राजनीति के नए प्रक्षेपास्त्र

सुधीर विद्यार्थी Updated Wed, 07 May 2014 07:05 PM IST
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New missile of politics

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साधो, स्याही, चप्पल, थप्पड़, जूता, अंडा और मुक्का, ये सब राजनीति के नए प्रक्षेपास्त्र हैं। इनके बिना अब चुनावी युद्ध जीता नहीं जा सकता। स्याही की कुछ बूंदें किसी उम्मीदवार के चेहरे की रंगत बदल देती हैं। पर बंदे के चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। वह चुनावी मौसम को होलियाना समझ लेता है और लपक कर गले मिलता है। एक चप्पल किसी के सिर तक पहुंचकर इतिहास में दर्ज हो जाती है। थप्पड़ या मुक्का लगने पर कोई अपना गाल नहीं सहलाता। मुक्का लगते ही उनके भीतर वीर भाव पैदा हो जाता है। पार्टी मुखिया उम्मीदवार से पूछता है, आपके ऊपर कितनी बार स्याही फेंकी गई, कितनी चप्पलें फेंकी गई, कितने मुक्के लगे और अंडों की बौछार कितनी बार हुई?
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चुनाव लड़ने वालों की ये नई योग्यताएं हैं। अब वे बायोडाटा में अपनी इस क्वालीफिकेशन को दर्ज कर रहे हैं। पार्टी उम्मीदवार टिकट पाने की जुगत में जुलूसों में खुद अपने ऊपर स्याही, चप्पल और जूते फिंकवाने की व्यवस्था करने लगे हैं। इन मामलों में ज्यादा जरूरी उसका प्रचार है। स्याही, चप्पल या अंडे फेंके गए और मीडिया में एक तस्वीर न आई, तो सारी कवायद व्यर्थ। इसे अंजाम देने के लिए प्रत्याशियों को कई बार अलग से खर्च करना पड़ता है। एक प्रत्याशी ने अपने ऊपर स्याही फिंकवाना तय किया। जिस आदमी ने स्याही फेंकी, वह लक्ष्य तक नहीं पहुंची। कई बार प्रयास किया गया, लेकिन सब व्यर्थ। ऐसे में प्रत्याशी ने स्याही फेंकने के लिए दिए पैसे वापस ले लिए।
अरविंद केजरीवाल अंडे की अहमियत जानते हैं। यह अंडा उन्हें संसद तक पहुंचा सकता है। एक अंडा, जो ज्यादा-से-ज्यादा अच्छे आमलेट में तब्दील हो सकता था, एकाएक ऊंचा उठकर संसदीय राजनीति का वाहक बन बैठा। मुर्गी के हर अंडे को यह अहमियत प्राप्त नहीं होती कि वह इतिहास में अलग से मुकाम तय कर ले। जो भी हो, राजनीति में अब अंडे, स्याही, चप्पल, जूते, थप्पड़ और मुक्के के योगदान पर नए सिरे से चिंतन करने की जरूरत महसूस की जाने लगी है।
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