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गांधी को 'सरल' बनाने की जरूरत

Tue, 29 Jan 2019 06:26 PM IST
Raman Singh तुषार गांधी
तुषार गांधी Published by: Raman Singh Updated Tue, 29 Jan 2019 06:26 PM IST
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Need to make Gandhi 'simple'
तुषार गांधी

बापू की आत्मा भारत में कहीं है, तो छोटे कस्बों, पिछड़े गांवों के गरीबों की झोपड़ियों में है, क्योंकि आजादी के 72 वर्षों बाद भी इन लोगों के हालात या जीवन में खास फर्क नहीं आया। बापू को उनकी मौत के बाद एक प्रतीक में ढाल दिया गया और उनके विचारों को देश की प्रगति से जोड़ा नहीं गया। उन्होंने अंत्योदय की बात कही थी यानी समाज के सबसे निचले तबके या पंक्ति के आखिरी व्यक्ति का उद्धार अथवा विकास करते हुए हमें आगे बढ़ना है।


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मगर ऊपर से विकास की शुरुआत के कारण उच्च वर्ग को फायदा होता गया और जो नीचे थे वे अधिक वंचित होते गए। ऑक्सफेम की ताजा रिपोर्ट में फिर पुष्टि हुई है कि जिनके पास है, उनके पास बहुत ज्यादा है। यह आजकल में नहीं हुआ। स्वतंत्रता के साथ ही इसकी शुरुआत हुई थी। जब बापू के विचारों की जगह उनकी प्रतिमाएं लोगों को ज्यादा सुविधाजनक लगीं। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि बापू के विचारों को अपनाने पर उनके नतीजे पाने में वक्त लगता है। जबकि आज फैशन दो मिनट के नूडल का है।

बापू से जुड़े हर कार्यक्रम में खूब दिखावा-तमाशा होता है। जो सादगी उनके जीवन का सिद्धांत थी, वह दिखाई नहीं देती। राजनीति में आज बापू के प्रतीक को अपनी ओर खींचने की लड़ाई भी हो रही है। मगर कोई उनके विचार नहीं अपनाना चाहता। बात सिर्फ इतनी है कि कैसे उन्हें अपने हक में निचोड़ लें। जबकि बापू कभी राजनीति में नहीं थे। देश की आजादी के लिए उन्होंने ‘रणनीति’ अपनाई, राजनीति नहीं की।

सच है कि लोकतंत्र में ‘आदर्शलोक’ नहीं हो सकता। वहां ‘व्यावहारिक राजनीति’ का महत्व है। बापू जानते थे कि आजादी के बाद राजनीतिक लोकतंत्र आएगा, तो तत्कालीन कांग्रेस अलग-अलग विचारधाराओं और अंतर्विरोधों वाले नेताओं का गठबंधन नहीं टिक पाएगा। तब उन्होंने कहा कि तुम सब अलग होकर अपनी-अपनी विचारधाराओं में वापस लौट जाओ। जिन्हें राजनीति करनी है, राजनीति करेंगे और जिन्हें जनसेवा करनी है, जनसेवा करेंगे। मगर कांग्रेस पार्टी बापू के कहने पर भी भंग नहीं की गई। बापू के साथ यह अन्याय हुआ कि उनके शब्दों के पीछे छिपी भावनाओं को नहीं समझा गया।

महात्मा गांधी को इस कदर प्रतीक में ढाल दिया है कि आज करंसी नोट को भी मजाक में ‘बापू’ कहा जाने लगा है। मैं हाल में राजस्थान के एक गांव में गया। वहां बच्चों से मेरा परिचय कराया गया। उनसे पूछा गया कि जानते हो न बापू को, तो उन्होंने कहा कि हां वही नोट वाले गांधी! मैंने देखा है कि भ्रष्टाचार में भी गांधी जी पारिभाषिक शब्द बन गए थे। नोटों पर बापू को लाना जरूरी नहीं था, लेकिन दूसरी बात यह भी है कि बापू की ही एक ऐसी छवि है, जिसे जंग नहीं लग रहा। करंसी को प्रमाणित करने के लिए जैसे इंग्लैंड में उनकी रानी या राजा की तस्वीरें छपती हैं, वैसे ही यह रुपये की जरूरत है कि उसको प्रमाणित करने के लिए जिसे जंग नहीं लगता, उसकी तस्वीर वहां छपे। तो यह जरूरत करंसी की है, बापू की नहीं।

बापू की सबसे बड़ी बदनसीबी यह है कि उन्हें बहुत ज्यादा बौद्धिक विमर्श का विषय बना दिया गया। वह ऐसे लोगों की गिरफ्त में रह गए, जिन्हें गांधीवादी कहा जाता है। बापू बुद्धिजीवियों का विषय हो गए और बड़ी जटिल भाषा में उन्हें परोसा जाता है। बुद्धिजीवियों की खामी भी यह है कि उन्होंने बापू को बौद्धिकता में ही समझा,  सरलता में नहीं। जिनका जीवन सादगी भरा था, उनकी सादगी को भूल गए और ‘जटिल विचारधारा’ बना दिया। मैं मानता हूं कि बापू पर अकादमिक अध्ययन होने चाहिए, पर उनके नतीजे आम आदमी को समझ में आने वाले हों, तो उनकी सार्थकता है।

-लेखक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रपौत्र हैं।

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