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काश! आदमी सिर्फ आदमी होता!
मुकेश निर्विकार
Updated Sat, 16 Aug 2014 08:46 PM IST
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जानवरों से कोई
क्यों नहीं पूछता
जात उनकी?
क्यों नहीं होता
कोई धरम?
पहनते क्यों नहीं हैं
कोई सम्प्रदाय-चिह्न
पेड़-पौधे
किस मजहब का
राग अलापती है
बहती नदी?
ये सभी आजाद हैं
इस ताम-झाम से
नहीं बाध्य तनिक भी
आदमी की तरह
किसी पंथ, मजहब, धर्म,
सम्प्रदाय के बाड़े में
कैद रहने के लिए!
अपने सुसंस्कृत और सभ्य
बनने का दुष्परिणाम
भुगत रहा है आदमी।
काश!
आदमी सिर्फ आदमी होता!
वनमानुष की तरह
बे-पहचान,
सिर्फ आदमजाद,
निखालिस एक जीव!
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क्यों नहीं पूछता
जात उनकी?
क्यों नहीं होता
कोई धरम?
पहनते क्यों नहीं हैं
कोई सम्प्रदाय-चिह्न
पेड़-पौधे
किस मजहब का
राग अलापती है
बहती नदी?
ये सभी आजाद हैं
इस ताम-झाम से
नहीं बाध्य तनिक भी
आदमी की तरह
किसी पंथ, मजहब, धर्म,
सम्प्रदाय के बाड़े में
कैद रहने के लिए!
अपने सुसंस्कृत और सभ्य
बनने का दुष्परिणाम
भुगत रहा है आदमी।
काश!
आदमी सिर्फ आदमी होता!
वनमानुष की तरह
बे-पहचान,
सिर्फ आदमजाद,
निखालिस एक जीव!