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गोपालन को सस्ता बनाने की जरूरत
Mon, 28 Jan 2019 06:44 PM IST
Raman Singh
महक सिंह
महक सिंह
Published by: Raman Singh
Updated Mon, 28 Jan 2019 06:44 PM IST
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महक सिंह
भारत में पिछले 10 हजार वर्षों से कृषि और पशुपालन अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग रहे हैं। देश में पशुओं की संख्या दुनिया में सर्वाधिक है और एक-तिहाई आबादी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से पशुपालन पर निर्भर है। पर चारे की कमी और सरकारी नीतियों के चलते पशुओं की संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है। दूध से लेकर खाद और खेती के लिए बैल की जरूरत के कारण हमारे पूर्वजों ने गाय को मां का दर्जा दिया। पर खेती के मशीनीकरण से बैलों की जरूरत नहीं रही। भैंस पालन लाभ का सौदा हो गया, क्योंकि भैंसें गाय के मुकाबले अधिक दूध देती हैं। विदेशी संकर गाएं दूध अधिक देती हैं, पर दूध में वसा कम होने के कारण वह भी कम लाभप्रद है। इसलिए गोपालन किसान के लिए घाटे का सौदा हो गया।
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संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 48 के तहत गोवध पर प्रतिबंध है, और पश्चिम बंगाल, केरल व अन्य छोटे राज्यों के अलावा यह सभी राज्यों में लागू है। पर गोहत्या पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली है और इसका आर्थिक बोझ किसान पर डाला जा रहा है, जो अनुचित है, क्योंकि कोई किसान अपने बच्चों को भूखा रखकर बछड़े का भरण-पोषण नहीं करेगा। पशुओं की खरीद-बिक्री से संबंधित नए कानून के बाद से गांवों में लावारिस गायों व बछड़ों के झुंड घूम रहे हैं और किसानों की खड़ी फसल बर्बाद कर रहे हैं। पहले जंगली जानवरों से खेतों को बचाने की चुनौती थी, पर अब आवारा घरेलू पशुओं ने किसानों का जीना मुश्किल कर दिया है। किसान पशु बेचते हैं, तो उसकी जांच की जाती है। पर पशु न बेचने पर वे भूखे मरेंगे। किसान फसलों को बचाने के लिए बाड़ लगाते हैं और रात में खेतों की रखवाली करते हैं। वे लावारिस पशुओं को स्कूलों, अस्पताल, तहसील, पंचायत घर व जन प्रतिनिधियों के आवासों में बंद कर रहे हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई ठप है। इस पर कई किसानों पर मुकदमे दर्ज किए गए हैं। बेबस-बेजुबान गाएं हैं, लाचार किसान हैं, चरागाह बचे नहीं, किसान करें, तो क्या करें? पिछले दिनों कई संगठनों ने कर्ज माफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के मामले में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू करने के साथ-साथ आवारा पशुओं की रोकथाम की मांग प्रमुखता से उठाई थी। अनुमान के अनुसार, देश में लावारिस गोवंश की संख्या 10 लाख है। एक रिपोर्ट के अनुसार, योगी सरकार के आने के बाद लखनऊ शहर में गायों के झुंड घूम रहे हैं और अब तक 554 गायों की सड़क दुर्घटना में मौत हो चुकी है।
गोरक्षा के नाम पर चले अभियान से गाय का व्यापार प्रभावित हुआ है। पंजाब में 2014 में पशु व्यापार 2,500 करोड़ रुपये का था, जो घटकर मात्र 150-200 करोड़ रुपये का रह गया है। राजस्थान में पशु मेले में खरीदार व्यापारियों की संख्या कम हो गई है। राजस्थान की नागोरी नस्ल के खूबसूरत बैलों की बिक्री नगण्य हो गई है। सरकार ने गोहत्या पर तो पाबंदी लगा दी, पर गायों को सुरक्षित रखने के पुख्ता इंतजाम नहीं किए। हिमाचल प्रदेश में गौसंवर्धन बोर्ड का बजट अब 50 लाख से घटकर 30 लाख रुपये रह गया है।
सरकार ने देसी गायों की प्रजाति को बचाने के लिए गोकुल ग्राम और गोकुल मिशन की शुरुआत की है। पर इन उपायों से गौसंरक्षण संभव नहीं। इसका तरीका तो यही है कि गाय पालन सस्ता किया जाए, गाय के दूध, गौमूत्र एवं गोबर की मांग बढ़ाई जाए तथा इसका प्रचार किया जाए कि गाय का दूध भैंस के दूध से अधिक स्वास्थ्यवर्धक होता है। इससे गाय के दूध की कीमत बढ़ेगी और गाय पालना भी आसान हो जाएगा। सरकार को आवारा छोड़े गए पशुओं के संरक्षण की पूरी जिम्मेदारी भी उठानी होगी। इसके बगैर गोवंश को नष्ट होने से नहीं बचाया जा सकेगा।
-कृषि विशेषज्ञ एवं पूर्व विधायक।