों और गांवों की समृद्धि में एक अंतर है- शहर खुद के लिए जीते हैं, जबकि गांव हमेशा सबकी सेवा करते आए हैं।

कथित विकास के जीडीपी वाले सूचकांक में जो सबसे बडी विसंगति दिखती है, वह है, गांवों व प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी। इस दृष्टिकोण ने पारिस्थितिकी के सारे समीकरणों को गड्डमड्ड कर दिया है। बिजली, पानी, भोजन का संकट इसी का परिणाम है, जिसका खामियाजा आने वाले समय में शहरों को ही भुगतना पड़ेगा। ऐसे में यह जरूरी है कि हम एक नए विकास सूचकांक की बात करें, जिसमें आर्थिक समृद्धि के साथ पर्यावरणीय समृद्धि की आवश्यकता पर भी बल दिया गया हो।


हमें ऐसा हिसाब-किताब तैयार करना होगा, जो हमें यह बताने में सक्षम हो कि जीडीपी की तर्ज पर पर्यावरण की बेहतरी के क्षेत्र में हमने वर्ष भर में क्या हासिल किया। सकल घरेलू उत्पाद की तरह हमें सकल पर्यावरण उत्पाद को भी लाना होगा और हर वर्ष हवा, मिट्टी, पानी, जंगल का भी ब्योरा देना होगा। इससे गांवों पर हमारी निर्भरता भी झलकेगी।
(मैगसायसाय पुरस्कार से सम्मानित लेखक ने पर्यावरण सूचकांक की मांग को लेकर आज से जलपाईगुड़ी से देहरादून तक की साइकिल यात्रा शुरू की है।)

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