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इंसान का स्वभाव कैसा हो: किसी को बुरा कहने में जल्दबाजी न करें, निराशा में आशा देखें
Mon, 23 Dec 2024 05:33 AM IST
शुभम कुमार
रामनारायण मिश्र
रामनारायण मिश्र
Published by: शुभम कुमार
Updated Mon, 23 Dec 2024 05:33 AM IST
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सार
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इंसान का स्वभाव कैसा हो
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अमर उजाला
विस्तार
दूसरों को भला-बुरा कहने में लोग जल्दबाजी करते हैं, विशेषकर बुरा कहने में। जब मैं बस्ती जिले का डिप्टी इंस्पेक्टर होकर गया, तब बहुत से लोगों ने मुझसे कहा कि सबसे तो आपकी बन जाएगी, पर एक सब डिप्टी इंस्पेक्टर से जिनका नाम मुंशी जगदीश प्रसाद था, नहीं बनेगी। वह बड़े टेढ़े आदमी हैं। मेरे बस्ती पहुंचने पर, जितने और सब डिप्टी इंस्पेक्टर थे, मिलने आए, पर मुंशी जगदीश प्रसाद दौरे पर ही रहे।बहुत दिनों बाद उनका दौरा समाप्त हुआ, तब वह मुझसे मिले। धीरे-धीरे मेरी जान पहचान उनसे बढ़ गई। काशी के त्रिलोचन मुहल्ले में उनका घर था। उनकी बुराई सुनते-सुनते मैं थक गया था। एक दिन मैंने उनसे कहा कि आइए, हम आप महीने में पंद्रह दिन एक साथ दौरा करें। हम आप अलग-अलग स्कूल देखेंगे, पर रहेंगे एक साथ। उन्होंने इसको स्वीकार किया। थोड़े ही दिनों में मुझ पर प्रकट हो गया कि वे बड़े ऊंचे दर्जे के आदमी हैं, परंतु रूखे हैं। केवल रुखाई के कारण, उनके उज्ज्वल गुणों को लोगों ने नहीं पहचाना।
वे बैलगाड़ी पर दौरा किया करते थे, समय बचाने के लिए शाम को भोजन के उपरांत बैलगाड़ी में सोए रहते थे, और सबेरा होते-होते दूसरे स्थान पर पहुंच जाते थे। नियम यह है कि सदर से पांच मील के अंदर भत्ता नहीं मिलता। पांच मील या इससे अधिक जाने पर मिलता है। वह अपने सिद्धांत पर अटल थे कि जिस दिन बस्ती से रवाना होते, रात को अपनी नींद खराब करके देख लेते कि बारह बजे से पहले पांच मील पूरे हो गए या नहीं! यदि पांच मील में थोड़ा भी कम होता, तो वह उस दिन का भत्ता नहीं लेते थे।
स्कूलों के डिप्टी लोग उन दिनों मुदर्रिसों से आटा-दाल तक लिया करते थे। मुंशी जगदीश प्रसाद तो गांव के जमींदारों और रईसों का भी निमंत्रण स्वीकार नहीं करते थे। किसी से बर्तन भी नहीं मांगते थे। लोग उन्हें बुरा कहते थे, पर वे बहुत अच्छे निकले। इस प्रकार का अनुभव मुझे कई बार हुआ है, जिनको लोगों ने बुरा बतलाया, उनको मैंने अच्छा पाया। कहा जाता है कि संसार में कोई भी फूल पत्ती ऐसी नहीं है, जिसमें औषध का गुण न हो और कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जिसकी प्रकृति में थोड़े-बहुत देवताओं के भाव न हों।
इसलिए ‘किसी को बुरा कहने में जल्दी न करो’ यह सबक मुझे अपने ही जीवन में कई बार मिला है। आदमी को पहचानना बहुत कठिन काम है। किसी आदमी के पूरे गुण उसके जीवन के केवल एक अंग को लेकर नहीं जाने जा सकते। मनुष्य की पूरी परीक्षा उसके घरेलू जीवन और सार्वजनिक जीवन दोनों को दृष्टिगोचर रखने से हो सकती है। एक दिन भिनगा नरेश राजा उदयप्रतापजी ने मुझसे कहा था कि जब तक पूरी तरह से जांच न लो, किसी का विश्वास न करो। मैंने कहा, मेरा सिद्धांत इसका उल्टा है, अर्थात जब तक इसका प्रमाण न मिल जाए कि अमुक आदमी चोर है, उस पर पूरा विश्वास करो। दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर ने ठीक कहा है कि जो अविश्वास से जीवन आरंभ करता है, वह अपना और दूसरे का जीवन दुखमय बना देता है और जो जगत में विश्वास से काम लेता है, उससे संसार सच्चाई का व्यवहार रखता है।
सूत्र: निराशा में आशा देखें
निराशा में भी आशा का अवलोकन करें और लोगों को बुरा कहने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। ईश्वर के जगत में आशा की नदी बहती है, कोई उसमें से एक लुटिया भर लेता है, कोई एक लोटा, कोई गगरा, कुछ अभागे लोग नदी का बहाव ही देखते रह जाते हैं, पर उसमें आचमन करने का भी उनको अहोभाग्य नहीं प्राप्त होता।