चुनाव और घरौंदों का बनना-टूटना
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चुनाव महासमर की निर्वाचन आयोग द्वारा तिथियों की घोषणा भले ही न हुई हो, लेकिन विभिन्न दलों, गुटों और समुदायों के बीच चुनावी तैयारियां तेजी से आरंभ हो गई हैं। संचार माध्यमों द्वारा सबसे अग्रणी बताई जाने वाली नरेंद्र मोदी की पार्टी ने नौकरशाहों से लेकर राजनीतिक दलों व नए और पुराने समर्थकों को अपने साथ करने का अभियान तेज कर दिया है। इसमें सबसे बड़ी मदद कांग्रेस के इस पद के भावी उम्मीदवार कहे जाने वाले राहुल गांधी की दिशाहीनता से उपजी बेचारगी से मिल रही है, जो न तो अपने संगठन को खड़ा कर पा रहे हैं और न जनता में ही विश्वास भर पा रहे हैं। वह वास्तव में 2009 की अपेक्षा पार्टी को आगे ले जाने में समर्थ होंगे, ऐसा नहीं लगता। पिछले पांच वर्षों से सरकार की कार्य पद्धति, कमियों, विफलताओं और तमाम घोटालों के फलस्वरूप लोगों में जो निराशा बढ़ रही है, मोदी उसका भरपूर लाभ उठाना चाहते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि भाजपा के साथ जाने वाले आखिर हैं कौन। क्या देश की जनता का मूड बदल गया है? वे वही हैं, जिनका कभी भाजपा से ताल्लुक था, वैचारिक दृष्टि से उनके साथ थे। पूर्व सेना अध्यक्ष वी के सिंह, जो सेवाकाल विस्तार के लिए उम्र के नाम पर सर्वोच्च न्यायालय में लड़ाई लड़ रहे थे, और बाद में अपने कदम पीछे खींच लिए और सेवामुक्त होने के बाद अन्ना के समर्थक बन गए थे तथा हरियाणा में सेवामुक्त कर्मचारियों की सभा में नरेंद्र मोदी के साथ भी मौजूद थे, अब औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए हैं। 1990 में बिहार के गृह सचिव के रूप में आडवाणी को गिरफ्तार करने वाले आर के सिंह केंद्रीय गृह सचिव पद से मुक्ति के बाद राजनीतिक मनोरथ सिद्धि के लिए भाजपा के उम्मीदवार बन गए हैं।
राजनीति में कौन कब, किस ओर रहेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि वह अपनी घोषित नीतियों, विचारों और कार्यक्रमों के प्रति कितना वफादार है। वह सत्ता के लिए विचार परिवर्तित करने में भी गुरेज नहीं करता। इस रूप में राजग यानी अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में रेल मंत्री रहे रामविलास पासवान अब पुनः मोदी के साथ होकर पुराना रूप धारण कर रहे हैं। इसके पहले वह लालू और कांग्रेस के साथ थे। इसी प्रकार भाजपा गठबंधन में शामिल होने के लिए भूमिका बनाने का कार्य आरंभ कर चुके करुणानिधि के बारे में यह कैसे भूल जाएं कि उनकी पार्टी भी भाजपा सरकार की सहयोगी रह चुकी है। वैसे तमिलनाडु में करुणानिधि और जयललिता, दोनों विरोधी नेता एक साथ नहीं रह सकते। इसलिए आज भी जब जयललिता तीसरा मोर्चा में शामिल होने जा रही है, करुणानिधि का दूसरी ओर जाना स्वाभाविक ही है।
अब प्रश्न यह उठता है कि कभी राजनीति को गंदगी बताने वाले और नया दल गठित करने के लिए अरविंद केजरीवाल का विरोध करने वाले अन्ना हजारे आज ममता के साथ जुड़ रहे हैं, तो उसके पीछे मूल तत्व क्या है। यदि उनका इतिहास देखा जाए, तो उनका अभ्युदय महाराष्ट्र की सक्रियता और राजनीति से हुआ था। वह कभी कांग्रेस या कांग्रेस प्रगतिशील मोर्चे के साथ नहीं रहे हैं, बल्कि जब उन पर यह आरोप लग रहा था कि वह भाजपा के खिलाफ नरम रहे हैं, तो उन्होंने सफाई दी थी कि उन्होंने एक बार भाजपा सरकार के खिलाफ अनशन किया था। क्या इसे निर्णायक माना जाए? इस रूप में ममता बनर्जी दो बार राजग के साथ और उसकी सरकारों में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुकी हैं। वामपंथी उनके मुख्य शत्रु हैं, जिनको किसी कीमत पर बर्दाश्त न करना उनकी वैचारिक विवशता है।
इसी प्रकार कई अन्य छोटे नेता भी अपनी पार्टियां छोड़कर भाजपा में शामिल होना चाहते हैं, जैसे चंद्रबाबू नायडू, जिन्हें तेलंगाना गठन और बचे सीमांध्र की राजनीति में भाजपा का साथ देने में कोई कठिनाई नहीं है। वह पहले भी राजग के ही सहयोगी रहे हैं, भले ही चुनावी घोषणाएं सांप्रदायिकता से भिड़ने की रही हो। राजनीति में संन्यासी नहीं, सबसे अधिक वे लोग आते हैं, जिन्हें सत्ता सुख और लाभ चाहिए। इसलिए विभिन्न कालों में राजनीति के लिए बेटे ने बाप को कैद किया या भाई की भी हत्या की है। औरंगजेब के अलावा बिंदुसार भी इसके उदाहरण हैं। राजनीति में आखिर हिटलर भी तो समाजवाद का नाम लेकर ही लड़ा था और चुनाव जीतने के बाद फासिस्ट बना था।