फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Mother sitting in the psyche

मानस में बैठी मां

Sat, 11 Jan 2014 11:45 PM IST
सतीश आर्य
सतीश आर्य Updated Sat, 11 Jan 2014 11:45 PM IST
विज्ञापन
Mother sitting in the psyche

मानस में बैठी मां

विज्ञापन


आंखों में है उसे संजोये सारा
गांव-गिरांव।
देवलोक दिखता था, जब भी छूता
मां के पांव॥

बिना कहे ही मेरे मन का
दर्द समझती थी।
अनपढ़ होकर भी कविता का
अर्थ समझती थी।

सगुन मनाती थी पाहुन का, सुन
कागा के कांव॥
फूलों की पंखुरी जैसी थी
उसकी अद्भुत डांट।
शब्द-शब्द लगते थे
जैसे सामवेद का पाठ।

जान-बूझ कर भी हारा करती
थी अपना दांव॥
पलती पीर प्राण में
पर मुसकाती रहती थी।
गीत प्रार्थना के ही
हर पल गाती रहती थी।

कभी भोर की धूप बन गई, कभी
धूप में छांव॥
मेरे मानस में बैठी
चौपाई लिखती थी।
गीता, वेद, कुरान, बाइबिल
सबमें दिखती थी।

और कबीरा की साखी में मिल
जाती हर ठांव॥
बैठ देहरी पर जाने क्या
सोचा करती थी?
आंचल से आंखों का अपनी
पोंछा करती थी।

चली गई सब छोड़ अचानक,
सपनों वाले गांव॥

-सतीश आर्य
इनकी कविताओं में शब्दों की विनयशीलता बार-बार प्रभावित करती है।
मनकापुर (गोंडा) में रहते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed