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खतरा तो उठाया है नवाज शरीफ ने

Sun, 01 Dec 2013 07:46 PM IST
मारूफ रजा
मारूफ रजा Updated Sun, 01 Dec 2013 07:46 PM IST
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Nawaz Sharif raised the risk

पाकिस्तान के नए सैन्य प्रमुख की नियुक्ति न केवल वहां, बल्कि भारत में भी सुर्खियों में है। इसकी वजह है कि रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय के कुछ भरोसेमंद साथियों की मदद से परमाणु हथियारों से लेकर अमेरिका, चीन और भारत के साथ संबंधों जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने का काम वहां सैन्य प्रमुख ही करते हैं।

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हालांकि नए सैन्य प्रमख के तौर पर जनरल राहील शरीफ की नियुक्ति ने बहुतों को अचरज में डाल दिया है। वरिष्ठता सूची में उनसे आगे कई और सेनाधिकारी तो थे ही, पद छोड़ रहे जनरल परवेज अशरफ कयानी ने भी उनके नाम की सिफारिश नहीं की थी। मानो यही काफी न हो, पिछले दिनों उन्होंने भारत को निशाना बनाने के बजाय पाकिस्तान की अंदरूनी चुनौतियों पर ध्यान देने की सलाह भी अपनी सेना को दे डाली थी।
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जबकि भारत से संभावित खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बाद ही पाक सेना को भारी-भरकम बजट मिलता है। हालांकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऑपरेशन पराक्रम के बाद भारतीय सेना के कोल्ड स्टार्ट सिद्धांत का जवाब ढूंढने में पाकिस्तान के नए सैन्य प्रमुख ने अपना काफी समय लगाया। मालूम रहे कि कोल्ड स्टार्ट की अवधारणा के तहत अचानक किसी मुश्किल स्थिति में पाकिस्तान के संभावित हमले से निपटने के लिए भारत की सेना को हरदम तैयार रखने की रणनीति तैयार की गई है।
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लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जनरल शरीफ को नया सेना प्रमुख बनाकर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने फिर एक बड़ा जुआ खेला है। दोनों का उपनाम 'शरीफ' होने के अलावा जनरल प्रधानमंत्री के नजदीकी भी माने जाते हैं। यही नहीं, पाक प्रधानमंत्री की तरह जनरल और उनके भाई, दोनों की जड़ें भी कश्मीर से जुड़ी हैं। गौरतलब है कि 1971 की लड़ाई में उनके बड़े भाई मारे गए थे, जिन्हें पाकिस्तान में नायक का दर्जा मिला है। इन हालात में यह उम्मीद बहुत स्वाभाविक है कि वह भारत-विरोधी होंगे।

दरअसल, नवाज शरीफ पहले भी दो बार सेना प्रमुख की नियुक्ति के मामले में इसी तरह के कदम उठा चुके हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में बतौर प्रधानमंत्री अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने जनरल अब्दुल वहीद कक्कर को सैन्य प्रमुख बनाया था। उसी दशक के अंत में अपने दूसरे कार्यकाल में नवाज शरीफ ने जनरल मुशर्रफ की नियुक्ति की। दोनों ही अवसरों पर वरिष्ठता को दरकिनार कर प्रधानमंत्री ने सेनाध्यक्ष के रूप में ऐसे व्यक्ति चुने थे, जो उनकी नजर में राजनीतिक रूप से कम खतरनाक थे।

उन दोनों ने ही नवाज शरीफ को सत्ता छोड़ने को मजबूर किया; कक्कर के समय नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री पद छोड़ने की वजह राजनीतिक थी, तो मुशर्रफ ने जिस तरह उनका तख्तापलट किया, वह जग जाहिर है। ऐसे में, सेना प्रमुख चुनने के मामले में नवाज शरीफ क्या तीसरी बार भाग्यशाली साबित होंगे?

यह वस्तुतः इस पर निर्भर करेगा कि नवाज शरीफ जनता की उम्मीदों और अपने चुनावी वायदों पर किस सीमा तक खरे उतर पाते हैं। यह तथ्य है कि अतीत में जब-जब पाक सेना ने तख्तापलट किया, उसे जनता का समर्थन मिला। 1958 में जब जनरल अयूब खान ने पहले पाकिस्तानी सरकार और फिर सिर्फ नाम के राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा को पदच्युत किया, तो उनके इस फैसले में अवाम उनके साथ थी, क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता (सात वर्षों में छह प्रधानमंत्री) से सभी त्रस्त थे।

तकरीबन एक दशक बाद अयूब खान को देश छोड़ना पड़ा। वजह बनी, कश्मीर को भारत से अलग करने में उनकी नाकामयाबी। इस बार वरिष्ठता के हिसाब से जनरल याह्या नए सैन्य प्रमुख बने। जुल्फिकार अली भुट्टो अपने भारत-विरोधी रुख के कारण काफी लोकप्रिय हुए, लेकिन गैर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकारों को बार-बार बर्खास्त कर जब वह पाकिस्तान को एक पार्टी वाले राज्य में तब्दील करने की दिशा में चल रहे थे, तब जनरल जिया ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर फांसी पर लटका दिया। गौरतलब है कि भुट्टो ने ही जनरल जिया पर भरोसा कर उन्हें सेना प्रमुख बनाया था।

बतौर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सामने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और देश के भीतर स्थायित्व और सुरक्षा का माहौल कायम करने की चुनौती मौजूद है। वहीं नए सैन्य प्रमुख के तौर पर जनरल शरीफ को एक ओर तो आंतरिक अशांति से, तो दूसरी ओर बाह्य खतरों से जूझना है। ध्यान रखना होगा कि उनसे कहीं ज्यादा योग्य और वरिष्ठ अधिकारियों पर तरजीह देते हुए उनकी नियुक्ति की गई है।

राहील शरीफ के साथ दिक्कत यह भी है कि उन्हें योग्य कमांडर के बजाय एक कागजी शेर ही माना जाता है। सेना में उन्हें अब तक महज प्रशिक्षण के कार्यों तक ही सीमित रखा गया है। उन्हें एलओसी पर भारत या तालिबान के खिलाफ सैन्य अभियानों का ज्यादा तजुर्बा नहीं है। संभव है कि नवाज शरीफ ऐसे उदारवादी जनरल की चाह रखते हों, जो सेना में नए रचनात्मक नजरिये का विकास कर सके।

दरअसल नवाज शरीफ विदेशी मामलों में सेना के प्रभावी दखल के पक्ष में नहीं हैं। वह भूले नहीं होंगे कि किस तरह मुशर्रफ ने सभी महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों से उन्हें दूर रखते हुए कारगिल युद्ध की शुरुआत कर दी थी। इसी वजह से उन्हें न केवल कूटनीतिक शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी, बल्कि पहले चीन और फिर अमेरिका की शरण में जाना पड़ा।


2014 में अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो सेनाओं की वापसी के बाद नवाज शरीफ जरूर चाहेंगे कि अफगानिस्तान के भविष्य पर होने वाली चर्चा में उन्हें भी शामिल किया जाए। लेकिन भारत के संभावित हमले की सूरत में सामरिक लाभ उठाने के लिए पाकिस्तानी सेना की सोच हमेशा से यही रही है कि अफगानिस्तान को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में रखा जाए। ऐसे में नवाज शरीफ के लिए जरूरी है कि उन्हें ऐसे जनरल का साथ मिले, जो ऐसी आक्रामक सोच से दूर हो।

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