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आकलन: मजबूत इमारत की तामीर, भारत के प्रति विश्वास, प्रतिष्ठा और प्रभाव का नया दौर

Meghnad Desai लॉर्ड मेघनाद देसाई
Updated Tue, 26 Dec 2023 07:32 AM IST
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सार
हाल के समय में जो बदलाव दिखा है, उसने संभावनाओं को सुंदर कर दिया है। भारत के प्रति विश्वास, प्रतिष्ठा और प्रभाव का यह नया दौर है। वैश्विक स्तर पर संबंधों में जो अनूठा संतुलन बनाया गया है, उसकी अरब, अमेरिका और इस्राइल-यूक्रेन के हवाले से तस्दीक होती है।
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new era of trust, prestige and influence for India, unique balance created in relations at global level
Joe Biden, PM Modi - फोटो : ANI

विस्तार

व्यापक संभावना और भविष्य में अवसरों का अंबार। भारत के संदर्भ में यह मेरा आकलन है। सवाल है कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? दरअसल मैंने अपनी जिंदगी के ज्यादा हिस्से विदेशों, खासतौर पर लंदन में बिताए हैं। विश्वास मानिए, इससे पहले मैंने दुनिया के देशों में भारत के प्रति इतना विश्वास, भरोसा और इतनी प्रतिष्ठा कभी नहीं देखी। एक पंक्ति में कहूं, तो बीते करीब एक दशक में देश के विकास की ठोस नींव पड़ी है। अब इस नींव पर ठोस इमारत के निर्माण की प्रतीक्षा है।



यह बदलाव बीते करीब एक दशक में दिखा है। देश में विकास दिख रहा है। तकनीकी के बेहतर इस्तेमाल, डिजिटल क्रांति के जरिये भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ी जा रही है। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। आजादी के बाद पहली बार मोदी सरकार ने गरीब कल्याण योजनाओं को सही अर्थों में योग्य लाभार्थियों तक पहुंचाया है। इस दौरान अहम नीतिगत बदलावों के कारण देश में लालफीताशाही कम हुई है। गरीबी, भ्रष्टाचार में कमी आने के साथ देश में मध्य वर्ग का तेजी से विस्तार हो रहा है। जरूरी नीतिगत बदलावों सहित कई अहम सुधारों के कारण निवेश के मामले में दुनिया का भारत पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है। विदेशी निवेश के लिए निवेशक स्थायित्व और उलझावपूर्ण प्रक्रियाओं से मुक्ति चाहते हैं। ये सारी शर्तें बीते एक दशक में तेजी से पूरी हो रही हैं।


आप भारत में ही नहीं, दुनिया के दूसरे देशों में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को आंक सकते हैं। विविधताओं से भरा बड़ा देश होने के कारण भारत में मुद्दों की भरमार है। मणिपुर, सांसदों के निलंबन सहित कई घटनाओं के कारण दुनिया की निगाहें भारत की ओर इस दृष्टि से भी घूमती हैं, मगर दूसरा पक्ष यह है कि प्रधानमंत्री मोदी पर मतदाताओं का भरोसा बदस्तूर कायम है। यह भरोसा कई कारणों से है। मोदी सरकार राष्ट्रवादी सोच वाले मतदाताओं के साथ-साथ दशकों तक विकास के हाशिये पर रहे वर्ग का भी भरोसा बनाए रखने में सफल रही है। मुझे नहीं लगता कि आने वाले आम चुनाव में कांग्रेस या उसकी अगुवाई में बना गठबंधन उनके लिए कोई चुनौती पेश कर पाएगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद कांग्रेस का जोश चला गया है और उसके सहयोगी दलों में भी कोई ऐसा नेता नहीं है, जो मोदी को दूर-दूर तक चुनौती देने की स्थिति में हो। फिर बात भाजपा के प्रबंधन की भी है। पार्टी पूरी तरह से अनुशासित है और कार्यकर्ता मोदी के व्यक्तित्व के प्रति पूरी तरह से वशीभूत हैं।

साल 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही भारत के राजनीतिक हलके में मोदी सरकार के संदर्भ में भारत के दूसरे देशों से रिश्तों पर लगातार कयासबाजी हुई है। कूटनीति के क्षेत्र में भी भारत बेहतरीन संतुलन बनाने में कामयाब हुआ है। उदाहरण अरब देशों के साथ ही अमेरिका और पश्चिम देशों से भारत के वर्तमान रिश्ते हैं। हमारे सामने रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ इस्राइल-फलस्तीन तनाव में भारत की भूमिका का उदाहरण है। विदेश नीति में भारत अपनी जरूरतों को पहली बार डंके की चोट पर वरीयता दे रहा है। भारत की ओर से वैश्विक मुद्दों पर मजबूती से अपना पक्ष रखने और उस पर आगे बढ़ने के बावजूद न तो पश्चिमी देशों से उसके रिश्ते खराब हो रहे हैं और न ही इस्लामी देशों की रीति-नीति तय करने वाले अरब देशों से। बेहतरीन कूटनीतिक रणनीति मोदी सरकार के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद कश्मीर मामले में भी दिखी। सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया। बावजूद इसके इस फैसले के कारण अरब देशों से भारत के रिश्ते प्रभावित नहीं हुए। उल्टे कुछ अरब देशों ने कश्मीर में निवेश का फैसला लिया।

अब बदली परिस्थितियों में एक तबके को लगता है कि कनाडा में खालिस्तानी आंदोलन का प्रतिनिधित्व करने वाले निज्जर की हत्या और अमेरिका में इसी आंदोलन से जुड़े भारत द्वारा आतंकी घोषित किए गए पन्नू की हत्या की साजिश का मामला सामने आने के बाद भारत के पश्चिमी देशों से रिश्ते प्रभावित होंगे। हालांकि मुझे लगता है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला। कनाडा की गंभीर आपत्तियों को उसकी अपेक्षा के अनुरूप बल नहीं मिल रहा, जबकि पन्नू मामले में भारत और अमेरिका, दोनों द्विपक्षीय रिश्तें में आंच नहीं आने देने के लिए सतर्क नजर आ रहे हैं।

हां, एक नया सवाल देश में लोकतंत्र के कथित तौर पर कमजोर होने का है। यहां समस्या दूसरी है। भारत की बहुसंख्यक आबादी ने होश संभालने के बाद ढाई दशक तक लचीला रुख अपनाने वाली गठबंधन की सरकारों का दौर देखा है। जबकि हकीकत यह है कि भारत में बहुमत की सरकारें इसी अंदाज से चलती हैं। मसलन, प्रचंड बहुमत वाली इंदिरा सरकार के दौरान आपातकाल जैसी घटना हुई। राजीव सरकार के कार्यकाल में अल्पसंख्यक महिला शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को संसद के जरिये पलटा गया। कुछ लोग शीतकालीन सत्र में बड़ी संख्या में सांसदों के निलंबन को ऐसी घटनाओं से जोड़ कर देख रहे हैं। चूंकि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद यहां लोकशाही का सफर अभी शैशव काल में ही है। ऐसे में इस दिशा में हालात बदलने के लिए हमें कुछ दशकों तक और इंतजार करना होगा।
(-लेखक, भारत में जन्मे ब्रिटिश अर्थशास्त्री हैं। ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स के पूर्व सदस्य एवं लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के एमेरिटस प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित।)

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