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फिर से पीली क्रांति की जरूरत
जयंतीलाल भंडारी
Updated Thu, 02 Jul 2015 12:02 PM IST
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इस समय देश में तिलहन उत्पादन और खाद्य तेल उद्योग को सबसे बुरे दौर का सामना करना पड़ रहा है। तिलहन उत्पादन में भारी कमी और खाद्य तेल आयात में भारी बढ़ोतरी चिंता का कारण बन गई है। देखते-देखते भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक देश बन गया है। हाल ही में सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार तेल विपणन वर्ष (नवंबर से अक्तूबर) 2013-14 के दौरान देश में 116 लाख टन खाद्य तेल का आयात हुआ है।
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एक ओर जहां विगत मार्च में कई बार बारिश और ओले गिरने से खासकर मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख तिलहन उत्पादक राज्यों में सोयाबीन, सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी आदि फसलों को नुकसान पहुंचा है, वहीं इस वर्ष इंडोनेशिया और मलयेशिया से आयात में करीब 19 लाख टन की बढ़ोतरी होने की संभावना है। देश में सोयाबीन के दाम ऊंचे होने और तेल के दाम कम मिलने के कारण पेराई और खाद्य तेल की उपलब्धता में कमी आई है, जिससे सोयाबीन और सूरजमुखी तेल का आयात बढ़ा है।
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देश में खाद्य तेल आयात बढ़ने के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। एक, देश में तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहन न मिलने से खाद्य तेल उत्पादन में कमी हो रही है। दो, आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते के कारण मलयेशिया और इंडोनेशिया से बहुत कम कीमत पर भारतीय बाजार में पामोलिव एवं सोयाबीन तेल का आयात हो रहा है। इन देशों ने अपने यहां स्टॉक कम करने के लिए खाद्य तेल के निर्यात पर शुल्क घटाकर शून्य कर दिया है।
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तीन, दुनिया में तिलहन और खाद्य तेल के उत्पादन में भारी वृद्धि के कारण खाद्य तेल की कीमतों में कमी आ रही है।हालांकि विश्व बाजार में खाद्य तेल की कीमत काफी कम है, इसलिए उसके आयात में बड़ा आर्थिक बोझ भी नहीं है, पर यह स्थिति लंबे समय तक जारी नहीं रहेगी। ऐसे में जरूरी है कि हम फिर देश में 1986 में गठित तकनीकी मिशन की बदौलत अस्तित्व में आई पीली क्रांति की ओर ध्यान दें।
उस समय खाद्य तेल आयात चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया था, तब तिलहन पर तकनीकी मिशन के अंतर्गत सिंचित क्षेत्रों में तिलहनों की खेती को प्राथमिकता दी गई, कई उन्नत, संकर तिलहन प्रजातियों का विकास किया गया। परिणामस्वरूप तिलहन उत्पादन में वृद्धि हुई। पर बाद के वर्षों में जहां पीली क्रांति पर सरकार का ध्यान कम होता गया, वहीं वैश्विक खाद्य तेल उत्पादकों से भारत के तेल उत्पादक मूल्यों के मामले में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए।
नतीजतन खाद्य तेल आयात फिर बढ़ने लगा। ऐसे में अब फिर तिलहन की उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास होने चाहिए। तकनीकी क्षेत्र में उन्नत खेतों की संख्या बढ़ाकर और तिलहन उत्पादन के सिंचित क्षेत्र में बढ़ोतरी करके भी तिलहन उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।पिछले कुछ वर्षों में तिलहन की कई ऐसी नई उन्नत बीजों की किस्में आई हैं, जिनसे इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
तिलहन से तेल निकालने की कुल क्षमता का अधिकतम इस्तेमाल करने की भी रणनीति बनाई जानी चाहिए। उम्मीद करनी चाहिए कि मोदी सरकार पीली क्रांति के तकनीकी मिशन को नया रूप देगी। तभी देश तिलहन उत्पादन में वृद्धि कर सकेगा, साथ ही, आयात पर अपनी निर्भरता से बच सकेगा।