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बेवजह है जीडीपी गणना पर संदेह

Wed, 05 Dec 2018 06:16 PM IST
जे. डी. अग्रवाल
जे. डी. अग्रवाल Updated Wed, 05 Dec 2018 06:16 PM IST
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Needless to doubt on GDP calculations
आर्थिक गिरावट

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की नई गणना ने यूपीए शासन के दौरान खराब प्रदर्शन को प्रतिबिंबित किया है, जिसमें अनुमान व्यक्त किया गया है कि पिछले चार वर्षों के दौरान जीडीपी की वृद्धि दर की तुलना में यूपीए के समय दर कम थी। इस गणना ने बहुत से विवादों को जन्म दिया है। जीडीपी शृंखला के संशोधन में आधार वर्ष को बदलकर 2004-05 से 2011-12 कर दिया गया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानदंडों के अनुरूप गणना पद्धति को भी अद्यतन किया गया है।


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नई शृंखला को पुरानी शृंखला से बेहतर माना जा रहा है, क्योंकि इसमें डेटा बिंदुओं का एक व्यापक सेट शामिल है। पिछले हफ्ते जारी किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि 2006-07 और 2011-12 के बीच औसत आर्थिक वृद्धि दर आठ फीसदी से घटकर नई शृंखला में 6.7 फीसदी हो गई। इसमें यह भी अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2012-13 और 2017-18 के बीच औसत आर्थिक विकास दर 6.9 फीसदी रही। पुरानी शृंखला के अनुसार वर्ष 2010-11 में 10.2 फीसदी की उच्चतम विकास दर के नई शृंखला में 8.5 फीसदी होने का अनुमान है। साफ है कि यूपीए अपने शासन काल के सकल घरेलू उत्पाद की गणना के निचले अनुमानों से खुश नहीं है और नई शृंखला और नए आधार वर्ष के साथ जीडीपी की पिछली शृंखला का अनुमान लगाने के कारण केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की पवित्रता पर सवाल उठाया है।

नई पद्धति निगमों के कॉरपोरेट वित्त डेटाबेस (एमसीए 21) मंत्रालय के साथ-साथ उत्पादन शिफ्ट (इसे उत्पादन कैलेंडर से परिभाषित किया जाता है) विधि के बहुत सारे डेटा का उपयोग करती है। एमसीए डेटा मात्र 2006-07 से उपलब्ध है और यह तुलनात्मक आधार पर नहीं है तथा 2010-11 के बाद ही यह स्थिर हो पाया। वर्ष 2004-05 से लेकर 2010-11 की गणना के लिए एक ही पद्धति का उपयोग किया गया है, क्योंकि वही नया आधार वर्ष है। निर्माण क्षेत्र में अनुमानों को तैयार करने के लिए जोड़ विधि (स्प्लाइसिंग मेथड) का पूरी तरह से उपयोग किया गया है और कृषि व उससे संबद्ध क्षेत्रों, गैस, व्यापार, मरम्मत, होटल और रेस्तरां, रियल एस्टेट, निवास के स्वामित्व और पेशेवर सेवाओं, लोक प्रशासन तथा रक्षा व अन्य सेवा के लिए आंशिक रूप से इसका उपयोग किया गया है।
 
आंकड़ों में एक अंतर यह है कि दूरसंचार क्षेत्र में ग्राहकों की संख्या लेने के बजाय इसमें खपत मिनटों की संख्या को लिया गया है। वर्ष 2010-11 से पहले के आंकड़ों को तुलनात्मक नहीं माना जाता है, और इसलिए यह माना जाता है कि इनका सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, यही कारण विरोधी दल दे रहे हैं। इसके अलावा विरोधी दल पिछली शृंखला का अनुमान लगाने और खासकर चुनाव सामने देख इस हफ्ते इसे जारी करने को लेकर केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) और नीति आयोग की गैर राजनीतिक प्रकृति पर सवाल उठाते हैं। सरकार का कहना है कि सीएसओ एक स्वतंत्र स्वायत्त निकाय है, जिस पर जीडीपी की गणना के लिए पूरी तरह से भरोसा किया जा सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानकों के साथ अब और सटीक है। विपक्षी दल राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) के मसौदा पत्र के आलोक में भी इन अनुमानों पर सवाल उठाते हैं, जिसे इसी वर्ष अगस्त में जारी किया गया था, जिसने ताजा पिछली शृंखला अनुमानों द्वारा पेश किए आंकड़ों की तुलना में एक अलग ही तस्वीर पेश की थी। तथ्य यह है कि ये आंकड़े एक विश्वसनीय और स्थायी एजेंसी से आए हैं, जो अनुमानों की पवित्रता पर सवालों के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती। सीएसओ और एनएससी की पद्धति में अंतर अलग-अलग विकास अनुमान दर्शाता है, जिसने सीएसओ के विकास अनुमानों को और अधिक विवादास्पद बना दिया है। हालांकि, सीएसओ सांख्यिकीय पद्धति पारदर्शी है और जिसे सत्यापित किया जा सकता है, जो नवीनतम अनुमानों पर संदेह करने के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ती है।

मौजूदा पद्धति में दूसरी तिमाही की विकास दर 7.1 फीसदी और पहली तिमाही की विकास दर 8.2 फीसदी का अनुमान लगाया गया है, जो स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि सीएसओ ने सरकार को खुश करने के लिए आंकड़ों में हेरफेर नहीं किया है। दूसरी तिमाही में कम विकास दर मौजूदा मोदी सरकार पर यह साबित करने के लिए भारी दबाव डाल रही है कि उसकी नीतियां विकासोन्मुख हैं और पिछले चार वर्षों के कामकाज का फायदा उठा रही है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में भारत को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने चीन की 6.5 फीसदी की विकास दर से ज्यादा तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बताया है। मौजूदा सरकार मूडी की निवेशक सेवा (मूडीज) द्वारा भारत सरकार की स्थानीय व विदेशी मुद्रा जारीकर्ता रेटिंग को भी बीएए 3 से बीएए 2 किए जाने और रेटिंग को सकारात्मक से स्थिर किए जाने का श्रेय ले सकती है। तेरह वर्षों के बाद भारत की रेटिंग में सुधार हुआ है।

विश्व बैंक की व्यापार सुगमता रैंकिंग में भी भारत 23 अंकों की छलांग लगाकर 77वें पायदान पर पहुंचा है। राजकोषीय घाटे को 3.3 फीसदी पर बनाए रखने की क्षमता के साथ नोटबंदी और जीएसटी के सफल क्रियान्वयन ने बेहतर आर्थिक प्रदर्शन के मौजूदा सरकार के दावों को संभवतः मजबूत किया है, जिससे यह मानने के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है कि मौजूदा सरकार के निर्देश पर विकास दर के आंकड़ों में हेरफेर किया गया है। इन घटनाओं से आर्थिक प्रदर्शन के संदर्भ में अपनी उपलब्धियों को उजागर करने के लिए सरकार के लगातार प्रयासों को देखा जा सकता है। यह देखते हुए कि 2019 लोकसभा चुनाव का वर्ष है और अभी पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है, सीएसओ द्वारा पिछली शृंखला के जीडीपी गणना के अनुमान संभवतः मौजूदा सरकार को लाभ पहुंचाएंगे, जो स्पष्ट रूप से मौजूदा सरकार की आर्थिक नीति को यूपीए शासन की तुलना में बढ़त प्रदान करता है। 

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