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मुद्दा: प्राथमिक शिक्षा की ऐसी उपेक्षा! हजारों बच्चों का निरक्षर रहना 'विकसित भारत' लक्ष्य के लिए चिंताजनक
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स्कूली छात्र (प्रतीकात्मक)
- फोटो :
अमर उजाला / एजेंसी
विस्तार
एक अखबार की खबर का शीर्षक था- ‘एक-एक शिक्षक के भरोसे चल रहे नगर के 27 विद्यालय।’ विद्याविहीन होते बचपन की आशंकाओं ने अपने भीतर के विद्यार्थी को बेचैन कर दिया। इससे देश भर की विद्यालयी शिक्षा की दयनीयता को समझा जा सकता है। हम इसी माह 76वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं। हमारे संविधान ने हर बच्चे को शिक्षित करने का प्रावधान किया है। शिक्षा धनी-निर्धन सभी समुदायों को उपलब्ध कराना राज्य की सांविधानिक वचनबद्धता है। शिक्षा राष्ट्र को सभ्य, सुसंस्कृत और आत्मनिर्भर बनाने का पहला साधन है। देश के युवाओं में बढ़ती हिंसा और अनैतिक प्रवृत्ति को शिक्षा के जरिये रोका जा सकता है।ग्रामीण भारत में प्राथमिक स्कूलों की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है और इसे सुधारने के उपाय कम होते जा रहे हैं। सरकारी स्कूलों की उपेक्षा सभी सरकारों में हुई है। बड़ी संख्या में प्राइमरी स्कूलों की अकाल मौतें हो चुकी हैं। गरीबी-अमीरी में, ग्रामीण-शहरी शिक्षा में भेदभाव गहरा हुआ है। वर्ष 2021-2022 में की गई स्कूली गणना के अनुसार, देश में कुल दस लाख, बाईस हजार, तीन सौ छियासी सरकारी स्कूल हैं, तथा तीन लाख, पैंतीस हजार, आठ सौ चौवालीस निजी स्कूल हैं।
ध्यान देने की बात है कि सरकारी स्कूल 50 वर्षों से अधिक समय में इतनी संख्या में खड़े हो पाए और दो दशकों से लगातार गिरावट के शिकार होकर इस अंजाम तक पहुंचे हैं कि आज सैकड़ों स्कूल शिक्षक विहीन हो गए हैं। जबकि दशकों में ही निजी स्कूलों की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। अपवाद स्वरूप, लखनऊ का ‘सिटी मांटेसरी स्कूल' छात्रों की उल्लेखनीय संख्या के साथ चलता रहा है। इसमें चालीस हजार छात्रों के पढ़ने को सबसे बड़ा रिकॉर्ड बताया जाता है। सपा और बसपा सरकारों के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में ग्रामीण प्राथमिक स्कूलों की दशा बद-से-बदतर होती चली गई और यह गिरावट रुकने का नाम नहीं ले रही।
उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूल या तो बंद हो रहे हैं या बिना-शिक्षकों, बिना पुस्तकों के चल रहे हैं। स्कूलों का बजट इतना कम हो रहा है कि न तो पर्याप्त शिक्षक हैं, न बुनियादी ढांचा ही। राजनेता अपने बच्चों को या तो अंग्रेजी माध्यम के महंगे निजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं या विदेशी स्कूलों में भेज चुके हैं। ताजा खबर यह है कि उत्तर प्रदेश में सत्ताईस हजार सात सौ चौंसठ स्कूल और बंद होने वाले हैं। तर्क दिया गया है कि पचास से कम छात्रों वाले स्कूलों को बंद किया जा रहा है। ऐसे स्कूलों की संख्या सत्ताईस हजार, नौ सौ इकत्तीस है। पर जब स्कूल में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जाएंगी, अध्यापक विहीन स्कूलों में पचास तो दूर, पांच बच्चे भी कैसे मिलेंगे?
ग्रामीण भारत में किसानों, कृषि मजदूरों और पिछड़ी कामगार जातियों, अनुसूचित जातियों एवं अ.जन.जातियों के अधिसंख्य बच्चों की शिक्षा सरकारी स्कूलों पर निर्भर करती है। इन कामगारों का देश की भीतरी समृद्धि, बाह्य सुरक्षा और सभी सेवाओं में प्रमुख योगदान रहता है। इनकी बौद्धिक सशक्तता ही राष्ट्र की आंतरिक शक्ति बनती है। ये अगर शिक्षा के भेदभाव की शिकार होंगी, तो असंतोष और अविश्वास के वातावरण में जीवन निर्वाह करेंगी।
हम चीन, जापान, कनाडा की प्राथमिक शिक्षा देख सकते हैं कि विदेशी छात्रों से वे भले ही मोटी रकम फीस के रूप में वसूलते हैं, परंतु अपने देश के बच्चों को एक समान निःशुल्क और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देते हैं। भारत में निजी शिक्षा-संस्थाएं न्यूनतम स्तर पर भी सामाजिक जिम्मेदारी नहीं निभाती हैं। वे डोनेशन कैपिटेशन फीस की कोई रसीद तक नहीं देतीं, जो करोड़ों में होती है। नतीजतन आयकर चोरी के जरिये सरकार को राजस्व की क्षति होती है। मात्र धनलोलुपता से भरे संस्थान त्याग और कल्याण का आदर्श नहीं सिखा सकते।
सरकार निजी स्कूलों में गरीबों, एससी, एसटी और कम आय वर्ग के बच्चों के लिए सीटें निर्धारित कराती हैं, लेकिन इन संस्थाओं में इन वर्गों के बच्चे जब दाखिला लेने जाते हैं, तो बताया जाता है कि सीटें भर चुकी हैं। जब वे इधर-इधर भाग जाते हैं, तब उन सीटों को अधिक धन लेकर भर दिया जाता है। जब तक भारतीय ज्ञान-व्यवस्था को मूल रूप से स्वस्थ, सार्वजनिक शिक्षा को सर्वसुलभ और भेदभाव रहित नहीं बनाया जाएगा, तब ज्ञान की न्यायसंगत, सकारात्मक स्पर्धा के अभाव में रचनात्मक संपदा का विस्फोट दबा ही रह जाएगा।
विभिन्न राज्यों में सरकारों ने आवास विकास योजना के तहत हजारों भवन बनाए, लेकिन इन कॉलोनियों में घरेलू सहायकों/सहायिकाओं के बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल नहीं खोले गए। निजी स्कूलों की फीस दे पाना इनके सामर्थ्य से परे है। ऐसे हजारों बच्चे निरक्षर रहेंगे, तो यह विकसित भारत के लक्ष्य के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
-लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।