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आते हैं ऋतुराज

Sat, 08 Feb 2014 10:45 PM IST
नरेंद्र तिवारी
नरेंद्र तिवारी Updated Sat, 08 Feb 2014 10:45 PM IST
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narendra tiwari poem

कोयल विरुदावलि कहें, भ्रमर बजाएं साज।

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गजरे लें शाखें खड़ीं, आते हैं ऋतुराज॥

जाड़े को कर पराजित, लीनीं सत्ता छीन।
मनमोहक ऋतुराज अब, गद्दी पर आसीन॥

फूल-फूल शाखें हुईं, झरें गंध मकरंद।
बौराई डोले हवा, रचे सुरभि के छंद॥

दुर्जन के भी आचरण, मधुऋतु में प्रतिकूल।
फूल सुकोमल झर रहे, कांटों भरे बबूल॥

पेटी भर कर सुरभि की, फेरी करत बयार।
मुफत बांटता हो इतर, ज्यों कोई अन्तार॥

सिगड़ी सुलगाए हवा, धौंके बारंबार।
सेमल की डाली खिले, पोर-पोर अंगार॥

फूल गलीचे से बिछे, बैठे बिरछ महन्त।
ज्ञान गंध का बांटते, जब से लगा बसंत॥

गुस्साई सी लग रही, देखो लाल कनेर।
क्यों बसंत ने लगा दी, अब की इत्ती देर॥

उसके मन को छू गई, जाने किसकी बात।
चुपके-चुपके से झरा, महुआ सारी रात॥

कलियों में सिंदूर भर, पिचकारी में आग।
ऊंचे बिरछ पलास के, खेलें अद्भुत फाग॥

नरेंद्र तिवारी
प्रकृति और जीवन से जुड़े रंग नरेंद्र की कविताओं में बखूबी देखे जा सकते हैं। इस बार बसंत रंग के साथ उनकी एक कविता। अलीगढ़ में रहते हैं।

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