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नया संसद भवन: लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास स्थापना, नव सभा सदन को गरिमामय बनाता रहेगा धर्मदंड सेंगोल

Sun, 28 May 2023 06:49 AM IST
Kapil Kapoor कपिल कपूर
Updated Sun, 28 May 2023 06:49 AM IST
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सार
लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास स्थापित होकर सेंगोल नव सभा सदन को निरंतर गरिमामय बनाता रहेगा और इस तरह, हानि और पुनरुत्थान का चक्र अपना वृत्त पूरा करेगा।
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new parliament house sengol legacy Chola era tradition symbol of power transfer
नया संसद भवन - फोटो : Social Media

विस्तार

आज 28 मई को नव सभा सदन का उद्घाटन भारतीय जनता के लिए अपनी सभ्यता की रक्षा के लंबे इतिहास में एक मील का पत्थर है। इस उद्घाटन के साथ 'न्यायोचित शासन' का प्रतीक, धर्मदंड सेंगोल, भी लोकसभा अध्यक्ष के आसन के साथ स्थापित कर दिया जाएगा। यह भारत में सर्वाधिक दीर्घायु चोल राजवंश (848-1279 ई.) के धर्मदंड जैसा ही होगा, जिसे एक राजा से अगले राजा को हस्तांतरित किया जाता था। इस तरह, भारतीय सभ्यता का अपेक्षित गुण पुनः स्थापित किया जाएगा।


प्रधानमंत्री जब नए जन सभा सदन का अनावरण करेंगे, तो वह इतिहास की परतों को भी हटाएंगे और भारत की बहुसंख्य जनता को भी पुनर्स्थापित करेंगे, जो इसकी नैसर्गिक उत्तराधिकारी हैं, जिन्हें अपनी तरह से अपना शासन चलाने का अधिकार है। हिंदू राज्यनीति बेबीलोन सभ्यता जितनी ही या उससे भी पुरानी है, जो केवल एक शब्द के संविधान धर्म से चलती रही है। बर्बरों के बार-बार हमलों ने इस राज्यनीति को तोड़ा और एक जानी-मानी महान सभ्यता को सुषुप्ति में डाल दिया।


सन् 1947 में अंग्रेजों की विदाई का उत्साह से स्वागत हुआ, यद्यपि इसमें भारतीय लोगों और भूमि को मानो बीचोबीच काट डाला गया, जिसे अधिकांश भारतीय माता समान पावन मानते रहे थे। फिर भी लोगों ने सोचा कि अब शासक-शासित, शोषक-शोषित की खाई खत्म हुई। किंतु दरअसल मात्र नए प्रकार के 'राजाओं ने स्थान ले लिया। वे ब्रिटिश शिक्षा को बनाए रखकर कुछ नए दुराग्रही कानून बनाकर एक 'सोशल इंजीनियरिंग करके, आंखों पर पर्दा डाल जनसांख्यिकी विघटन को प्रोत्साहन देकर इस हिंदू भूमि को हिंदुत्व-विहीन बनाते, इस सभ्यता का मूल चरित्र बदलते हुए, समाज व संस्कृति को पुनर्गठित कर, अपनी सत्ता बनाए रखने पर अड़े थे।

26 मई, 2014 को शपथ ग्रहण के बाद, नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने। विनम्रता की साक्षात मूर्ति, उन्होंने पहले अविलंब निर्धनों एवं वंचितों के लिए, निर्धन स्त्रियों, असंगठित मजदूरों, लड़कियों, और सभी निर्धन बच्चों के लिए, जो शिक्षा चाहते थे, सब कुछ किया। इसके अतिरिक्त बिना वर्ण, जाति, पंथ का भेद किए किसानों और मजदूरों के लिए अनेक योजनाएं आरंभ कीं। उन्होंने निस्संकोच गंगा- आरती करके, तथा अपने वचनों-कर्मों के द्वारा अपनी पात्रता घोषित की कि वह राजा नहीं, अपितु एक सेवक हैं, जो झुककर बड़ों, संतों और स्त्रियों के पैर छूता है। जनता के आदमी के रूप में उन्हें सार्वभौमिक मान्यता मिली।

अब समय था कि एक भारतीय लोक मंदिर बने। नया संसद भवन केवल लोकतंत्र का सदन नहीं है, वह भारत के पारंपरिक धार्मिक शासन, न्यायोचित शासन का भी प्रतीक है। इस प्रतीक की खोज सेंगोल तक पहुंची। बड़ी सुंदरता से बना यह मूल्यवान 'धर्मदंड' इलाहाबाद संग्रहालय में रखा है, जिसकी 1947 की एक कहानी भी है।

यह बहुश्रुत है कि लॉर्ड माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण के संदर्भ में नेहरू जी से किसी भारतीय प्रतीक के बारे में पूछा, जैसे ब्रिटिश परंपरा में संप्रभु के चिह्न (सोवरेन्स ओर्ब) के रूप में सन् 1661 से ही हर नए संप्रभु को हस्तांतरित किया जाता है, जो चार्ल्स द्वितीय के राज्याभिषेक में उन्हें दिया गया था। नेहरू जी ने राजगोपालाचारी से चर्चा की, जिन्होंने थिरुवावदुथुरई के प्राचीन शैव मठ आधीनम के तत्वावधान में, उसी डिजाइन का सेंगोल बनवाया। यह चेन्नई के विशिष्ट कारीगरों ने हाथ से बनाया था। उसे डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थति में, पूरे समारोह के साथ, 15वीं शताब्दी के आधीनम के प्रतिनिधि पुरोहित श्री कुमारास्वामी थंबिरन ने अनुष्ठानपूर्वक मंत्रोच्चार के साथ, नेहरू जी को प्रदान किया। उस अवसर पर भगवान शिव की स्तुति में रची गई सबसे प्राचीन तमिल रचना कोलारु पथिगम के 11 श्लोकों का उच्चार भी होता रहा। वह रचना सातवीं शताब्दी के कवि संत थिरुज्ञान सम्बन्द ने तमिलनाडु में की थी, जिनके बारे में माना जाता है कि वह केवल सोलह वर्ष जीवित रहे। वह तमिलनाडु के प्रसिद्ध शिवभक्त 63 नायनारों में से एक थे।

उस अवसर के चित्र उपलब्ध हैं, जिनमें सेंगोल ग्रहण करते नेहरू जी असहज दिखते हैं। तब अखबारों में उसके समाचार छपे थे। किंतु दुख की बात है कि तब प्रधानमंत्री उस घटना के आध्यात्मिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व को समझने में विफल रहे, और उस मंत्राभिषिक्त सेंगोल को सरसरी तौर पर इलाहाबाद संग्रहालय को भेजकर उसे भूल गए। हालांकि तमिल प्रेस में 1978 में उस प्रसंग की फिर चर्चा हुई, और बीच-बीच में होती रहती है।

जब वर्तमान प्रधानमंत्री को, जो भारत के अतीत के संदेश की खोज में थे, यह बताया गया, तो उन्होंने महसूस किया कि सेंगोल न्यायोचित शासन पद्धति का पवित्र प्रतीक है। उसे बड़े पुरोहितों ने अभिषक्त किया था। उसके साथ शताब्दियों के आशीर्वाद थे, जो धर्मनिष्ठा का महत्व और भारतीय सभ्यता की शक्ति दर्शाता था, जो महान चोल शासकों में व्यक्त हुआ था। अतः प्रधानमंत्री ने निश्चय किया कि आजादी के अमृत महोत्सव के अंग के रूप में 14 अगस्त, 1947 की वह घटना दोहराई जाए। लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास स्थापित होकर सेंगोल नव सभा सदन को निरंतर गरिमामय बनाता रहेगा और इस तरह, हानि और पुनरुत्थान का चक्र अपना वृत्त पूरा करेगा।
-लेखक जेएनयू के पूर्व प्रो-वीसी हैं
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