जमीन के सही इस्तेमाल की जरूरत: 'व्यर्थ पड़ी संपत्ति आत्मनिर्भर भारत में योगदान नहीं कर सकती'

Surya Tiwari सूर्या तिवारी
Updated Sat, 13 Feb 2021 08:29 AM IST
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (फाइल फोटो)
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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इस साल के बजट में स्वास्थ्य, अधोसंचरना और विनिर्माण क्षेत्रों पर खासा जोर दिया गया है, जिससे कोविड-19 से प्रभावित अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने में मदद मिलेगी। बजट में जमीन से जुड़े दो पहलुओं को भी समाविष्ट किया गया है। इनमें से पहला है- स्वामित्व योजना और दूसरा है- जमीन का मोनेटाइजेशन (मुद्रीकरण)। स्वामित्व योजना ग्रामीण क्षेत्र में संपत्ति मालिकों को भू-अधिकार से संबंधित प्रॉपर्टी कार्ड उपलब्ध कराने से संबंधित है। इस योजना के तहत 1,241 गांवों में 1.80 लाख प्रापर्टी कार्ड उपलब्ध कराए जा चुके हैं और इसका लक्ष्य सारे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसके दायरे में लाना है।
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जहां तक भू-मुद्रीकरण की बात है, तो सरकार के पास जो अधिशेष जमीन है, वह बाजार में बेची या रियायती दरों पर दी जाएगी या इसी तरह के माध्यम से काम में लाई जाएगी।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण में स्पष्ट लिखा है, 'व्यर्थ पड़ी संपत्ति आत्मनिर्भर भारत में योगदान नहीं कर सकती। गैर-मुख्य संपत्ति में सरकारी मंत्रालयों/विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की अधिशेष भूमि शामिल है। भूमि का मुद्रीकरण या तो प्रत्यक्ष बिक्री या रियायत या इसी तरह के माध्यम से हो सकता है। इसके लिए विशेष क्षमता की जरूरत है और मैं इसके लिए एक कंपनी के रूप में स्पशेल परपज व्हीकल (एसपीवी) प्रस्तावित करती हूं, ताकि इस काम को आगे बढ़ाया जा सके।'

'स्वामित्व' एक सराहनीय योजना है, क्योंकि इसके जरिये ग्रामीण क्षेत्र में निजी जमीन के स्वामित्व के जटिल मुद्दे को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है और इससे न्यायिक व्यवस्था में बाधा पहुंचाने वाले भारी संख्या के मुकदमों से निजात पाने में मदद मिलेगी। अधिशेष और व्यर्थ पड़ी जमीन के मुद्रीकरण के कदम का तभी सही लाभ मिल पाएगा, जब एसपीवी का निष्पक्षता के साथ इस्तेमाल किया जाए।

भूमि अधिग्रहण की असंगतियां और समाज तथा पर्यावरण पर इसके प्रतिकूल प्रभाव अच्छे से दर्ज किए गए हैं। अतीत में देखा गया है कि बड़े पैमाने पर कृषि और बिना कृषि योग्य जमीन ढांचागत तथा औद्योगिक विकास के लिए अधिगृहीत की गईं, पर कई बार इनका उपयोग संबंधित उद्देश्यों के लिए नहीं किया गया। उत्पादन के लिए जमीन एक अहम कारक है और प्रकृति में इसकी कमी है। जमीन की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में गिरावट के साथ यह समय की जरूरत है कि आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसका कुशलतापूर्वक इस्तेमाल हो। अनेक अध्येताओं ने भी रेखांकित किया है कि सुधारों के बाद कैसे विनिर्माण क्षेत्र समुचित लाभ उठाने से चूक गया, क्योंकि विनिर्माण क्षेत्र को भूमि
के पूंजीकरण के जरिये प्रोत्साहित करने की कोशिश की गई। सरकार ने अतीत में देश में औद्योगिक गतिविधियों के विकास के लिए बड़े पैमाने पर जमीन हस्तांतरित की। इसलिए जब वित्तमंत्री ने सरकारी जमीन के मुद्रीकरण की बात की, तो सवाल उठता है कि उद्योगों के पास जो निजी जमीन है, उसका मुद्रीकरण क्यों नहीं।

सरकार द्वारा भौगोलिक सूचना तंत्र से लैस सरकारी जमीन सूचना तंत्र के जरिये डाटाबेस का निर्माण स्वागयोग्य कदम है, पर इसमें राज्य सरकारों और कॉर्पोरेट की जमीन को भी जोड़ा जाना चाहिए। ऐसे भूमि बैंक को गुणवत्ता, उत्पादकता, पहुंच, अनुत्पादकता और दुर्गम पहुंच इत्यादि के आधार पर भी जमीन को वर्गीकृत करना चाहिए। ध्यान रहे, निजी मालिकों के पास भी जमीन व्यर्थ पड़ी हैं। उदाहरण के लिए, विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन का हस्तांतरण किया गया, पर जमीन का बड़ा हिस्सा अनुपयोगी रह गया। 2013 में अस्तित्व में आए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास पुर्स्थापन में उचित मुआवजा अधिकार और पारदर्शिता अधिनियम के कारण अधिग्रहण में अड़चन आई
है। महत्वपूर्ण यह है कि जमीन के उपयोग में जवाबदेही सुनिश्चित की जाए और सारी चालू परियोजनाएं, फिर वह सरकार की हों या निजी क्षेत्र की, उनके पास जो जमीन हैं, उनका पूर्ण उपयोग करें।

- लेखिका आईएसआईडी में सहायक प्राध्यापक हैं।

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