रणनीतिक नेपाल नीति की जरूरत

रिशिका चौहान Updated Thu, 22 Jun 2017 03:35 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री शेर बहादुर दोएबा के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती है। दोनों प्रधानमंत्रियों को भारत-नेपाल संबंध की गति को बनाए रखना होगा, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने पुनर्जीवित किया था और अपने पूर्ववर्ती खड्ग प्रसाद शर्मा ओली के समय में बढ़ी कटुता को कम किया था। हालांकि ओली के कार्यकाल में भारत-नेपाल संबंधों में कटुता के कई कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन ओली का एक प्रमुख आरोप था कि भारत ने नेपाल के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी की शुरुआत की। 
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हालांकि कई लोगों का मानना था कि नाकेबंदी की शुरुआत मधेसी समूहों ने की थी, जबकि कुछ अन्य लोगों का मानना था कि नेपाल के अनौपचारिक नाकेबंदी में भारत की भी भूमिका थी। हालांकि भारत ने इसमें अपनी भागीदारी से इन्कार किया, लेकिन ऐसे आरोप आश्चर्यजनक नहीं थे, क्योंकि मोदी मधेसियों की चिंता के प्रति सहानुभूति रखते थे और लगातार नेपाली सरकार को उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए कह रहे हैं। इसके अलावा यह भी लग रहा था कि भारत के समर्थन के बिना इतने लंबे समय तक और इतने परिमाण में परिवहन व्यवधान संभव नहीं है। 
उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों से नेपाली मधेसी की जातीय और सांस्कृतिक निकटता को देखते हुए नई दिल्ली की भागीदारी न तो अप्रत्याशित थी और न ही आर्थिक नीति का उपयोग गलत था। भारत ने पहले भी अपने हितों की रक्षा और प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर समर्थन के लिए दूसरे देशों में प्रतिबंध, आर्थिक नाकेबंदी और वित्तीय प्रतिबंधों का सहारा लिया है। लेकिन पश्चिम की तुलना में भारत ने अपने आर्थिक प्रतिबंधों के बारे में बहुत कम बोला है। भारत उसे तभी स्वीकार करता है, जब अंतरराष्ट्रीय आलोचना का डर कम होता है और घरेलू तुष्टीकरण की संभावना ज्यादा होती है। इस संबंध में नेपाल, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान के मामले को देखा जा सकता है। 
नेपाल के मामले में भारत ने औपचारिक रूप से इसे स्वीकार किए बिना मधेसियों का समर्थन किया। नेपाल में आवश्यक आपूर्ति की कमी के कारण आर्थिक नाकेबंदी को स्वीकार करने पर विदेशों में भारत की छवि धूमिल होती, खासकर तब, जब  नेपाली लोगों के साथ भारत के खास संबंध हैं। इसी बीच नेपाल ने अक्तूबर, 2015 में संयुक्त राष्ट्र में भारत के 'व्यापार नाकाबंदी' का मुद्दा उठाया। इस समय अंतरराष्ट्रीय निंदा का डर भारत में बड़े पैमाने पर उभर रहा था, विडंबना यह है कि कूटनीति में अक्सर भारत नैतिक स्वर में इसका उपयोग करता है। इस घटना में नाकाबंदी की शुरुआत या उसे समर्थन देने की बात स्वीकार करना भारत के लिए असंभव होता। 

हालांकि ऐसे भी मामले हैं, जब भारत ने न केवल आर्थिक प्रतिबंध लगाने की न केवल घोषणा की, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ऐसी ही कार्रवाई की वकालत की। भारत सरकार ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 1946 से 1993 तक आर्थिक दबाव का इस्तेमाल किया, जब उसने पाया कि दक्षिण अफ्रीकी सरकार की कार्रवाई भेदभावपूर्ण और वहां रह रहे भारतीयों के के हित में नहीं है। आजादी से पूर्व शुरू किए गए इस प्रतिबंध का इस्तेमाल पूरे उत्साह के साथ आजादी के बाद भी किया गया।

दक्षिण अफ्रीका स्थित भारतीय उच्चायुक्त का वेबसाइट कहता है, 1946 में रंगभेदी सरकार के खिलाफ व्यापारिक संबंध खत्म करने वाला भारत पहला देश था और बाद में दक्षिण अफ्रीका पर उसने पूरा प्रतिबंध लगा दिया। आजादी से कुछ समय पहले वायसराय लार्ड वेवेल ने घरेलू दबाव का जिक्र करते हुए लिखा है, 'मुझे नहीं लगता कि हम जो भी कर रहे हैं, वह प्रभावी होगा, लेकिन भारतीय जनता की राय उन्हें सबक सिखाने की है।'

दिसंबर, 2001 में भारत ने पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाया, जिसका आर्थिक प्रभाव पड़ता। तब तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने स्पष्ट रूप से प्रतिबंध की घोषणा करते हुए तर्क दिया कि भारत सरकार के पास ऐसा कदम उठाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। निश्चित रूप से घरेलू दबाव उनके मन में नहीं था।भारतीय  संसद पर आत्मघाती हमले के बाद भारत ने आतंकवादियों के पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए मोहम्मद और लश्करे तैयबा से संबंधों का पता लगाया था। उन दोनों संगठनों का मानना था कि वे पाकिस्तान से बाहर काम करते हैं। तत्कालीन विदेश मंत्री का बयान न केवल पाकिस्तान को अपने संकल्प से अवगत कराना था, बल्कि देश के लोगों को भी। 

हालांकि कई पश्चिमी देशों (यहां तक कि ब्राजील एवं ईरान जैसी उभरती हुई शक्तियां भी) के नेताओं ने आर्थिक प्रतिबंधों के प्रति अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया है, लेकिन भारतीय नेता अक्सर इस विषय से कतराते हैं। फिर भी विदेश नीति से संबंधित प्रतिष्ठान में सामान्य जागरूकता दिखती है कि भारत ने इन नीतिगत उपायों का इस्तेमाल किया है, जो अब भी नीतिगत लक्ष्यों को आगे ब़ढ़ाने के लिए उपलब्ध है।

हालांकि आर्थिक प्रतिबंधों के बारे में भारतीय नीति प्रतिष्ठानों के संदर्भ और स्वीकृति असामान्य और दुर्लभ रहे हैं। वर्ष 2012 में तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने एक साक्षात्कार में वियतनाम के खिलाफ चीन के आर्थिक प्रतिबंध पर संकेत करते हुए कहा था कि क्या हम सभी अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल नहीं करते?

भारतीय अधिकारी और नेता अक्सर इस विषय पर तभी चर्चा करते हैं, जब पश्चिमी देशों द्वारा आर्थिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अकेले और ब्रिक्स के सदस्य होने के नाते रूस एवं ईरान पर एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध के खिलाफ कठोर रुख अपनाया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का समर्थन करते हुए भारत ने जोर देकर कहा है कि एकपक्षीय प्रतिबंध वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है। पश्चिम के आर्थिक प्रतिबंधों के स्पष्ट विरोध के बावजूद अतीत एवं हाल में भारत की कुछ कार्रवाइयां आर्थिक दबावों के सामान्य वर्ग में आती हैं। 

आर्थिक दबावों का इस्तेमाल करते समय यह जरूरी है कि बारत रणनीतिक रूप से सोचे और तीन बातों को ध्यान में रखे। पहला, भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आर्थिक दबावों को लागू करते समय अनुषांगिक नुकसान (कोलेटरल डैमेज) कम हो। दूसरा, आर्थिक दबावों के प्रभावी उपयोग के लिए भारत को लक्षित देश के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिलता को भी ध्यान में रखना चाहिए।

ईरान पर प्रतिबंध लगाते हुए अमेरिका ने इस चेतावनी को समझ लिया और एक जटिल प्रतिबंध व्यवस्था तैयार की, जिसमें ईरान पर प्राथमिक प्रतिबंध लगाया गया और उसका साथ देने वाले देशों एवं नॉन-स्टेट एक्टर पर द्वितीयक प्रतिबंध लगाया गया। इसी तरह भारत-नेपाल मामले में नई दिल्ली द्वारा नाकाबंदी किए जाने के मामले में नेपाल द्वारा चीन से समर्थन मांगना निराधार नहीं था। तीसरा और अंतिम, भारत को इसकी लागत पर विचार करना चाहिए।

मौद्रिक लागत से अलग आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले देश की छवि का भी नुकसान होता है, जैसा कि भारत-नेपाल मामले में हुआ। नेपाल की नाकाबंदी शुरू होने के बाद ओली ने भारत विरोधी बयानबाजी को भड़काया, जिससे भारतीय अधिकारी आशंकित हो गए। इस तरह प्रतिष्ठा के नुकसान की भरपाई सार्वजनिक कूटनीति के जरिये तुरंत नहीं हो सकती। 
 
हालांकि देउबा का पिछला कार्यकाल भारत-नेपाल संबंधों के लिए काफी उत्पादक रहा है, लेकिन नई दिल्ली को अपने भावी नेपाल नीति को विवेकपूर्ण ढंग से तैयार करना होगा। इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत को पड़ोसी देशों पर अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए रणनीतिक ढंग से सोचना चाहिए। 
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