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हम बहुध्रुवीय दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं: भारत समेत ग्लोबल साउथ के देशों को सीख, व्यावहारिक सहयोग ही ताकत देगा
Thu, 31 Jul 2025 07:37 AM IST
ज्योति भास्कर
डी. उबायडुलेविया (ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर)
डी. उबायडुलेविया (ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर)
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Thu, 31 Jul 2025 07:37 AM IST
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अमेरिका-चीन के व्यापार युद्ध का भारत पर असर।
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
इस साल जब से डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, एक खास वर्ग यह प्रसंग बार-बार सामने लाता रहा है कि उनका शासन अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरा है। अमेरिकी राजनीति विज्ञानी जॉन मियर्सहाइमर का एक बड़ा मशहूर तर्क है कि उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था शुरू से ही असफल होने को अभिशप्त थी, क्योंकि इसमें अपने विनाश के बीज समाहित थे। हाल के वर्षों में इस दृष्टिकोण ने काफी जोर पकड़ा है। और अब, ट्रंप के फैसलों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या कोई नई विश्व व्यवस्था उभर रही है।
ट्रंप ने एक ऐसी नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की इच्छा जताई है, जहां अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश अपने-अपने विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में प्रभुत्व रखें। यह दृष्टिकोण बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था से मेल खाता है, जहां कोई एक देश वैश्विक प्रभुत्व नहीं रखता है। यह व्यवस्था पहले के दौर से बहुत अलग है, जैसे शीत युद्धकालीन द्विध्रुवीय दुनिया, जिसमें अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ का प्रभुत्व था, या उसके बाद की एकध्रुवीय अवधि, जब केवल अमेरिका का प्रभुत्व था। आगे विश्व व्यवस्था का क्या होगा? हमने हाल के महीनों में इस बदलाव को होते देखा है। उदाहरण के लिए, ट्रंप ने रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने का वादा किया था, लेकिन अब वह इसे रूस, यूक्रेन और यूरोप पर छोड़ रहे हैं। यूरोप, जो पहले अमेरिका के ही स्वर में बोलता था, अब स्वतंत्र नीति-निर्माण के संकेत दे रहा है। वह अब ‘पश्चिमी लोकतांत्रिक सिद्धांतों’ की रक्षा पर कम और अपने सुरक्षा संबंधी हितों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।
ट्रंप के शासन में अमेरिका इस्राइल का समर्थन पूरी तरह जारी रखेगा। अमेरिका क्षेत्रीय राजनीति में तभी शामिल होगा, जब उसके हित दांव पर होंगे, जैसा कि हमने हाल ही में ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमलों में देखा। खाड़ी देशों के साथ बढ़ते आर्थिक रिश्ते दिखाते हैं कि इस क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगी प्रमुख आवाज बने रहेंगे, खासकर अब जब ईरान कमजोर हो चुका है। फिर भी यह स्पष्ट है कि ट्रंप क्षेत्र में सैन्य और राजनीतिक भागीदारी को कम करने की इच्छा का संकेत देकर और पिछले प्रशासनों के ‘राष्ट्र निर्माण’ प्रयासों की आलोचना करके क्षेत्र में अमेरिकी भूमिका को नया आकार दे रहे हैं।
ऐसा लगता है कि ट्रंप प्रशासन मुख्य रूप से आर्थिक संबंधों के माध्यम से प्रभाव क्षेत्र को बनाए रखना चाहता है। इस बीच, ग्लोबल साउथ में अन्य ध्रुव उभर रहे हैं। रूस और चीन ने अपने बीच सहयोग को और भी गहरा किया है। और दोनों ही खुद को पश्चिमी देशों के ‘वर्चस्ववादी रवैये’ के खिलाफ रक्षक के रूप में पेश कर रहे हैं। ट्रंप की व्यापार नीतियां और कई देशों पर प्रतिबंधों ने रूस और चीन के इस दावे को बल दिया है कि अमेरिका खुद उन नियमों का पालन नहीं करता, जो वह दूसरों पर थोपता है।
ट्रंप द्वारा अमेरिकी विकास सहायता (यूएसएआईडी) के फंड में कटौती ने चीन को अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में विकास का मुख्य साझेदार बनाने का मौका दिया है। और सुरक्षा के मोर्चे पर, रूस ने अफ्रीका और मध्य पूर्व के कई देशों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, जो अब पश्चिमी देशों पर कम भरोसेमंद और कम निर्भर हो गए हैं।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव और उसका आक्रामक रुख चर्चा में है। अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी इस क्षेत्र में उसकी भागीदारी और चीन के उदय को रोकने की उसकी क्षमता को लेकर चिंतित हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस मौके का फायदा उठाते हुए वियतनाम, मलयेशिया और कंबोडिया जैसे देशों में अपनी पैठ बढ़ाई है। लेकिन कई देश चीन के बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं, खासकर फिलीपींस, दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन से भिड़ गया है।
हालांकि, सभी देश किसी एक बड़े देश के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ रहे हैं। वहीं छोटे देशों के लिए यह बहुध्रुवीय विश्व जोखिम और अवसर दोनों लेकर आया है। यूक्रेन इसका एक उदाहरण है, जिसके पास एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपनी राह चुनने का अधिकार है, लेकिन वह बड़े देशों की राजनीति में फंस गया है, जिसके विनाशकारी परिणाम हुए हैं। कुछ छोटे देश अलग रणनीति अपना रहे हैं, वे अपने तात्कालिक हितों के आधार पर किसी या किसी अन्य बड़े देश की ओर झुक रहे हैं। उदाहरण के लिए, स्लोवाकिया नाटो और यूरोपीय संघ का सदस्य है, लेकिन इसके नेता रॉबर्ट फिको ने मई में रूस के विजय दिवस परेड में भाग लिया और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से ‘सामान्य रिश्ते’ बनाए रखने की बात कही।
मध्य एशिया में भी रूस, चीन और यूरोप प्रभाव और आर्थिक साझेदारी के लिए होड़ कर रहे हैं। लेकिन अगर पुतिन मध्य एशिया के किसी देश पर हमला करते हैं, तो क्या अन्य बड़े देश हस्तक्षेप करेंगे? यह जवाब देना मुश्किल है। बड़े देश सीधे संघर्ष में शामिल होने से हिचकते हैं, जब तक कि उनके मूल हितों या सीमाओं को सीधे खतरा न हो। इसलिए मध्य एशियाई देश कई देशों के साथ रिश्ते बनाए रखकर अपने जोखिम कम कर रहे हैं।
हालांकि, अभी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा, लेकिन हाल के महीनों की घटनाएं एक बढ़ती प्रवृत्ति को दिखाती हैं। छोटे देश एक शक्ति के साथ एकजुटता दिखा रहे हैं, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों के लिए दूसरे के साथ व्यावहारिक सहयोग करते हैं। इसी कारण से, ग्लोबल साउथ के देशों में क्षेत्रीय शक्ति समूहों का आकर्षण बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) हाल के वर्षों में यूरेशिया में एक मजबूत और बड़ा समूह बन गया है।
ट्रंप का ध्यान ‘अमेरिका को फिर से महान’ बनाने पर है, जिससे अमेरिका पर उदारवादी नेतृत्व का बोझ कम हो गया है। बहुध्रुवीय दुनिया उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का अंत नहीं हो सकता, लेकिन यह उदारवादी शासन का एक नया रूप हो सकता है। यह कितना उदारवादी होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रत्येक क्षेत्रीय शक्ति इसे किस ओर ले जाती है।
(द कन्वर्सेशन से)