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पड़ोसी पहले की नीति पर पुनर्विचार हो: भारत के स्वाभाविक क्षेत्रीय प्रभाव से निष्ठा सुनिश्चित नहीं, दिल्ली असहज
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पीएम मोदी (फाइल)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ‘पड़ोसी पहले’ की नीति शुरू करने के एक दशक बाद आज नई दिल्ली के सामने एक असहज स्थिति है। बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल, नेपाल व मालदीव में बदलते समीकरण, चीन की बढ़ती मौजूदगी और पाकिस्तान की वैश्विक स्तर पर बढ़ती सक्रियता ने साफ कर दिया है कि भारत का स्वाभाविक क्षेत्रीय प्रभाव पड़ोसी देशों की निष्ठा सुनिश्चित नहीं कर सकता। ऐसे में, बदलते हालात भारत से अपनी नीति पर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं।
भारत चीन की वित्तीय ताकत की बराबरी नहीं कर सकता है, न ही उसे हर चीनी निवेश को घेराबंदी की रणनीति मानना चाहिए। बेहतर उपाय यह है कि नई दिल्ली आर्थिक रूप से उपयोगी परियोजनाएं समय पर पूरी करे, ऊर्जा संपर्क बढ़ाए और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप साझेदारी विकसित करे। बांग्लादेश के मामले में शेख हसीना सरकार के साथ भारत की निकटता ने वहां के कुछ राजनीतिक वर्गों में यह धारणा पैदा की है कि नई दिल्ली ने एक दल विशेष पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया। ऐसे में, तीस्ता जल बंटवारा, सीमा प्रबंधन, व्यापार व ऊर्जा सहयोग जैसे मुद्दों पर लगातार संवाद जरूरी है।
पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी व बंगाल की खाड़ी में संतुलन के लिए ढाका के साथ स्थिर संबंध महत्वपूर्ण हैं। नेपाल के साथ गहरी सभ्यतागत और सांस्कृतिक निकटता के बावजूद सीमा विवाद, आर्थिक मतभेद और नेपाल के मामलों में भारत के हस्तक्षेप की धारणा ने भारत-नेपाल के संबंधों में तनाव पैदा किया है। चीन की बढ़ती भागीदारी के बीच भारत को ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ की भावना को अपनाकर बातचीत और नेपाल की विदेश नीति का सम्मान करते हुए भरोसा मजबूत करना चाहिए। मालदीव के मामले में भारत को समुद्री सहयोग बनाए रखते हुए मालदीव के राजनीतिक फैसलों का सम्मान करना होगा।
श्रीलंका के आर्थिक संकट के दौरान भारत ने समय पर वित्तीय मदद कर क्षेत्रीय साझेदारी की क्षमता दिखाई। अब उसे व्यापार, ऊर्जा तथा समुद्री सहयोग को और मजबूत करना चाहिए। साथ ही, श्रीलंका की संप्रभुता व तमिल समुदाय की चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखनी चाहिए। पाकिस्तान के साथ संबंधों में सुधार के लिए सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय कार्रवाई के साथ तनाव प्रबंधन के लिए कूटनीतिक माध्यम खुले रखना जरूरी है। म्यांमार में सैन्य तख्तापलट, संघर्ष, शरणार्थियों का पलायन और सीमा पर उग्रवादी गतिविधियों ने भारत के लिए चुनौतियां बढ़ाई हैं। वहीं, अफगानिस्तान में मानवीय सहायता और विकास सहयोग जारी रखना भारत की रणनीतिक मौजूदगी बनाए रखने के लिए जरूरी है।
पड़ोसी देशों की घरेलू राजनीतिक आकांक्षाएं, भारत के अपने कूटनीतिक फैसले और चीन की लगातार बढ़ती सक्रियता भी इन संबंधों को प्रभावित कर रही है। इसलिए, अब भारत की पड़ोसी पहले की नीति को क्षेत्रीय प्रभुत्व से धैर्यपूर्ण साझेदारी की ओर बढ़ना होगा। नई दिल्ली को अपनी वास्तविक सुरक्षा चिंताओं व पड़ोसी देशों के संप्रभु फैसलों के बीच फर्क समझना होगा। रणनीतिक संयम कमजोरी नहीं, लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखने में एक निवेश है।